शॉट परफ्यूम के रेप कल्चर कंटेंट की आलोचना के बाद लगा बैन
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परफ्यूम ‘शॉट’ के दो विज्ञापनों की एक सीरीज़ पर आखिरकार सोशल मीडिया पर हुए कड़े विरोध और आलोचनाओं के बाद रोक लगा दी गई है। दिल्ली महिला आयोग ने इसके संबंध में सरकार को पत्र लिखा है। सरकार ने कार्रवाई करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूट्यूब और ट्विटर से इसको तुरंत हटाने के आदेश भी जारी किए हैं। बता दें कि इन विज्ञापनों के कॉन्टेंट में रेप कल्चर को सामान्य बनाने और बढ़ावा देने की बात कही गई थी।

विज्ञापन में क्या दिखाया गया है?

बॉडी स्प्रे शॉट के विज्ञापन में दिखाया गया कि एक कमरे में एक लड़का और लड़की साथ में बेड पर बैठे हुए हैं। चार लड़के अचानक से बिना दरवाज़ा खटकाते हुए कमरे में आते हैं। लड़की उन्हें देखकर सहम जाती है। उन लड़कों में से एक लड़का कमरे में मौजूद लड़के से पूछता है, “शॉट मारा लगता है!” कमरे में मौजूद लड़का कहता, “हाँ मारा है।” इसके बाद वे लड़के कहते हैं, “अब हमारी बारी है।” इस बीच लड़की के चेहरे पर आश्चर्य और असुविधा वाले भाव आते हैं। इसके बाद एक लड़का आगे बढ़कर कमरे में मेज पर रखी शॉट परफ्यूम की शीशी उठाता है। लेकिन शीशी उठाने से पहले ऐसा लगता है कि वह लड़का कमरे में मौजूद लड़की की ओर बढ़ रहा है। शीशी उठाने के बाद लड़की के चेहरे पर भाव आते हैं कि वह बच गई।

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विज्ञापन में लड़की और प्रॉडक्ट के साथ-साथ होने की वजह से लड़की को ‘हासिल’ करने वाला संदेश भी दिया जा रहा है। पूरे विज्ञापन में डबल मीनिंग बातों का इस्तेमाल कर टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी को रेप कल्चर प्रमोट करता दिखाया गया है। गैंगरेप जैसी हिंसा को सामान्य और सहज बनाने का संदेश दिया जा रहा है। 

ठीक इसी तरह के कॉन्टेट पर दूसरा विज्ञापन बनाया हुआ है जिसमें एक स्टोर में चार लड़के और एक लड़की को दिखाया गया है। जहां पर शॉट परफ्यूम की शीशी रखी हुई है वहां पर लड़की पहले से मौजूद होती है। तभी लड़के कहते हैं कि हम चार हैं और वो एक, शॉट कौन लगाएगा? उनकी बातों को सुनकर लड़की डरकर पीछे मुड़कर देखती है। सोशल मीडिया पर मौजूद इन विज्ञापनों की दोनो वीडियो में सामूहिक बलात्कार की झलक देखने को मिलती है जिसे समझकर आम जनता और कुछ सेलेब्रिटी ने इसके बारे में ट्वीट किया और उसके बाद सरकार से प्रतिबंध की मांग की गई।  

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इन दोनो विज्ञापनों में साफतौर पर पहली नज़र में देखने पर महिला के साथ जबरदस्ती, गैंगरैप जैसी कहानी देखने को मिलती है। जहां लड़की के चेहरे के भाव से पहले प्रॉडक्ट के प्रमोशन के लिए इस्तेमाल की गई पंचलाइन भी इसी तरह की स्थिति को जाहिर करती है। विज्ञापन में लड़की और प्रॉडक्ट के साथ-साथ होने की वजह से लड़की को ‘हासिल’ करने वाला संदेश भी दिया जा रहा है। पूरे विज्ञापन में डबल मीनिंग बातों का इस्तेमाल कर टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी और रेप कल्चर को प्रमोट करता दिखाया गया है। गैंगरेप जैसी हिंसा को सामान्य और सहज बनाने का संदेश दिया जा रहा है।

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रेप कल्चर क्या है और कैसे यह विज्ञापन इसे बढ़ावा दे रहा है

रेप कल्चर एक ऐसी संस्कृति है जिसमें यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाओं को एक सामान्य व्यवहार बना दिया जाता है। यौन हिंसा को एक आदर्श रूप में देखा जाता है। इस तरह की संस्कृति में रेप पर आधारित जोक्स, सेक्ज़िम, टॉक्सिक मैस्क्युलिनिटी, विक्टिम ब्लेमिंग और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं पर लोगों का व्यवहार साधारण बना रहता है। महिलाओं की स्वायत्ता को कुचलकर उनके ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की घटनाओं के प्रति असंवेदनशीलता जाहिर की जाती है। सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर बलात्कारियों का संरक्षण किया जाता है। महिलाओं के साथ हिंसा की घटना का दोष उन्हें ही दे दिया जाता है। बलात्कार की इस संस्कृति में महिलाओं के साथ शोषण और दमन के व्यवहार को उनके ख़िलाफ़ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। सुरक्षा के नाम पर उनको कैद कर दिया जाता है। 

शॉर्ट परफ्यूम के इन विज्ञापनों में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा की घटना के सीन को क्रिएट कर इन्हीं बातों को सामान्य मानना दिखाया गया है। विज्ञापन में पहली नज़र में लड़कों के बीच होने वाले संवाद से ऐसा लगता है जैसे वे उस लड़की को पाने की बातें कर रहे हैं। विज्ञापन में रेप, लड़कियों के साथ होने वाली हिंसा की बातों को प्रमोशन के लिए इस्तेमाल करना महिलाओं के खिलाफ होनेवाली हिंसा की घटनाओं का नार्मल करना और इसे आम व्यवहार में प्रचारित करना है। पूरे विज्ञापन में लड़की को केंद्र में रखकर बातें कही गई है। परफ्यूम के ऐड में प्रॉडक्ट को पाने के लिए लड़की की मौजूदगी गैरज़रूरी है लेकिन उसको लेकर विज्ञापन बनाना महिलाओं का विज्ञापन जगत में गलत प्रयोग होना दिखाता है। 

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विज्ञापन पर लगा प्रतिबंध 

इन विज्ञापनों पर बड़ी संख्या में लोगों की नज़र जाने और इसका विरोध करने के बाद इन्हें बैन करने की प्रक्रिया शुरू हुई है। कुछ सेलिब्रिटीज़ ने इसे लेकर नाराज़गी जताते हुए ट्वीट किया। मुख्य तौर पर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा था। लेकिन सवाल यह है कि यह विज्ञापन एक पूरी प्रक्रिया के बाद पब्लिश कैसे हुआ है। इससे पहले एक प्रोसेस के तहत विज्ञापन तैयार हुआ है। किसी ने लिखा है, किसी ने इसे पास किया है, कुछ लोगों ने काम किया है लेकिन किसी ने इसे महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा की घटना से नहीं जोड़ा।

विज्ञापन बनने की प्रक्रिया और प्रसारित करने के भी मानदंड हैं। भारतीय विज्ञापन कॉउंसिल के तय कोड के बावजूद इन विज्ञापनों के कॉन्टेंट को लेकर किसी प्रतिक्रिया का ना आना दिखाता है कि रेप और महिला हिंसा की घटनाओं को लेकर हमारे समाज में कितनी ज्यादा अंसवेदनशीलता निहित है। मनोरंजन की दुनिया में खासतौर से यौन हिंसा की घटनाओं को हल्का बनाकर प्रस्तुत करने का तो एक चलन बन गया है।  

द एडवरटाइजिंग स्टैडर्ड कॉउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) में इसको लेकर पहले स्वयं कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं ली गई। यह विज्ञापन एएससीआई के उद्देश्यों का पूरी तरह उल्लघंन कर रहा है बावज़ूद इसका प्रसारण होना दिखाता है कि कैसे भारतीय एजेंसियों में पुरुषों का वर्चस्व, लैंगिक भेदभाव और महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा की घटनाओं के प्रति अंसवेदनशीलता मौजूद है। सोशल मीडिया पर लोगों के विरोध के बाद भारतीय एजेंसियों का हरकत में आना कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है। 

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ट्विटर पर एडवरटाइजिंग काउसिंल को टैग करने के बाद एक ट्वीट पर काउंसिल ने बताया कि एएससीआई ने इन विज्ञापनों को एएससीआई कोड का गंभीर उल्लंघन और सार्वजनिक हिंसा के ख़िलाफ़ बताया है। एएससीआई ने विज्ञापन पर कार्रवाई के संबंध में एक आधिकारिक बयान भी जारी किया है। ट्वीट में कार्रवाई का आश्वासन और प्रतिबंध की बात कही गई है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की सक्रियता के बाद इन विज्ञापनों पर प्रतिबंध लग गया है। लेकिन सवाल यही सामने आता है कि एक पूरी तय प्रक्रिया, मानदंड होने के बावजूद इस तरह के संदेश का प्रसारित होने क्यों दिया गया। क्या ऐसे संदेश प्रसारित हो जाने का मतलब यह है कि भारतीय सूचना तंत्र में बलात्कारियों और बलात्कार की संस्कृति के प्रति सहानुभूति है।

तमाम अलोचनों के बाद लेयर शॉट कंपनी ने अपने ट्विटर हैंडल से एक माफ़ीनामा जारी करते हुए कहा है कि हम सभी को सूचित करना चाहते हैं कि उचित और अनिवार्य मंजूरी के बाद ही हमने विज्ञापन प्रसारित किया है। हमारा किसी की भावनाओं को आहत करने का कोई इरादा नहीं था और न ही किसी भी प्रकार की गलत संस्कृति को बढ़ावा देने का इरादा था। हम विज्ञापन के लिए माफी चाहते हैं, साथ ही हम अपने मीडिया सहयोगियों से इस विज्ञापन के प्रयोग न करने का अनुरोध करते हैं।

यूनिसेफ के जेंडर बायस एंड इंन्लूजन इन एडवरटाइजिंग रिपोर्ट में भारत में विज्ञापनों में महिलाओं के प्रतिनिधत्व और किस तरह भारतीय विज्ञापन जगत में लैंगिक भेदभाव मौजूद उसे विस्तार से लिखा है। यहां महिलाओं का इस्तेमाल स्टीरियोटाइप तरीके से होता आ रहा है। भारतीय विज्ञापन कैसे पक्षपात, सामाजिक पूर्वाग्रहों और असमानता को बढ़ाने का काम करते है। महिला को आकर्षण और एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करने का चलन यहां मौजूद है।

मनोरंजन और किसी प्रॉड्क्ट को बेचने के लिए महिलाओं का विज्ञापनों में एक वस्तु के तौर पर प्रयोग करने का चलन बन गया है। विज्ञापन के माध्यमों से पक्षपात और लैंगिक भेदभाव की जड़ों को मजबूत करने का काम किया जाता है। शॉर्ट परफ्यूम जैसे विज्ञापनों को आना और प्रतिबंध लगने से अलग हमें इंडस्ट्री के रवैय्ये को बदलने की दिशा में बात करने की भी आवश्यकता है। 

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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