छोटे शहर में स्कूटी चलाना महिलाओं में आत्मविश्वास भर रहा है।
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मैं और मेरी स्कूटी, हमारा रिश्ता बहुत खास है। केवल एक स्कूटी होने की वजह से कैसे जीवन बदला उसको यहां कहना अपने आप में एक खुशी और साहस है। घर से बाहर निकलने से लेकर सड़क पर अकेले चलने जैसी कई मुश्किलों को स्कूटी होने ने न केवल दूर किया बल्कि मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया है। मेरे शहर में रात में दस बजे एक लड़की का अकेले बाहर निकलना एक अचीवमेंट है, जो मैंने अपने स्कूटी आने के बदौलत हासिल किया है। रात में हाईवे पर निकले की वह खुशी मैं बयां नहीं कर सकती।

स्टेशन पर अक्सर हम महिलाओं को लेने हमारे घर के पुरुष आते हैं लेकिन स्कूटी आने की वजह से मैं अपने पापा और भाई को देर रात रिसीव करने जाती थी। स्टेशन के बाहर अपनी-अपनी सवारियों का इंतजार करने वाली देर रात में मैं अकेली लड़की होती हूं। कई बार इंतज़ार करते हुए मैं खुद में मुस्कुराती और खुद को आसमान में उड़ता हुआ महसूस करती। स्कूटी ना होती तो मैं शायद रात में निकलने का कभी नहीं सोचती। एक स्कूटी ने जीवन को बहुत आसान बनाया है, हम हर काम खुद कर सकते हैं इस बात का भरोसा दिलाया है।

सड़क पर और सार्वजनिक जगहों पर चलनेवाली लगभग हर महिला के पास एक अनुभव समान है। उन्होंने कभी न कभी सड़क, बस, और ऑटो में यौन उत्पीड़न का सामना किया है। आज भी मैं सड़क पर हमेशा पैदल चलते समय उल्टी साइड सिर्फ इसलिए चलती हूं ताकि पीछे से आकर ऐसे ही कोई कमर को छूकर न चला जाएं। कॉलेज के शुरुआती साल में मेरे पास कोई निजी वाहन नहीं था। ऑटो से दूरी तय करने के बाद कुछ दूर पैदल चलकर घर आना होता था। ऑटो में आदमियों का सटकर बैठना और सड़क पर कब कोई कुछ कहकर और शरीर को छूकर चला जाता ये सब बहुत परेशान करने वाला होता था। ऐसा कुछ सामना करने वाली मैं इस देश की पहली लड़की नहीं हूं, ना ही आखिरी हूं।

लेकिन मेरे पास स्कूटी आ जाने के बाद से अब इन मुश्किलों का सामना थोड़ा कम करना पड़ता है। स्कूटी आने के बाद से सड़क पर होनेवाले यौन उत्पीड़न का तो अभी भी सामना करना पड़ता है, लेकिन रफ्तार होने की वजह से इस पर से थोड़ा ज्यादा और तेजी से ध्यान हट जाता है। स्लो ट्रैफिक में पास में रुकने वाला बाइक सवार आराम से कमेंट करके चला जाता है, तो कुछ लड़के सामने से तेजी से बाइक लहराकर निकल जाते हैं। कायदे से स्कूटी चलाने के कारण ये भी सुनना पड़ता है कि चलाना तो आता नहीं है स्कूटर लेकर चल देती हैं ये।  

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बड़े शहरों की तरह अब छोटे शहरों, कस्बों और उसके आसपास के गांवों में लड़कियां स्कूटी चलाती दिखती हैं। आज मेरे शहर में स्कूटी चलानेवाली बहुत सी महिलाएं और लड़किया हैं, जो सुबह से लेकर शाम तक सड़को पर अपना काम करती दिखती हैं। सब्जी मंडी से लेकर स्कूल के बाहर बच्चों को रिसीव करने और खुद के काम पर जाने वाली अनेक महिलाओं के पास स्कूटी हैं। वे अपने दोपहिया वाहन से अपना रास्ता तय करती हैं। खासतौर से मध्यवर्गीय परिवारों में ये महिलाएं अपने परिवार की पहली पीढ़ी हैं जो ड्राईविंग लाइसेंस रखती हैं और हेलमेट पहनकर घर से बाहर निकलकर काम कर रही हैं।

मैं खुद अपने परिवार में पहली महिला हूं जिससे किसी भी तरीके की कोई गाड़ी चलानी आती है, जो बिना किसी का इंतजार किए बाहर निकल जाती है। भारत के छोटे शहरों और उसके आसपास के कस्बों में कई महिलाएं प्रतिदिन अपनी स्कूटी पर सवार होती हैं और अपने तरीके से दुनिया को जीत रही हैं। दफ्तर जाना हो या बाज़ार में जाने का काम हो, भारतीय महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर मंजिल तक पहुंचना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। विशेष रूप से छोटे शहरों में परिवहन की सुगम व्यवस्था न होने के कारण महिलाएं और लड़कियों के लिए काफी समस्या होती है जिस कारण वह घर से बाहर निकलने को टालती रहती हैं।

दोपहिया वाहन सीखकर महिलाएं आगे बढ़ रही हैं

आम तौर पर बड़े या छोटे से छोटे कामों के लिए बाहर जाने के लिए महिलाएं अपने परिवार के पुरुष सदस्यों पर निर्भर रहती हैं। समय के साथ कुछ परिवारों में इस स्थिति में बदलाव आ रहा है। अब ये महिलाएं कई मायनों में आत्मनिर्भर हैं। दोपहिया वाहन चलाना सीखकर न केवल खुद के जीवन को बदल रही हैं बल्कि अन्य महिलाओं की भी मदद कर रही हैं। घर के काम हो या फिर खुद की नौकरी, घर से बाहर जाने के लिए महिलाओं को किसी पुरुष पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है। एक हद तक वे पब्लिक स्पेस में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।

पश्चिमी उत्तर-प्रदेश से ताल्लुक रखने वाली निशी के अनुसार उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह जीवन में स्कूटर चलाएंगी। वह बताती हैं, “मैं साइकिल भी चलाना नहीं जानती थी। पति को नौकरी के कारण दूसरे शहर में शिफ्ट होना पड़ा, जिस वजह से घर की जिम्मेदारी के साथ बाहर के भी सारे काम मुझे ही करने होते हैं। ऐसे में स्कूटी सीख लेने के बाद से बहुत कुछ आसान हो गया है। शादी से पहले किसी भी काम के लिए बाहर जाने के लिए मैं पूरी तरह से अपने पापा-भाई के साथ बाइक पर पीछे बैठकर जाती थी। आज पापा यहां आते है तो उनको डॉक्टर के मैं लेकर जाती हूं, मैं (हंसते हुए) स्कूटी चलाकर लेकर जाती हूं।” 

स्कूटी चलाना खुद में आत्मविश्वास को बढ़ाता है

भारत के बड़े शहरों के मुकाबले छोटे शहरों की तस्वीर अलग है। बड़े मेट्रोपोलिटन शहरों में बड़ी तादाद में महिलाएं और लड़कियां काम पर जाती हैं। घर से दूर रहकर अपना हर काम खुद करती हैं। वहीं, छोटे शहरों, कस्बों में अभी भी महिलाओं के लिए घर से बाहर अकेले निकलना बहुत बड़ी चुनौती है। ऐसे में कुछ महिलाएं और लड़कियां स्कूटी चलाने का कौशल सीखकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था से बाहर निकलकर उसके बनाएं नैरेटिव को खत्म कर रही हैं।

मात्र दोपहिया वाहन सीखने के कौशल आ जाने के कारण छोटी संख्या में ही सही लड़कियां अपनी पढ़ाई में आने वाली बाधा को दूर कर पा रही हैं। महिलाएं अन्य कामों से जुड़कर अपनी आर्थिक भागीदारी को बढ़ा रही हैं।

महिलाएं स्कूटी चलाना सीखकर पुरुषों के समान स्वतंत्रता का अनुभव कर रही हैं। खुद के काम करने के लिए किसी पर निर्भर न होने की वजह से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। समय की परवाह किए बगैर महिलाएं अपने काम को तरहीज दे रही हैं। घरेलू कामकाज तक सीमित रहने वाली मध्यम आयुवर्ग की महिलाएं बच्चों को स्कूल, ट्यूशन छोड़ने के साथ अपने काम स्वयं करती हैं। छोटे शहरों में केवल घर तक सीमित रहने वाली महिलाओं के लिए स्कूटी चलाना स्वतंत्रता और सशक्तिकरण की बहुत बड़ी भावना है जो उनमें हौसला भरती है।

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स्कूटी चलाना महिलाओं के लिए छोटे शहरों में कई अवसर पैदा कर रहा है। सामाजिक परिवहन व्यवस्था सुगम और सुरक्षित न होने के कारण महिला और लड़कियों के लिए यह पढ़ाई और काम करने के अवसर गंवा देना है। मात्र दोपहिया वाहन सीखने के कौशल आ जाने के कारण छोटी संख्या में ही सही लड़कियां अपनी पढ़ाई में आने वाली बाधा को दूर कर पा रही हैं। महिलाएं अन्य कामों से जुड़कर अपनी आर्थिक भागीदारी को बढ़ा रही हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर जिले के गांव पंचैडा कलां की राधिका सिलाई का काम करती हैं। उनके गांव और शहर के बीच की दूरी 12 किलोमीटर की है। वह शहर की एक बड़ी दुकान के लिए रेड़ीमेंड कपड़े सिलने का काम करती है। इसी काम से जुड़ने के बाद उन्होंने लोन लेकर स्कूटी खरीदी और इसके बाद वह यह काम बड़े पैमाने पर कर रही है। अपने गांव की अन्य महिलाओं को भी सिलाई के काम से जोड़े हुए हैं। स्कूटी आने जाने के बाद से उनके काम में गतिशीलता आई है और आर्थिक रूप से भी वह पहले से ज्यादा कमाने लगी है। राधिका के पास स्कूटर होने से उनका काम बढ़ा है। उनके साथ-साथ उनके आसपास की महिलाओं के लिए भी आजीविका का एक साधन मिला है।

पितृसता की धारणा को तोड़ती महिलाएं

हमारे पितृसत्तात्मक समाज में कई नियम-कानून है जहां महिलाओं को कई काम करने की इजाजत नहीं है। कुछ ऐसी धारणाएं बनाई हुए हैं जो यह कहती है कि ड्राइविंग केवल पुरुषों के लिए है। महिलाएं खराब ड्राइवर होती हैं। इन धारणाओं और नियमों को तोड़ते हुए छोटे शहरों में महिलाओं का स्कूटी चलाना पितृसत्ता की व्यवस्था पर एक वार है। मध्यवर्गीय परिवारों की महिलाओं का स्कूटी चलाना, सड़कों पर उनका निकलना बहुत लोगों को अखरता है लेकिन वह अपने रास्ते चल रही हैं। सार्वजनिक स्थान में अपनी मौजूदगी को बढ़ा रही हैं। अपने जीवन के आयामों को बदलने मे कामयाब हो रही हैं। स्कूटी चलाने से महिलाओं में नेतृत्व की क्षमता उभरी है। वह खुद के साथ अन्य महिलाओं के लिए बाहर निकलने की मिसाल बनती है।

स्कूटी चलाने की वजह से कुछ महिलाएं सड़को होने वाली हिंसा से बच निकली है। घर से बाहर निकलने से पहले सार्वजनिक जगहों पर होने वाली लैंगिक भेदभाव से होने वाले मानसिक तनाव से वो थोड़ी बच गई है। स्कूटी चलाना महिलाओं के जीवन में आई एक क्रांति के समान है। इस कौशल के माध्यम से वह आजादी और समानता के पायदान पर कदम रखती हुई दिखती है। जो महिला और लड़की घर से बाहर निकलने के लिए किसी का इंतजार और योजना बनाती थी वह इससे बाहर निकल रही है। स्कूटी चलाने से न केवल उनका जीवन आसान हुआ है बल्कि श्रम के क्षेत्र में भी उनकी भागीदारी बढ़ी हैं। 

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तस्वीर साभारः business today

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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1 COMMENT

  1. वास्तव में इसको एक क्रांति कहा जाए तो अतिश्योक्ति नही होगी क्योंकि ये शहर या कस्बों तक सीमित नहीं है बल्कि एक छोटे से गाँव में भी बदलाव का बिगुल बजा रही है।

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