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“तुम्हें किसने कहा बोलने के लिए, ये फिर हो गई शुरू, इसकी सुनो भाई और चुप रहो” ये बातें मुझे अक्सर सुनने को मिलती हैं। किसी भी मुद्दे पर अपनी राय रखने पर अक्सर मुझे ये सब कहकर ही चुप करा दिया जाता है। इन सब बातों का असर भी होता है। यही वजह है कि कई बार मैं न चाहते हुए भी चुप रहना चुनने लगी हूं। रोज़मर्रा के जीवन में ऐसी बातें सुनना हम महिलाओं के लिए एक सामान्य सी बात है। हमारे बोलने या किसी बात पर अपनी राय रखने पर ऐसी हिदायत मिलना आम है। बचपन से लगातार मिलती सीख और खीझ के कारण महिलाएं एक समय पर चुप रहना ही अपना कर्तव्य मान लेती हैं।   

“कम बोलो, धीरे बोलो, आराम से बोलो और तेज मत हंसो” ये सब वो शब्द हैं जो बहुत छोटी उम्र में ही लड़कियों को सुनने मिलते हैं। केवल अपने माता-पिता से ही नहीं उम्र में छोटे भाई से भी लड़कियों को उनके बोलने पर हिदायत मिलती है। ‘चुप कर’ यह इतना सामान्य शब्द है कि भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में हर महिला ने अपने जीवन कभी न कभी इसे जरूर सुना होगा। रूढ़िवादी समाज की पूरी इमारत इस एक वाक्य पर टिकी है जिसमें महिलाओं और लड़कियों को चुप करवाकर लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा दिया जाता रहा है।

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21 वर्षीय हिमांशी बीएसी में पढ़ रही हैं। वह बताती हैं कि बचपन से ही कैसे उन्हें हमेशा चुप रहने के लिए कहा जाता आ रहा है। “मुझे हमेशा घर में सिखाया गया है कि ज्यादा मत बोला कर। एक बार बचपन में किसी मेहमान के सामने जब मैं अपनी स्कूल की बातें बता रही थी तो मुझे यह कहकर वहां से भगा दिया कि यह बहुत बोलती है, पागल है। उस वक्त मुझे बहुत बुरा लगा था और शायद मैं रोई भी थी। मम्मी हमेशा से कहती है कि लड़कियों का ज्यादा बोलना सही नहीं होता है। मैं यह सब ही सुनते हुए बड़ी हुई हूं। आज कॉलेज में हूं यहां भी कई बार यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि तुम लड़कियां इस मुद्दे पर ज्यादा ना बोलो तो तुम्हारे लिए बेहतर होगा।”

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“मेरी शादी के दिन भी मेरा छोटा भाई बार-बार सिर्फ एक ही बात कह रहा था कि हंसना मत। मेरा हंसता हुआ चेहरा है। मेरे दांतों का आकार बड़ा है और मैं बहुत खुलकर हंसती हूं।”

30 वर्षीय पल्लवी अपनी शादी को याद करते हुए कहती हैं, “मेरी शादी के दिन भी मेरा छोटा भाई बार-बार सिर्फ एक ही बात कह रहा था कि हंसना मत। मेरा हंसता हुआ चेहरा है। मेरे दांतों का आकार बड़ा है और मैं बहुत खुलकर हंसती हूं। मैंने बहुत बार सुना है कि तुम इतना तेज क्यों हंसती हूं। थोड़ा तमीज़ में हंसा करो। पहले तो मुझे कोई ये बता दे कि तमीज से हंसते कैसे हैं। मम्मी, पापा और रिश्तेदार मैंने सबके मुंह से अपनी हंसी को लेकर बातें सुनी है कि बहुत तेज हंसती है हमारी लड़की। इसकी हंसी बहुत खतरनाक है। सच कहूं तो शिष्टता के नाम पर मुझे हमेशा खुलकर हंसने के लिए रोका गया है।”

लड़कियों का तेज बोलना, हंसना उनकी मांओं में बहुत बैचेनी पैदा करता है। पितृसत्ता के नियमों के तहत परवरिश की सारी जिम्मेदारी केवल मां की होती है। यदि लड़कियों के अंदर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता द्वारा तय किए गए ‘गुण’ नहीं होंगे तो उसका पहला दोष केवल मां को दिया जाता है। अच्छी परवरिश और अच्छी लड़की बनाने का मांओं के ऊपर सांस्कृतिक भार बहुत अधिक होता है।

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40 वर्षीय इंदु बोलने के ऊपर अपने अनुभव को साझा करते हुए कहती हैं, “बचपन से लेकर आज तक के जीवन में रिश्तों की हर भूमिका में ‘चुप रह’ वाक्य तो सुनना आम हो गया है। मम्मी, दादी, पापा, और पति सबने यह कहा है। चुप रह, कम बोल और प्यार से बोलाकर। मुझे याद है कि बचपन में सिर्फ बोलने के कारण मुझे कई बार सज़ा मिली है। कई बार मम्मी कुछ चीजें यह कहकर नहीं देती थी कि मैं बहुत बोलती हूं या वो अक्सर कहती थी कि प्यार और आराम से बोला कर। लड़कियां ऊंची आवाज़ में बात करती हुई अच्छी नहीं लगती है। यही कारण है कि मैं छोटी उम्र में सीख गई थी कि लड़कियों को बोलना मना है।”  

अदृश्य होने की सीख

खुलकर और तेज हंसने-बोलने वाली महिलाओं को बुरा माना जाता है। सामाजिक मानंदडों को तोड़ते हुए अगर महिलाएं खुलकर बोलती या हंसती हैं तो पुरुषों द्वारा इसे ध्यान आकर्षित करने के लिए अपनाया जाने वाला एक तरीका कहा जाता है। हमारे पारिवारिक ढ़ांचे के तहत लड़कियों को बचपन से गुम होने की ट्रेनिंग दी जाती है। “चुप रह, ज्यादा मत बोला, ऐसे मत बोल, ऐसे मत हंस” जैसी बातों का सीधा संबध महिलाओं को निर्णायक भूमिका से बाहर निकालने से भी है। उम्र के हर पायदान पर उसे एक श्रोता की तरह रहना है। महिलाओं का स्वयं की राय रखना व्यर्थ है। इसके उलट अगर कोई महिला या लड़की अपनी अभिव्यक्ति खुलकर ज़ाहिर करती है तो उसको बुरी लड़की, अहंकारी कहा जाता है। यह हमेशा देखा गया है कि लड़कियों और महिलाओं की राय को कोई महत्व भी नहीं दिया जाता है। यदि कोई महिला अपनी बात रखती है तो उसको खराब चरित्र वाली कह दिया जाता है। भारतीय सामाजिक परिदृश्य में बोलती हुई महिलाओं को खराब चरित्र वाला माना जाता है।

“चुप रह, ज्यादा मत बोला, ऐसे मत बोल, ऐसे मत हंस” जैसी बातों का सीधा संबध महिलाओं को निर्णायक भूमिका से बाहर निकालने से भी है। उम्र के हर पायदान पर उसे एक श्रोता की तरह रहना है।

सीधे तौर पर भारतीय महिलाओं के साथ यह व्यवहार उन्हें खुद के अस्तित्व को मिटाने का प्रशिक्षण देता है, जिसमें उन्हें न खुद की पसंद का बोलना है और न ही खिलखिलाकर हंसना है। महिलाएं और लड़कियां तेज बोलती या हंसती हैं तो उनकी सामाजिक निंदा की जाती है। महिलाओं को उनके स्वाभाविक व्यवहार करने के लिए न जाने कितनी बार फटकार का भी सामना करना पड़ता है। इस तरह की बंदिश उनके आत्मविश्वास को कम करती है। लगातार उनकी राय को महत्व न दिये जाने पर महिलाओं के भीतर संकोच पैदा हो जाता है। महिलाएं स्वयं को कम जानकारी वाला मानकर अक्सर घर के पुरुष की राय के सामने अपनी राय बदल लेती हैं। पितृसत्ता के पैमानों पर खरा न उतरने के कारण आलोचना सुनने पर पर खुद को कमतर मानना शुरू कर देती हैं। यही कारण है कि महिलाएं खुद को एक तय तरीके से व्यक्त करना शुरू कर देती हैं।

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पितृसत्तात्मक रीतियों के अनुसार लड़की का साफ बोलना बहुत आवश्यक है। लेकिन अगर वह ज्यादा बोलती हैं, तेज बोलती हैं तो ऐसा करना बहुत ही ज्यादा खतरनाक है। यही वजह है कि जैसे ही माता-पिता को इस बात का आश्वासन हो जाता है कि उसे दिक्कत तो नहीं है तो उसको न बोलने की ट्रेनिंग देनी शुरू हो जाती है। एक पूरे सिस्टम के तहत लड़कियों को न बोलने की ट्रेनिंग देकर बड़ा किया जाता है। छोटी सी बच्ची को केवल लड़की होने के कारण बात-बात पर चुप रहने के लिए कहना उसको भविष्य में सुनने वाली की भूमिका रहने की ट्रेनिंग दी जाती है।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में जेंडर की अवधारणा के तहत लड़कियों को ‘औरत’ बनाने की शुरुआत छोटी उम्र ही शुरू हो जाती है। यह सब रूढ़िवादी नियम कायदे सबसे पहले लड़कियों और महिलाओं को उसके घर में ही देखने को मिलते हैं। संस्कार के नाम पर उनके व्यवहार को एक सीमित ढांचे में ढालने का काम किया जाता है। ज्यादा नहीं बोलना, फिर ज्यादा तेज नहीं बोलना और तेज हंसना तो बिल्कुल निषेध है। कम बोलना स्त्रीत्व की परिभाषा में शामिल कर दिया गया है। पुरुषों के द्वारा तय की गई यह सोच महिलाओं के ज़हन में भी बैठ गई है यही वजह है कि घर की महिलाएं सबसे पहले लड़कियों पर ऐसे नियम लागू करती हैं। यह रोक-टोक का व्यवहार देखने में हानिकारक नहीं लगता है। लेकिन हर स्थिति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। यह महिलाओं की सामाजिक स्थिति को कमज़ोर करता है। 

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तस्वीर साभारः सान्या मल्होत्रा के इंस्टाग्राम से

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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