कपड़े पहनने की आज़ादी
तस्वीर साभार: Wikipedia
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हाल ही में जब एक दिन मैं अपने कुछ कपड़े सिलवाने टेलर के यहां गई तो उसे अपने कुर्ते में जेब बनाने के लिए कहा, जिसे सुनते ही वह टेलर मेरा मुंह ऐसे देखने लगा जैसे मैंने कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो। उसने तुरंत मुझसे सवाल किया, “तुम्हें जेब की क्या ज़रूरत? बाज़ार तो पापा या भाई के साथ ही जाती हो न। गाँव में ये सब फ़ैशन नहीं चलता है।” टेलर की इस बात पर मेरी उससे ख़ूब बहस हुई और आखिरकार उसने मेरे कुर्ते में जेब बनाने के लिए हामी भरी।

इस घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आज हम महिलाओं के आगे बढ़ने की बात करते हैं और कहते हैं कि अब तो उन्हें समाज में पुरुषों के ‘बराबर’ दर्जा मिल गया है। लेकिन सच्चाई तो यही है कि महिलाएं शिक्षा और रोज़गार से जुड़कर भले ही आगे बढ़ने लगी हैं पर अपना समाज अभी भी उसी दक़ियानूसी पितृसत्तात्मक सोच के साथ जी रहा है, जहां महिलाओं का मतलब घर का काम और रोटी-पानी होता है और पुरुषों का काम पैसे कमाने का। यह विचार सिर्फ़ हम लोगों के घर की व्यवस्था में ही नहीं बल्कि पूरे समाज की संरचना में रचा-बसा हुआ है।

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महिलाओं की गतिशीलता को रोकते कपड़े

भारत में महिलाओं के लिए साड़ी सबसे अच्छा और ‘संस्कारी’ कपड़ा माना जाता है। किसी भी ख़ास मौक़े पर हमें साड़ी पहनने की ही सलाह दी जाती है। यह ‘भारतीय संस्कृति’ की पहचान भी है, लेकिन जब हम इस साड़ी के डिज़ाइन को देखते हैं तो यह हम महिलाओं के चलने-फिरने की शक्ति को लगातार प्रभावित करती नज़र आती है। अगर इसे किसी ख़ास मौक़े पर पहना जाए तो अपनी रफ़्तार से चल पाना अपने आपमें बड़ी चुनौती हो जाती है।

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बेबी फ़्रॉक से लेकर सूट-सलवार और साड़ी तक, लड़कियों के लिए तैयार किए गये सभी कपड़ों में कभी भी जेब नहीं होती है। वहीं, बचपन से ही लड़कों को पहनाए जानेवाले हर कपड़े में जेब होती है।

साड़ी के पल्लू से लेकर पैर तक की प्लेट्स में महिलाएं हमेशा उलझी दिखाई पड़ती हैं। अगर किसी काम के दौरान उनका पल्लू ऊपर-नीचे हो जाए उनके चरित्र पर सवाल खड़े होने लगते हैं। साड़ी थोड़ी ऊंची हो और एड़ी दिख जाए तो सवाल खड़े होने लगते हैं, कहने का मतलब है कि साड़ी की इस मुश्किल बनावट के साथ-साथ इसके पहनने के तरीके से महिलाओं के चरित्र को आंका जाता है।

बिना जेब वाले महिलाओं के कपड़े

बेबी फ़्रॉक से लेकर सूट-सलवार और साड़ी तक, लड़कियों के लिए तैयार किए गए सभी कपड़ों में कभी भी जेब नहीं होती है। वहीं, बचपन से ही लड़कों को पहनाए जानेवाले हर कपड़े में जेब होती है। फ़र्क़ साफ़ है, भेदभाव का बीज बचपन से हमें ‘पहनाया’ जाता है ताकि लड़कों के मन में बचपन से ही यह विचार रहे कि उसे अपनी जेब पैसे से भरनी है और लड़कियों के मन में कभी भी यह सवाल न आए कि उन्हें भी पैसे कमाने चाहिए या आर्थिक रूप से सशक्त होना चाहिए। कपड़ों की यह संरचना हमेशा महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी होने के विचार से भी दूर रखती है।  

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महिलाओं के कपड़ों से जुड़ा उनका ‘चरित्र’

सूट-सलवार की चुन्नी हो या साड़ी का पल्लू, महिलाओं के कपड़ों से उनके चरित्र को आंकने की पुरानी परंपरा रही है। यही वजह है कि आज भी अगर किसी भी महिला के साथ यौन उत्पीड़न की घटना होती है तो आँख बंद करके उसके पहनावे को केंद्रित किया जाता है और कह दिया जाता है कि उसके साथ ये हिंसा उसके कपड़ों की वजह से हुई है। आसान शब्दों में समझें तो समाज महिलाओं से यह उम्मीद करता है कि वे हमेशा वैसे ही कपड़े पहनें जो पितृसत्ता ने तय किए हैं। जैसे ही उस कपड़े में थोड़ा भी ढीलापन या महिलाएं अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार बदलाव करने की कोशिश करती हैं तो ऐसा लगता है मानो समाज को उसके साथ हिंसा करने का लाइसेंस मिल गया हो।

कपड़ों के बहाने उम्र के हर पायदान में महिलाओं की यौनिकता का पितृसत्ता का शिकंजा

‘लड़की छोटी है तो फ्रॉक पहनेगी, बड़ी होने पर सूट-सलवार और शादी के बाद साड़ी।’ महिलाओं की ज़िंदगी को उम्र के आधार पर बांटकर पितृसत्ता ने बहुत होशियारी से महिलाओं के कपड़े तय किए हैं। ये कपड़े धीरे-धीरे महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के ख़्याल से दूर कर खुद को संभालने की तरफ़ ज़्यादा ले जाते हैं। जब कोई महिला इसके ख़िलाफ़ जाती है तो उसके चरित्र का आंकलन किया जाता है।

लड़की छोटी है तो फ़्रॉक पहनेगी, बड़ी होने पर सूट-सलवार और शादी के बाद साड़ी। महिलाओं की ज़िंदगी को उम्र के आधार पर बांटकर पितृसत्ता ने बहुत होशियारी से महिलाओं के कपड़े तय किए हैं।

जैसे अगर कोई शादीशुदा औरत आज भी सूट पहने तो उसे बुरे चरित्र वाली महिला माना जाने लगता है पर लड़कों को बचपन से लेकर बुढ़ापे तक शर्ट-पैंट में ही रहने की आज़ादी होती है, मतलब उनके साथ जेब का जुड़ाव जन्म से लेकर मौत तक रहता है। महिलाओं की अपनी पसंद-नापसंद को किनारे करके उनकी उम्र के हर पायदान पर समाज उनकी यौनिकता को कंट्रोल करने का काम करता है, जो खुले तौर पर नहीं बल्कि कपड़ों के बहाने दबी आवाज़ में पर तेज़ी से होता।

महिलाओं के लिए समाज की तरफ़ से तय किए गए कपड़ों की ये कुछ ऐसी ख़ासियत है जो बचपन से ही महिलाओं की आज़ादी, अधिकार और आत्मनिर्भर बनने के ख़्याल से भी दूर रखती है। समय बदला है और समाज भी, पर अभी भी बहुत से ऐसे पहलू है जहां अपनी जगह बनाना मुश्किल है। औरतों का अपने कुर्ते में एक जेब लगवाना भी समाज को फ़िज़ूल का काम लगता है। कहने को तो महिलाएं हर क्षेत्र में मौजूद हैं, महिलाओं का वर्दी पहनना, वकालत की ड्रेस पहनना और जेब वाले ऑफ़िशल सूट पहनना आसान है, पर आधी से अधिक महिलाएं जो सफलता तो क्या घर की चौखट से बाहर अपना कदम निकालने की कोशिश कर रही हैं, उनके लिए आज भी साड़ी से सूट पर आना, अपने सूट में जेब लगवाना, फ़्रॉक की बजाय पैंट पहनना एक बड़ी चुनौती है।

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तस्वीर साभार: Wikipedia

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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