महिला अधिकारों के विरोध की बुनियाद पर खड़ा ‘पुरुष विमर्श’
तस्वीर साभार: Newsclick
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जब से दुनियाभर में नारीवादी आंदोलन शुरू हुआ है और महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई हैं तब से समाज में एक वर्ग ऐसा भी रहा है जिसे खुद की सत्ता छीने जाने का डर है। महिलाओं को सदियों से मर्दवाद से ग्रस्त पुरुषों के अधीन रहना पड़ा है लेकिन 18वीं सदी में नारीवादी आंदोलन ने सदियों से ओढ़ी चुप्पी को उतार फेंका और नारीवादी आंदोलन की शुरूआत हुई। जो नारीवादी आंदोलन राजनीति और समाज में भागीदारी के अधिकार की मांग से शुरू हुआ था वह वर्तमान फोर्थ वेव फेमिनिज़म के अंतर्गत #MeToo आंदोलन के रूप में मुखर हो उठा।

इसमें जहां एक ओर कार्यस्थल पर होनेवाले यौन शोषण के बहुत बड़े खुलासे हुए तो वहीं इस आंदोलन पर पुरुषों को झूठे केस में फंसाने के आरोप भी लगाए गए। जब भी शोषित वर्ग दलित, मुसलमान, आदिवासी, स्त्री, क्वीयर आदि शोषक के हाथों से निकल अपनी स्वतंत्रता, सामाजिक समानता प्राप्त करने की कोशिश करता है या कुछ हद तक पहुंच जाता है तो शोषक वर्ग उस शोषणकारी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नए तरीके अपना लेता है या कहे नए चेहरे ओढ़ लेता है।

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हाल ही में साहित्य में एक नया टर्म या वाद ‘पुरुष विमर्श’ अर्थात नरवाद के नाम से शामिल किया गया है। यह वाद पुरुष अधिकारों की बात करता है साथ ही नारीवादी आंदोलन द्वारा मांगे गए अधिकारों के खिलाफ खड़ा होता है। पुरुष-विमर्श पर नरवाद या पुरुष विमर्श नाम से लेख लिखनेवाले कुशराज की मानसिकता पुरुष अधिकारों की बजाय महिलाओं की नैतिकता और चरित्र पर प्रश्न करती ज्यादा दिखाई देती है। पुरुष विमर्श के नाम पर ये लोग स्त्रियों की नैतिकता और चरित्र पर ही जोर देते नज़र आते हैं। नैतिकता और चरित्र की पवित्रता, जिसकी परिभाषाएं इसी पितृसत्तात्मक समाज ने गढ़ी हैं, जो स्त्रियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं।

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पुरुषों के अधिकार आंदोलन में आम तौर पर ऐसे दृष्टिकोण शामिल होते हैं जो नारीवादी और नारीवादी विचारों को अस्वीकार करते हैं। पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि नारीवाद ने अपने उद्देश्य को कट्टरपंथी बना दिया है और पुरुषों को नुकसान पहुंचाया है। पुरुष नारीवाद और समाज में ‘नारीवाद’ प्रभावों के शिकार हैं सार्वजनिक संस्थाएं अब पुरुषों के साथ भेदभाव करती हैं। इनका आरोप है कि नारीवादी महिलाएं पुरुषों की समस्याओं को छिपाकर अपनी समस्याएं केवल केंद्र में रखना चाहती हैं।

जैसा कि ब्लॉग में इनकी भाषा में दिखता है। “नारीवाद के अति होने के कारण नारीवादी महिलाएं पुरुषों के समान धूम्रपान और शराब पीने लगी हैं जो उनकी संतानों के लिए हानिकारक है।” ऐसा दिखाया जाता है कि वे पुरुषों से बराबरी करने की होड़ के चलते ऐसा करती हैं, मानो पुरुष के धूम्रपान या शराब पीने से उनके बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। इन चीजों का सेवन स्त्री-पुरुष दोनों की सेहत के लिए हानिकारक है। इससे महिलाओं के भी फेफड़े ही खराब होते हैं, तो फिर उनके चरित्र का पतन कैसे हो रहा है? बात यहां बचाव की नहीं है और न ही धूम्रपान और शराब के सेवन को अच्छा कहा जा रहा है। बात यहां चॉइस की है। ऐसी मानसिकता वाले पुरुष अक्सर धूम्रपान या शराब पीनेवाली लड़कियों को अनैतिक और चरित्रहीन होने के प्रमाणपत्र बांटने लगते हैं और उन्हें ‘ईजली अवेलेबल’ मान लेते हैं।

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पुरुषों के अधिकारों के लिए और नारीवाद के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों का कहना है कि स्त्री-विमर्श आज चरमोत्कर्ष पर पहुंच गया है और स्त्रियां हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार पाती जा रही हैं। यहां तक कि इनका मानना है कि कई देशों में आज सामान्य पुरुषों के अधिकारों को छीना जा रहा है, स्त्रियां पुरुषों पर अपना रुतबा जमा रही हैं और उनका शोषण भी कर रही हैं। अगर बात अधिकार छीनने की है तो कैसे? किस तरह स्त्रियां या नारीवाद इनके अधिकार छीन रहा है? किस तरह की समानता और असमानता की बात करता है पुरुष विमर्श? क्या आज भी महिलाएं खुद के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं? क्या उनकी हां या ना को आज भी महत्व दिया जाता है?

हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां आज भी पुरुषों के बीच “लड़कियों की ना में भी हां, हंसी तो फंसी और वो तेरी भाभी है” जैसी घटिया मानसिकता मौजूद है। हर रोज़ महिलाएं बलात्कार, यौन उत्पीड़न, अभद्र टिप्पणी और हर क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव का सामना करती हैं। अगर बात की जाए स्त्रियों की सुरक्षा के लिए बने कानूनों का स्त्रियों द्वारा पुरुषों के खिलाफ इस्तेमाल कर उन पर यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, दहेज के झूठे आरोप लगाने की तो इसे आधार बनाकर नारीवादी आंदोलन और उनके अधिकारों को नकारने की जगह कानूनी व्यवस्था में सुधार और महिलाओं को जागरूक करने की जरूरत है न कि उनके अधिकारों को खत्म करने की। ‘पुरुषों के अधिकार’ के नाम पर जो संगठन ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं दरअसल वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था के ढांचे को बनाए रखने और महिलाओं को वापिस उसी घर की चारदीवारी में भेजना चाहते हैं।

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‘पुरुष विमर्श’ पुरुषों के अधिकार या सिर्फ नारीवादी आंदोलन के मुददों को भटकाने की कोशिश

साहित्य में भले ही वाद के रूप में पुरुष विमर्श आज शामिल किया गया हो लेकिन राजनीतिक आंदोलन के रूप में पुरुषों द्वारा ‘पुरुष अधिकार आंदोलन’ को नारीवादी मुक्ति आंदोलन के विरोध में शुरुआत से ही खड़ा कर दिया गया था। जब से नारीवादी मुक्ति आंदोलन शुरू हुआ है लगभग तभी से उनके विरोधी आंदोलन के रूप में पुरुष अधिकार आंदोलन भी शुरू हो चुका था। ‘पुरुषों के अधिकार’ शब्द का इस्तेमाल फरवरी 1856 में किया गया था जब पुटनम पत्रिका का प्रकाशन हुआ। इससे कुछ साल पहले ही 1850 में नारीवादी आंदोलन की पहली लहर शुरू हो चुकी थी।

अगर बात अधिकार छीनने की है तो कैसे? किस तरह स्त्रियां या नारीवाद इनके अधिकार छीन रहा है? किस तरह की समानता और असमानता की बात करता है पुरुष विमर्श? क्या आज भी महिलाएं खुद के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं? क्या उनकी हां या ना को आज भी महत्व दिया जाता है?

एक तरफ जहां नारीवादी आंदोलन में नारीवादी कार्यकर्ता वोट का अधिकार, समान वेतन, समान शिक्षा और सम्पत्ति पर कानूनी अधिकार, प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी चिकित्सा, गर्भपात कानून, स्त्री यौनिकता, स्वतंत्र निर्णय लेने, यौन शोषण के खिलाफ कानून और तमाम नागरिक अधिकारों को लेकर मांग कर रहीं थी तो वहीं पुरुष अधिकार आंदोलन पुरुषों के अधिकारों जो केवल महिला अधिकारों के विरोध में खड़े हुए थे, जिसमें उनके साथ हुए भेदभाव, पारिवारिक कानून जैसे बाल हिरासत, गुजारा भत्ता, वैवाहिक सम्पत्ति वितरण, प्रजनन, आत्महत्या, पुरुषों के खिलाफ घरेलू हिंसा, शिक्षा भर्ती, सामाजिक सुरक्षा जाल और स्वास्थ्य नीतियां शामिल हैं। पुरुषों के अधिकार कार्यकर्ताओं को रूढ़िवादी संगठनों का समर्थन मिला है और उनके तर्कों को नवरूढ़िवादी मीडिया में व्यापक रूप से कवर किया गया है।

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पुरुषों के अधिकार आंदोलन में आम तौर पर ऐसे दृष्टिकोण शामिल होते हैं जो नारीवाद और नारीवादी विचारों को अस्वीकार करते हैं। पुरुष अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि नारीवाद ने अपने उद्देश्य को कट्टरपंथी बना दिया है और पुरुषों को नुकसान पहुंचाया है। पुरुष नारीवाद और समाज में ‘नारीवाद’ प्रभावों के शिकार हैं सार्वजनिक संस्थाएं अब पुरुषों के साथ भेदभाव करती हैं। इनका आरोप है कि नारीवादी महिलाएं पुरुषों की समस्याओं को छिपाकर अपनी समस्याएं केवल केंद्र में रखना चाहती हैं।

भारत में पुरुषों के अधिकार समूहों ने पुरुषों के कल्याण मंत्रालय और पुरुषों के लिए राष्ट्रीय आयोग के निर्माण या राष्ट्रीय महिला आयोग को खत्म करने की मांग उठाई है। सेव इंडिया फैमिली फाउंडेशन के विराग धूलिया ने भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने के हालिया प्रयासों का विरोध करते हुए तर्क दिया कि अगर इन नियमों को लागू किया जाता है तो कोई भी रिश्ता काम नहीं करेगा।

इस संगठन के अलावा और कई दूसरे संगठन भी थे जो लगातार महिला आंदोलनों और उनके अधिकारों का विरोध कर रहे थे जिनमें फैमिली लॉ रिफॉर्म, पुरुष मुक्ति आंदोलन, 1971 में रिचर्ड डॉयल द्वारा ‘अमेरिकी तलाक सुधार तत्वों का गठबंधन, फ्री मैन इंक, पुरुषों के लिए राष्ट्रीय संगठन की स्थापना जैसे संगठन जिनका उद्देश्य पिता के अधिकारों की सुरक्षा करना है यानि उस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करना। 

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का शिकार पुरुष भी होते हैं, अक्सर परिवार में लड़कों को घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए दबाव डाल दिया जाता है क्योंकि उन घरों में महिलाओं को घर से बाहर निकल काम करने की इजाज़त नहीं होती। उनकी भावनाओं को मर्दपन के पीछे छिपा दिया जाता है। लेकिन आखिरकार यही कहा जा सकता है कि पुरुष विमर्श भी सवर्ण आरक्षण की तरह ही शोषित वर्ग के अधिकारों को हड़पने की कोशिश कर रहा है।

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तस्वीर साभार: Newsclick

मैं दिल्ली से हूँ,  दिल्ली विश्वविद्यालय से  हिंदी साहित्य में एमए किया है। साहित्य और आलोचनाएं पढ़ने के साथ-साथ, कविताएं और लेख लिखना, फिल्में देखना, गाने सुनना और किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना बेहद पसंद है। कहने को बहुत कुछ पर लिखने के लिए शब्द नहीं।

 

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