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राजस्थान हाईकोर्ट के परिसर में साल 1989 में मनु की एक मूर्ति ‘सौन्दर्यकरण’ प्रोजेक्ट के तहत लगाई गई थी। मनु की मूर्ति को हाथ में मनुस्मृति लिए खड़ा दिखाया गया है। पिछले कुछ सालों से अलग-अलग संस्थाओं द्वारा इस मूर्ति को हटाने की मांग हो रही है। साल 2020 में मानवाधिकार कार्यकर्ता मार्टिन मैक्वेन ने मूर्ति को हटाने की मांग करते हुए अर्ज़ी लिखी थी। उन्होंने लिखा था कि हाईकोर्ट में मनु की मूर्ति होना न सिर्फ़ दलित समुदाय बल्कि संविधान का अपमान है साथ ही यह डॉक्टर आंबेडकर के जाति के विनाश के सपने को कमज़ोर करता है। उन्होंने आगे लिखा है कि कोर्ट प्रांगण में मनु की मूर्ति होना महिलाओं और वंचित समुदाय के शोषणकारी इतिहास को जिंदा रखने का प्रतीक है जबकि इन पहचान के व्यक्तियों के साथ आज भी मनुवादी मानसिकता के लोग भेदभाव करते हैं।

मूर्ति स्थापना के छह महीने बाद राजस्थान हाईकोर्ट के न्यायधीशों के पैनल ने प्रांगण से मूर्ति हटाने का फैसला सुनाया था। इस फैसले के ख़िलाफ़ विश्व हिन्दू परिषद के नेता आचार्य धर्मेंद्र द्वारा याचिका दाखिल की गई थी। उसके बाद से कोर्ट के निर्देश पर रोक लगी हुई है और मनु की मूर्ति न्यायालय परिसर में मौजूद है। विश्व हिन्दू परिषद का इतिहास हिन्दू कट्टरपंथी और जातिवादी रहा है।

राजस्थान हाईकोर्ट के परिसर में मौजूद मनु की मूर्ति

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शीला पवार और कांताबाई अहीरे, मनुवाद के ख़िलाफ़ महिलाओं की शक्तिशाली आवाज़ें

साल 2018 में दिल्ली के संसद रोड पर आज़ाद सेना और आरक्षण विरोधी पार्टी के लोग जमा हुए और डॉक्टर आंबेडकर के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रहे थे। द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने भारत के संविधान की एक कॉपी भी जलाई थी। देखने वाली बात है कि जहां कुछ संगठन मनुस्मृति की रक्षा के लिए भारत का संविधान जला रहे हैं वहीं साल 1927 में डॉक्टर भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में  हज़ारों की संख्या में लोगों ने मनुस्मृति की प्रतियां जलाईं थीं। इस तरह मनुस्मृति दहन दिवस महाराष्ट्र के महाड नाम के इलाक़े में मनाया गया था। मनुस्मृति में महिलाओं, वंचित जातियों, भारत के आदिवासी समुदाय को लेकर अपमानजनक बातें लिखी गई हैं। डॉक्टर आंबेडकर ने अपनी क़िताब ‘हिन्दू नारी का उत्थान और पतन’ में उन श्लोकों का ज़िक्र किया है जो ख़ासकर महिलाओं के ख़िलाफ़ भ्रम, द्वेष फैलाते हैं।

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दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के नारीवादी चर्चा में ज़मीनी स्तर पर बदलाव के लिए प्रयासरत महिलाओं को गौण कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे एक विशेष वर्ग और जातिगत पहचान से संबंध नहीं रखतीं हैं या उनके पास विश्वविद्यालय और मंचों पर इस्तेमाल होने वाली शब्दवाली नहीं है।

शीला पवार और कांताबाई अहीरे ने इस मनुवादी सोच और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ विरोध दर्ज़ करने के लिए राजस्थान हाईकोर्ट में लगी मनु की मूर्ति को काले रंग से पोत दिया था। ये दोनों महिलाएं राजस्थान हाईकोर्ट के बाहर मनु की मूर्ति को हटाने के लिए चल रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने आई थीं लेकिन संविधान जलाए जाने की घटना के दृश्य उनके दिमाग़ से निकलते नहीं थे। उन्होंने उसी वक्त फैसला किया। फिर क्या? साड़ी लपेटे दो महिलाएं मूर्ति के प्लैटफॉर्म पर चढ़ चुकी थीं। उन्हें ऐसा करने के लिए दो हफ़्ते तक जेल में रहना पड़ा था।

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द वायर के लेख के अनुसार कांताबाई अहीरे औरंगाबाद के शम्भू नगर स्लम इलाक़े में रहती हैं। वे बाहरवीं तक पढ़ीं हैं। अहीर बताती हैं कि अमरीका और दुनियाभर में चल रहे नस्लीय भेदभाव के ख़िलाफ़ अभियान की खबरों पर वह नज़र रखती हैं। पति दिहाड़ी मजदूर हैं और उनकी एक बेटी है। गौर करने वाली बात है कि यह एक आंबेडकरवादी परिवार है और इस तरह की आर्थिक तंगी और संसाधन की कमी में जीवन-यापन करने के बाद भी अहीरे की सामाजिक चेतना कमज़ोर या भ्रमित नहीं है। बल्कि वे बिना अपनी निजी परिस्थितियों से जूझते हुए भी महिलाओं और वंचित समाज के साझे इतिहास से वाकिफ़ हैं, इससे उनका मनोबल दुर्बल नहीं होता है बल्कि समाज की शोषणकारी सोच से लड़ने की हिम्मत बढ़ती है।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता किताबी भाषा में नहीं बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में वह किस तरह से काम करती है ये उन्हें मालूम है। आंबेडकरवादी समझ रखने के कारण उन्हें इससे लड़ने के तरीक़ों का पता है। फिर भी मुख्यधारा नारीवादी चर्चाओं में शीला पवार और कांताबाई अहीर का नाम ग़ायब होना इन चर्चाओं के ग़ैर समावेशी प्रवृत्ति को उजागर करती है।

शीला पवार बंजारा समूह नाम की विमुक्त जाति से हैं। जीवनयापन के लिए खेतों में काम, कंस्ट्रक्शन स्थल पर दिहाड़ी जैसे काम करती हैं। उन्हें शिक्षित होने का मौका नहीं मिला फिर भी आंबेडकरवादी सोच से जुड़ने और ज़मीनी स्तर पर जातिवाद विरोधी गतिविधियों में सक्रिय रहने के कारण राजनीतिक और सामाजिक समझ से परिपक्व हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के नारीवादी चर्चा में ज़मीनी स्तर पर बदलाव के लिए प्रयासरत महिलाओं को गौण कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे एक विशेष वर्ग और जातिगत पहचान से संबंध नहीं रखतीं हैं या उनके पास विश्वविद्यालय और मंचों पर इस्तेमाल होने वाली शब्दवाली नहीं है। देखा जाए तो इनके पास अपने जिए हुए अनुभव हैं जिससे वे आज भी जूझ रही हैं। ब्राह्मणवादी पितृसत्ता किताबी भाषा में नहीं बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में वह किस तरह से काम करती है ये उन्हें मालूम है। आंबेडकरवादी समझ रखने के कारण उन्हें इससे लड़ने के तरीक़ों का पता है। फिर भी मुख्यधारा नारीवादी चर्चाओं में शीला पवार और कांताबाई अहीर का नाम ग़ायब होना इन चर्चाओं के ग़ैर समावेशी प्रवृत्ति को उजागर करती है।

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राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की मूर्ति आज भी लगी है। साल 2018 के पहले भी समय समय पर इस मुद्दे को न्यायालय तक लाया गया है। 13 अगस्त, 2015 में इस मालमे को पच्चीस साल बाद राजस्थान हाईकोर्ट में उठाया गया था। लेकिन हर बार जब वक़ील सुनवाई के दौरान जातिवाद की बात करते हैं। सवर्ण वकीलों के समूह, हिन्दू कट्टरपंथी दल उपद्रव करने लगते हैं। मनुस्मृति को बचाने आए लोगों की दलीलें अक्सर ये होती हैं कि वह क़िताब बहुत पुरानी है उसे उस समय के उस हिसाब से देखा जाए। लेकिन यही लोग मनुस्मृति में दर्ज महिला और वंचित समुदाय विरोधी बातों के कारण इस दौर में मनु की मूर्ति किसी न्यायालय में क्यों लगे इसका जवाब नहीं दे पाते। राजस्थान हाईकोर्ट के ही वकील प्रहलाद शर्मा का बयान है, “उस समय भी समाज के कुछ तत्वों ने विरोध किया था, लेकिन मनु हिन्दू धर्म के जरूरी नाम हैं और मानवीय प्रजाति के पिता हैं।” 

एक तरफ़ न्यायालय के वकील जिनके पास तमाम डिग्री एक ढंग की नौकरी है। वे ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की जड़ मजबूत करती किताब और उसे लिखने वाले को खुलेआम बचाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ़ शीला पवार और कांताबाई अहीर व्यक्तिगत जीवन में रोज़ी रोटी के लिए संघर्ष के साथ साथ वैचारिक स्तर पर जागरूकता फैला रही हैं। 2020 ‘द वायर’ को दिये बयान में अहीरे कहती हैं, “जब हमें गिरफ्तार किया गया था तब राजस्थान और महाराष्ट्र दोनों जगह में बीजेपी की सरकार थी। हमें उम्मीद है अब हम पर लगे चार्ज वापस लिए जाएं।” हालांकि साल 2021 आ चुका है और उन पर दर्ज़ मामले रदद् नहीं किए गए हैं। 43 वर्षीय शीला पवार और 34 वर्षीय कांताबाई अहीरे को भारतीय नारीवाद विर्मश में बिना डरे संस्थागत जातिवाद, कट्टरवादी संगठनों, और महिला विरोधी मनुवादी सोच से लोहा लेने के लिए हमेशा याद रखा जाना चाहिए।

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तस्वीर साभार : The Wire/Gunratna Sonawane

मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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