पॉप फेमिनिज़म
तस्वीर साभार: Innovations Origins
FII Hindi is now on Telegram

‘पॉप फेमिनिज़म’ एक ऐसा शब्द है जो ‘पॉप’ या ‘पॉपुलर’ संस्कृति से विकसित हुआ है। ‘पॉप फेमिनिज़म’, नारीवाद का एक ‘डाइल्यूट’ रूप है। यह नारीवाद की एक विशेष धारा है जो नारीवाद को लोकलुभावन, आरामदायक और ‘कूल’ बनाता है। यह नारीवाद के लिए एक दृष्टिकोण है जो मुख्य रूप से युवा महिलाओं, विशेष रूप से सोशल मीडिया प्रभावितों द्वारा बनाए रखा जाता है और बढ़ावा दिया जाता है। पॉप फेमिनिज़म, नारीवाद को, नारीवादी मुद्दे को और इसके विमर्शों को कहीं न कहीं कमज़ोर बनाता है। पॉप फेमिनिज़म मुख्य रूप से उच्च वर्ग, उच्च जाति और कुलीन वर्ग की महिलाओं पर केंद्रित है। 

बिना यह समझे कि कोई महिला एक विशेष कंडीशनिंग, आंतरिक द्वेष और शोषण के परिणामस्वरूप एक निश्चित तरीके से व्यवहार करने का विकल्प चुनती है, इस तरह के पसंद और विकल्प की जांच किए बिना पॉप फेमिनिज़म इसे ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ और ‘व्यक्तिगत चयन’ की तरह प्रस्तुत करता है। पॉप फेमिनिज़म यह जानने की कोशिश तक नहीं करता कि यह चयन लिंग संबंधी अपेक्षाओं से उपजा है या नहीं। 

पॉप फेमिनिज़म, नारीवाद का एक ऐसा रूप है, जो समाज की मौजूदा व्यवस्था और ढांचे से सवाल किए बिना लिंग आधारित चर्चा करने में सहज महसूस करता है। पॉप फेमिनिज़म, महिलाओं को आत्मविश्वास का निर्माण, आत्म-सम्मान की स्थापना और स्वयं के लिए सीमाएं निर्धारित करके आत्म-सुधार के लिए प्रोत्साहित करता है। 

और पढ़ें: गर्ल बॉस फेमिनिज़मः लैंगिक समानता की राह या रुकावट!

Become an FII Member

जाने-अनजाने में पितृसत्ता को बनाए रखना

पॉप फेमिनिज़म कहीं न कहीं पितृसत्ता को ही प्रोत्साहित कर रहा होता है और इसे बढ़ावा देता है। यह नहीं चाहता कि आप पितृसत्ता को खत्म कर दें और यह दिखावा करें कि आपकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सफलता के कारण यह खत्म हो गया है या यह अस्तित्व में है ही नहीं। पॉप फेमिनिज़म के लिए शोषण या दमन का समाधान शोषित या दमन करने की शक्ति को छीनना या खत्म कर देना नहीं है बल्कि कुछ विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं के बीच सत्ता सौंप देना है।

पॉप फेमिनिज़म, नारीवाद को, नारीवादी मुद्दे को और इसके विमर्शों को कहीं न कहीं कमज़ोर बनाता है। पॉप फेमिनिज़म मुख्य रूप उच्च वर्ग, उच्च जाति और कुलीन वर्ग की महिलाओं पर केंद्रित है। 

पॉप फेमिनिज़म, पितृसत्ता को खत्म करने की कोशिश की बजाय कुछ विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं के हाथों में ‘पावर’ देता है और अपने ‘नारीवाद’ के लिए खुद की पीठ थपथपाता है। यह कुछ प्रभावशाली, लोकप्रिय और विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को प्रतीक, मूर्ति या देवी की तरह दिखाता है और उसे नारीवादी चेहरे के रूप में प्रस्तुत करता है।

और पढ़ें: कमोडिटी फेमिनिज़म : जब अपने फायदे के लिए नारीवाद का इस्तेमाल करती हैं कंपनियां

बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद पर आधारित 

पॉप फेमिनिज़म को ‘फील-गुड फेमिनिज़म’, ‘मार्केटप्लेस फेमिनिज़म’, ‘फॉक्स-फेमिनिज़म’ का भी नाम दिया जाता है। महिलाओं को विज्ञापनों में, फिल्मों में, टीवी सीरियलों में या अन्य कई जगहों पर एक वस्तु की तरह दिखाया जाता है, पॉप फेमिनिज़म, व्यक्तिगत चयन और स्वतंत्रता के नाम पर इसको वैध ठहराता है। वैश्वीकरण के इस समय में अपने आसपास की चीजों को देखकर आपकी अपनी जो निजी समझ बनती है उस समझ को बनाने की प्रक्रिया को उपयुक्त मानकर पॉप फेमिनिज़म आपको कहीं ‘ग्लोबली पोजिशन’ कर देता है। इसमें आप बिना संदर्भ जाने उस प्रक्रिया को या उस व्यवहार को उचित समझने लगते हैं और उसे अपनाने लगते हैं।

उदाहरण के तौर पर अगर कोई महिला अपने चेहरे के बाल को हटाती है जबकि उसे ये समझ आ रहा है कि उसे इसकी कोई जरूरत नहीं है, वे इसमें सहज भी हैं लेकिन ‘पॉप’ संस्कृति से विकसित एक विशेष प्रकार की ‘बाॅडी इमेज़’ जो बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद पर आधारित है, आपको व्यक्तिगत चयन के नाम पर एक उपभोक्ता की तरह पेश करता है और आपको ये लगता है कि ये आपका अपना निर्णय है।

यह निर्णय हो सकता है किसी महिला का उसकी व्यक्तिगत असुरक्षा की वजह से भी हो या उसका निजी पसंद हो लेकिन जब कोई महिला इसे बढ़ावा देने लगती है या प्रचार करने लगती है या जो लोग ऐसा नहीं करते हैं उसको अलग तरीके से, हेय दृष्टि से देखती है तब यह एक समस्या बन जाती है। पॉप संस्कृति और पॉप फेमिनिज़म जाने-अनजाने में ऐसा परिप्रेक्ष्य तैयार करता है। 

और पढ़ें: लिपस्टिक फेमिनिज़म: क्या इसे नारी मुक्ति या सशक्तिकरण के रूप में देखा जाना चाहिए?

बेल हुक्स कहती हैं कि आप किसी भी फेमिनिज़म को ‘आइसोलेशन’ में नहीं देख सकते हैं सिर्फ इसलिए कि आपके पास आर्थिक क्षमता आ गई है, आपके चयन के नाम पर, फेमिनिज़म के नाम पर आपके हर व्यवहार को न्यायोचित या नारीवादी नहीं ठहराया जा सकता है। 

पॉप फेमिनिज़म सामाजिक संरचनाओं को चुनौती नहीं देता है, इसलिए यह अधिक आकर्षक और आरामदायक है। इसका उपयोग पूंजीवाद को बढ़ावा देने और कंपनियों द्वारा अपना उत्पाद बेचने के लिए किया जाता है। इसके कई उदाहरण हैं, जैसे करवाचौथ मनाते हुए ‘क्वीयर’ महिलाओं को दिखाकर डाबर अपना फेयरनेस क्रीम बेच रहा है। यहां कंपनी एलजीबीटीक्यूआईए समुदाय का उपयोग अपने उत्पाद को बेचने के लिए करता है और प्रगतिशील होने का दिखावा करता है। पॉप फेमिनिज़म प्रगतिशील होने का दिखावा करता है। यह नारीवाद को असली मुद्दे से भटकाता है और उसके लिए रुकावट बन जाता है। पॉप फेमिनिज़म, कुछ विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं को और उनकी प्रगति को दिखाकर यह प्रस्तुत करने की कोशिश करता है कि लैंगिक समानता हासिल की जा चुकी है।

और पढ़ें: अंग्रेज़ी में इस लेख को पढ़ने के लिए क्लिक करें


तस्वीर साभार: Innovations Origins

मेरा नाम सौम्या है। फिलहाल आईआईएमसी से हिंदी पत्रकारिता कर रही हूँ। नारीवाद को ज़मीनी स्तर पर समझने में मेरी हमेशा से रुचि रही है, खासतौर पर भारतीय नारीवाद को। भारतीय समाज में मौजूद रूढ़िवादिता, धर्म, जाति, वर्ग, लैंगिक असमानता को गहराई से समझना चाहती हूँ। एक औरत होने के नाते अपनी आवाज के माध्यम से उनकी आवाज बुलंद करना चाहती हूँ।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply