उर्वशी वैदः एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के अधिकारों के लिए लड़नेवाली एक सामाजिक कार्यकर्ता
तस्वीर साभारः The Advocate
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उर्वशी वैद भारतीय मूल की अमेरिकी सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, लेखक और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के अधिकारों के लिए काम करनेवाला एक प्रमुख नाम हैं। वह ट्रांस समुदाय के अधिकारों को लागू कराने और समाज में उनकी पहचान को स्थापति करने के क्रम में हमेशा सबसे आगे खड़ी नज़र आती थी। वह जेंडर और सेक्सुअलटी कानून की विशेषज्ञ थीं। उन्होंने नेशनल एलजीबीटीक्यू+ टॉस्क फोर्स में कई पदों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीं। 

प्रांरभिक जीवन

उर्वशी वैद का जन्म 8 अक्टूबर 1958 में नयी दिल्ली में हुआ था। उनके पिता का नाम कृष्ण बलदेव वैद था। वह एक शिक्षिक थे। उनके पिता को न्यूयार्क विश्वविद्यालय, पोट्सडैम में पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया था। उनकी माता का नाम चम्पा बाली वैद था, जो एक कवि और पेंटर थीं। आठ साल की उम्र में पिता की विदेश में नियुक्ति की वजह से वह न्यूयार्क चली गई थीं। उर्वशी की बचपन से ही राजनीतिक विषयों में गहरी रूचि थी। मात्र ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने वियतनाम युद्ध के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन में हिस्सा लिया था। 

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समलैंगिक शादी की मान्यता और सोशल मीडिया के दौर से पहले उर्वशी ट्रांस समुदाय के हित के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए सड़क पर उनके हकों की आवाज़ उठाने में सबसे आगे रहा करती थीं। वह ऐसी कार्यकर्ता थीं जो पुलिस की कार्रवाई से कभी नहीं घबराई। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उन्हें कई बार जेल में भी डाला गया।

साल 1979 में वस्सार कॉलेज से उन्होंने राजनीतिक विज्ञान और अंग्रेजी में स्नातक की डिग्री हासिल की थी। कॉलेज में वह राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह बॉस्टन चली गई। उस समय बॉस्टन गे और लेस्बियन एक्टिविज़म का केंद्र था। वहां उन्होंने 1983 में बोस्टन के नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ से कानून की डिग्री हासिल की। वहां उन्होंने बोस्टन लेस्बियन-गे पॉलिटिकल एलायंस की स्थापना की। यह एक गैर-पक्षपाती राजनीतिक संगठन है जो बॉस्टन में गे समुदाय के लिए काम करता है।

तस्वीर साभार: NPR

वैद ने अपने कानूनी करियर की शुरुआत अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के नेशनल प्रिज़न प्रोजेक्ट में एक स्टाफ अटॉर्नी के रूप में की थी। इसमें उन्होंने जेलों में एचआईवी और एड्स पर काम किया था। साल 1989 में उर्वशी वैद नेशनल गे एंड लेस्बियन टॉस्क फोर्स (एनजीएलटीएफ) की निदेशक नियुक्त हुई। वर्तमान में यह नेशनल एलजीबीटीक्यू टास्क फोर्स के नाम से जाना जाता है। वह इस पद पर 1992 तक बनी रही। उनके नेतृत्व में जल्द ही एनजीएलटीएफ एक प्रतिष्ठित समलैंगिक अधिकार संगठन बना। उन्होंने एलजीबीटीक्यू संगठनों के लिए क्रिएटिंग चेंज कॉफ्रेंस एक वार्षिक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया। नेशनल रिलीजस लीडरशीप राउंडटेबल के तहत उन्होंने धार्मिक नेताओं को जोड़ा।

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एलजीबीटीक्यू+ के अधिकारों में योगदान

समलैंगिक शादी की मान्यता और सोशल मीडिया के दौर से पहले उर्वशी ट्रांस समुदाय के हित के लिए कड़ा संघर्ष करते हुए सड़कों पर उनके हकों की आवाज़ उठाने में सबसे आगे रहा करती थीं। वह ऐसी कार्यकर्ता थीं जो पुलिस की कार्रवाई से कभी नहीं घबराई। विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उन्हें कई बार जेल में भी डाला गया। 1990 के दशक में एड्स का संकट बड़े स्तर पर बना हुआ था। उस पर प्रशासन का ध्यान दिलाने के लिए वह अमेरिकी राष्ट्रपति के भाषण में बाधा पहुंचाने से भी पीछे नहीं हटी थी। उन्होंने हाथ में प्लेकार्ड लेते हुए राष्ट्रपति जार्ज एचडब्ल्यू बुश की स्पीच को बीच में रोक दिया था। सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें वहां से बाहर कर दिया था लेकिन उनके इस कदम ने एड्स रिसर्च के लिए बेहतर फंडिग देने में योगदान दिया था।  

तस्वीर साभार: Pink News

वैद ने ‘लेस्बियन पॉलटिकल एक्शन कमेटी’ (एलपीएसी) को शुरू किया था, जिसे थिंक टैक जस्टिस वर्क कहा जाता था। इस नेटवर्क में नेशनल एलीजीबीटीक्यू एंटी पॉवर्टी एक्शन नेटवर्क और नेशनल एलजीबीटी या एचआईवी क्रिमनल जस्टिस वर्किंग ग्रुप जुड़े हुए थे। वह अमेरिकन एलजीबीटीक्यू+ म्यूजियम ऑफ हिस्ट्री एंड कल्चर की सहसंस्थापक भी थी। उन्होंने ए.सी.एल.यू के बोर्ड में अपनी सेवा दी। वैद ने पाँच साल ‘फोर्ड फाउंडेशन’ के साथ काम किया। इससे अलग वह ‘आर्कस फाउंडेशन’ के साथ कार्यकारी निदेशक के तौर पर जुड़ी रही। साल 2004 से 2014 तक उन्होंने ‘गिल फाउंडेशन’ के साथ काम किया। अप्रैल 2009 में ‘आउट’ मैगजीन ने अमेरिका के सबसे प्रभावशाली एलजीबीटी लोगों में उनका नाम शामिल किया था। 

1993 में वाशिंगटन में गे और लेस्बियन राइट्स मार्च को संबोधित करते हुए उनका कहना था, “गे राइट्स मूवमेंट कोई पार्टी नहीं है। यह कोई लाइफस्टाइल भी नहीं है। यह कोई हेयर स्टाइल नहीं है। यह कोई सनक या फ्रिंज या कोई बीमारी भी नहीं है। न ही यह पाप और मोक्ष के बारे में है। गे राइट्स मूवमेंट अमेरिका की आज़ादी के वादे का एक अभिन्न अंग है।”

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1993 में वाशिंगटन में गे और लेस्बियन राइट्स मार्च को संबोधित करते हुए उनका कहना था, “गे राइट्स मूवमेंट कोई पार्टी नहीं है। यह कोई लाइफस्टाइल भी नहीं है। यह कोई हेयर स्टाइल नहीं है। यह कोई सनक या फ्रिंज या कोई बीमारी भी नहीं है। न ही यह पाप और मोक्ष के बारे में है। गे राइट्स मूवमेंट अमेरिका की आज़ादी के वादे का एक अभिन्न अंग है।”

लेखन कार्य

उर्वशी वैद एक लेखक और रिसर्चर भी थी। उनकी लिखी अनेक किताबें, रिपोर्ट और रिसर्च प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने ‘इरीसिसटेबल रेव्यूलेशन: क्नफ्रंटिंग रेस, क्लास एंड द एशमप्शन ऑफ एलजीबीटी पोलिटिक्स ‘(2012), ‘विर्चुअल इक्वालिटी: द मेनस्ट्रीमिंग ऑफ लेस्बियन एंड गे लिबरेशन’ (1996) लिखी है। इस किताब के लिए उन्होंने ‘स्टोनवेल बुक अवार्ड’ से भी सम्मानित किया गया था। इसके साथ उन्होंने ‘क्रिएटिंग चेंज: पब्लिक पॉलिसी, सेक्सुअलिटी एंड सिविल राइट्स’ (2000) को डॉ. जॉन डीएमिली और डॉ. विलियम टर्नर के साथ मिलकर संपादित भी किया था। एलजीबीटीक्यू+ से जुड़ी कई रिपोर्ट्स भी उन्होंने तैयार करने में योगदान दिया था। 

सम्मान

उर्वशी वैद अपने पूरे जीवन में एलजीबीटीक्यू समुदाय के नागरिक अधिकारों के संघर्ष करती रही। ट्रांस समुदाय के उत्थान के लिए किये गए काम के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया था। 1996 में उन्हें ‘लैम्ब्डा लीगल लैम्ब्डा लिबर्टी अवार्ड’ से सम्मानित किया जा गया था। 1997 में ‘एशियन अमेरिकन लीगल डिफेंस एंड एजुकेशन फंड सिविल राइट्स लीडरशीप अवार्ड’ मिला। 1999 में सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयार्क की तरफ से ‘क्वींस कॉलेज ऑफ लॉ’ की मानद उपाधि मिली। 2002 में उन्हें अमेरिकन फाउंडेशन फॉर एड्स रिसर्च की तरफ से सम्मानित किया गया था। 2010 में उन्हें एलजीबीटीक्यू स्टडीज के लिए सेंटर फॉर एलजीबीटीक्यू स्टडीज केसलर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। साल 2015 में कलामजू कॉलेज की ओर से मानद उपाधि दी गई थी। अपनी मृत्यु से पहले तक उर्वशी वैद ‘द वैद ग्रुप’ के अध्यक्ष के तौर पर काम किया। उर्वशी वैद की मौत 14 मई 2022 को कैंसर से न्यूयार्क में हुई थी। 

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तस्वीर साभारः The Advocate

स्रोतः

Wikipedia

The Quint

Vibesofindia.com

TheNation.com

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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