महिलाओं की दोस्ती, शोषण से आज़ादी और उनकी मर्ज़ी को उकेरती एक मज़बूत कहानी है पार्च्ड
तस्वीर साभार: NYTimes.com
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हमारे समाज में आमतौर पर महिलाओं को यह अधिकार नहीं होता कि वे जो चाहती हैं उसके अनुसार खुद फैसले ले सकें। वे अपनी जरूरतों और इच्छाओं को स्पष्ट रूप से ज़ाहिर नहीं कर पाती हैं। इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियां किसी न किसी वजह से हमेशा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती रहती हैं। साल 2015 में आई लीना यादव की फिल्म ‘पार्च्ड’ (Parched) ऐसे ही महत्वपूर्ण विषयों को रेखांकित करती है। यह फिल्म समाज में मौजूद रूढ़िवादी सोच, लैंगिक भेदभाव, औरतों के खिलाफ हिंसा और पित्तृसत्तात्मक समाज को बहुत अच्छे ढंग से दिखाती है। पार्च्ड (Parched) का हिंदी अर्थ होता है- सूखा, शुष्क, या झुलसा हुआ। इस शब्द के माध्यम से लीना रेगिस्तान की चार औरतों की निर्मम और झुलसी ज़िंदगी को दिखाने की कोशिश करती हैं। 

कहानी राजस्थान की चार औरतों के इर्द-गिर्द घूमती है। इनकी ज़िंदगी आपस में एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। रानी (तनिष्ठा चटर्जी) एक विधवा के रोल में है जो अपने बेटे गुलाब (रिधि सिंह) की शादी पड़ोसी गांव की एक कम उम्र की लड़की जानकी (लेहर खान) से करती है। जानकी अभी स्कूल में पढ़ ही रही है। शादी से बचने के लिए जानकी अपने लंबे बाल तक काट लेती है, लेकिन इसके बावजूद जानकी की शादी गुलाब से होती है। शादी के बाद गुलाब जानकी को मारता-पीटता है और रानी चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही है। रानी की एक सहेली लाजो (राधिका आप्टे) है। लाजो शादी के बाद मां नहीं बन सकी तो उसका शराबी पति उसे रोजाना बुरी तरह से पीटता है जबकि समस्या उसके पति के ही साथ है। बिजली (सुरवीन चावला) एक स्थानीय नर्तकी है और सेक्स वर्क का काम करती है।

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इन महिलाओं का जीवन बेहद दुखद और निराशा से भरा है। पुरुष इन्हें संपत्ति और अपने सुख के साधन के रूप में उपयोग करते हैं। इस पुरुष प्रधान समाज में कुचली जा रही इन महिलाओं का मकसद पुरुषों की कैद से छुटकारा और प्रताड़ना से मुक्ति पाना है। कहानी की शुरुआत से ही समाज में मौजूद पित्तृसत्ता की क्रूरता को देखा जा सकता है। पार्च्ड (Parched) की शुरुआत में गांव की पंचायत एक औरत को अपने पति के घर लौटने का फैसला सुनाती है। पंचायत कहती है कि शादी के बाद एक स्त्री का सबकुछ उसका पति और उसका असली घर पति का घर ही होता है, उसे वहां जाना ही पड़ेगा। महिला अपने पति के घर वापस नहीं जाना चाहती, क्योंकि वहां उसका बूढ़ा ससुर उसका यौन शोषण करता है। महिला की बात कोई नहीं सुनता है। वह बार-बार अपनी माँ से अपना दर्द बताती है लेकिन मां भी अपनी बेटी की बात नहीं सुनती। 

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तस्वीर साभार: The Tempest

फिल्म कई सारे मुद्दों की तरफ ध्यान आकर्षित करती है जैसे- बाल विवाह, ग्रामीण समाज में पंचायतों का एकतरफ़ा फैसला, पुरुष प्रधानता, घरेलू हिंसा, मैरिटल रेप, दहेज प्रथा, सेक्सवर्कर्स की समाज में स्थिति और महिलाओं पर अत्याचार। लाजो, रानी और बिजली तीनों दोस्त हैं और आपस में एक-दूसरे का दुख बांटती हैं। दुख से भरी जिंदगी में तीनों सहेलियां कुछ पल खुशियों के भी चुरा लेती हैं। फिल्म में तनिष्ठा ने अपनी दमदार एक्टिंग से कैरेक्टर में जान डाल दी है। सुरवीन चावला भी अपने रोल से न्याय करने में कामयाब रही हैं। राधिका आप्टे ने भी बेहद ही बोल्ड और शानदर अभिनय किया है।

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औरतों की यौन इच्छाओं को प्राथमिकता देती कहानी

इस फिल्म में लीना ने महिलाओं में सेक्स के प्रति विचार को बहुत अच्छे से दिखाया है। इस फिल्म में तीनों नायिकाएं अपनी यौन इच्छाओं पर खुलकर बातें करती हैं। लाजो जिसे शादी के बाद बच्चा नहीं हुआ और उसे बांझ कहकर उसका पति दिन-रात पीटता है। लाजो को बिजली के ज़रिये पता चलता है कि पुरुष भी बांझ हो सकता है। बच्चे की खातिर वह अन्य पुरुष से संबंध बनाकर गर्भवती होती है और सेक्सुअल संतुष्टि भी प्राप्त करती है।

फिल्म दिखाती है किस तरह पुरुष अपनी सेक्सुअल जरूरतों को ‘मर्दानगी’ का नाम देते हैं, और महिलाओं के शरीर को अपनी प्यास बुझाने की चीज मानते हैं लेकिन महिलाओं की सेक्सुअल जरूरत को कोई नहीं समझता। फ़िल्म में एक जगह रानी अपने बेटे गुलाब से कहती है- “मर्द बनना छोड़..पहले इंसान बनना सीख ले।” फिल्म के एक सीन में नायिकाएं गालियों में महिला को ही बुरा भला क्यों कहा जाता है, उस पर सवाल उठाती है और ऐसी गालियां देती है जिसमें पुरुषों को बुरा कहा जाता है।

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फिल्म दिखाती है किस तरह पुरुष अपनी सेक्सुअल जरूरतों को ‘मर्दानगी’ का नाम देते हैं, और महिलाओं के शरीर को अपनी प्यास बुझाने की चीज मानते हैं लेकिन महिलाओं की सेक्सुअल जरूरत को कोई नहीं समझता। फ़िल्म में एक जगह रानी अपने बेटे गुलाब से कहती है- “मर्द बनना छोड़..पहले इंसान बनना सीख ले।”

गांव का एक पढ़ा-लिखा युवा किशन (सुमीत व्यास) महिला सशक्तिकरण के माध्यम से समाज में बदलाव चाहता है। वह मणिपुर की एक महिला से शादी करता है जो पास के गांव में पढ़ाने जाती है। उसको रास्ते में उत्पीड़ित किया जाता है और विदेशी कहकर बुलाया जाता है। किशन गांव की महिलाओं को सिलाई-कसीदाकारी का काम दिलाता है। इसे भी गांव के लोग स्वीकार नहीं करते और उसमें बाधा डालते हैं, उसके साथ मारपीट भी करते हैं। कहानी का यह पक्ष हमारे रूढ़िवादी समाज की परिवर्तन को स्वीकार न कर पाने की कमजोरी और जड़बुद्धि को उजागर करता है। देश में कई समुदाय ऐसे भी है जहां लड़केवालों की तरफ से ‘दहेज’ देने का रिवाज है। इसे हम सीधे-सीधे लड़कियों की खरीद-फरोख्त ही कहें तो भी कुछ गलत नहीं होगा। फ़िल्म में एक लड़की को किसी वस्तु की तरह मोलभाव करके बेचते हुए दिखाया गया है। विधवा रानी अपने बेटे गुलाब की शादी करने के लिए घर गिरवी रखकर दहेज के लिए पैसे जुटाती है।

यह फ़िल्म सेक्सवर्कर्स के जीवन के भावनात्मक पहलू को भी छूती नज़र आती है। फिल्म दिखाती है कि सेक्सवर्कर्स की भी अपनी इच्छाएं होती हैं। वे भी अपने जीवन में प्यार चाहती हैं। एक सीन में बिजली राजू से जो कि उसके लिए एक बिचौलिए का काम करता है, कहती है- “ए राजू..तू जानता है ना तू मेरा सबसे फेवरेट है..छोड़ दे इस जंजाल को…भाग जा..शहर जाकर कोई नौकरी कर..और फिर अपने लिए कोई अच्छी-सी लड़की ढूंढ..और उसे पागलों की तरह प्यार कर..।” दरअसल यह कहीं न कहीं खुद बिजली की ही इच्छा है कि उसे भी कोई प्यार करने वाला मिले और वह इस जंजाल को छोड़ कहीं दूर चली जाए।

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इस फिल्म में लीना ने महिलाओं में सेक्स के प्रति विचार को बहुत अच्छे से दिखाया है। इस फिल्म में तीनों नायिकाएं अपनी यौन इच्छाओं पर खुलकर बातें करती हैं। लाजो जिसे शादी के बाद बच्चा नहीं हुआ और उसे बांझ कहकर उसका पति दिन-रात पीटता है। लाजो को बिजली के ज़रिये पता चलता है कि पुरुष भी बांझ हो सकता है।

फिल्म एक अलग मोड़ तब लेती है जब एक दिन रानी को पता चलता है कि गुलाब ने उसकी आखिरी बचत भी चुरा ली है लेकिन वह जानकी पर आरोप लगाता है और हमला करता है। रानी उसे घर छोड़कर चले जाने के लिए कहती है और वह गुस्से में वहां से चला जाता है। अगले दिन, रानी अपना घर बेच देती है और अपना कर्ज़ चुका देती है। वह जानकी को उसकी शादी से मुक्त कर देती है और उसके बचपन के प्रेमी से मिलवा देती है। जानकी आगे की पढ़ाई जारी रखती है। इधर लाज्जो अपने पति मनोज को अपनी गर्भावस्था के बारे में बताती है तो वह उसे पीटना शुरू कर देता है। रानी लाजो को उसके पति से बचाती है। वह गलती से आग पर गिर जाता है। रानी, ​​लाजो और बिजली अंततः रीति-रिवाजों, परंपराओं, रूढ़िवादी सोच और पितृसत्ता के सभी बंधनों और दुखों से दूर एक बेहतर जीवन की तलाश में गांव से दूर चली जाती है और कहानी यहीं खत्म हो जाती है।

पार्च्ड (Parched) एक 2015 की भारतीय ड्रामा फिल्म है जिसे लीना यादव द्वारा लिखित और निर्देशित किया गया है और अजय देवगन फिल्म्स के बैनर तले निर्मित किया गया है। इसका प्रीमियर 2015 के टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के स्पेशल प्रेजेंटेशन सेक्शन में हुआ था। भारत में यह फिल्म 23 सितंबर 2016 को रिलीज़ हुई। इस फिल्म को अभी तक 24 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में दिखाया गया है जिसमें से 18 बार इसे अवार्ड्स से सम्मानित भी किया गया है। ‘शब्द’ और ‘तीन पत्ती’ जैसी फिल्मों की डायरेक्टर लीना ने इस फिल्म में महिलाओं के यौन शोषण के साथ-साथ पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं को एक इस्तेमाल की चीज समझने वाले नजरिए को बेहद बोल्ड अंदाज में पेश किया है।

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तस्वीर साभार : NYTimes.com

मेरा नाम सौम्या है। फिलहाल आईआईएमसी से हिंदी पत्रकारिता कर रही हूँ। नारीवाद को ज़मीनी स्तर पर समझने में मेरी हमेशा से रुचि रही है, खासतौर पर भारतीय नारीवाद को। भारतीय समाज में मौजूद रूढ़िवादिता, धर्म, जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता को गहराई से समझना चाहती हूँ। एक औरत होने के नाते अपनी आवाज के माध्यम से उनकी आवाज बुलंद करना चाहती हूँ।

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