औरतों का श्रम
तस्वीर साभार: Candid Orange
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“घर में बैठी रहती हो, तुम्हारा काम भी कोई काम है।” यह बात हमने अपने घरों में पुरुषों द्वारा औरतों के लिए अकसर सुनी है। औरतों के घरेलू श्रम को श्रम ही नहीं माना जाता है। उनका श्रम परिवार के लिए कर्तव्य माना जाता है। घरेलू श्रम में उन्हें कोई तनख्वाह नहीं मिलती लेकिन जिस काम को करने पर उन्हें तनख्वाह मिलती भी है वह पुरुषों की तनख्वाह के तुलना में कम होती है। आख़िर ऐसा क्यों है? ऐसा इसीलिए है क्योंकि औरतों की कमाई परिवार के भरण पोषण के लिए पहला ज़रिया नहीं होती। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष की कमाई को उस कमाई के रूप में देखा जाता है जो पारिवारिक भरण-पोषण के लिए ज़रूरी है।

जब महिला कमाती है तो उसे इस धारणा के साथ तनख्वाह दी जाती है कि उसकी कमाई परिवार में एक ‘एडिशनल इनकम’ है जो पुरुष की तुलना में कम भी होगी तो सब ठीक है। वहीं महिलाओं का घरेलू श्रम तो श्रम की श्रेणी में ही नहीं गिना जाता है। आख़िर श्रम की परिभाषा क्या है जिसमें से महिलाओं का घरेलू श्रम बाहर है? लेखिका मैत्रेई कृष्णराज श्रम को ऐसी लाभदायक आर्थिक गतिविधि के रूप में परिभाषित करती हैं जिसमें श्रमिक को भुगतान किया जाता है। वेज वर्क (वेतन आधारित श्रम) प्रमुख श्रम है। 

महिलाएं अपने काम को परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी के रूप में देखती हैं। औरतें कृषि परिवार में खेत-खलिहान का काम भी मौसम दर मौसम करती हैं, वे खुद को मज़दूर की श्रेणी में नहीं रखती ना ही इन कामों के लिए समाज महिला को मज़दूर की तरह देखता है। इसीलिए भी श्रम और उसके भुगतान से महिलाएं वंचित की जाती हैं। 2019 के नवंबर, दिसंबर में नेशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस सर्वे में पाया कि 90 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं अवैतनिक घरेलू काम करती हैं। इसका मतलब घर/परिवार जो सामाजिक ढांचे की इकाई है वह अपने अस्तित्व में बने रहने के लिए पूरी तरह महिलाओं के अवैतनिक श्रम पर टिकी हुई है। 

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स्कूल में जब बच्चे से पूछा जाता है कि मां क्या करती है? तब वह जवाब देता/देती है कि मम्मी घर में रहती है कुछ नहीं करती। हमें ये सिखाना होगा कि मम्मी काम करती है, हमारे घर में जो औरतें हैं वह श्रम करती हैं और इतना करती हैं कि पुरुष उन्हें पूरा भुगतान नहीं कर सकते।

श्रम का लैंगिक विभाजन

महिलाओं के श्रम का कम आंकलन, कम मूल्य, श्रम के लैंगिक विभाजन की देन है। लेकिन श्रम का लैंगिक विभाजन है क्या? पितृसत्तात्मक समाज काम को, काम क्षेत्र को महिला पुरुष में उनके सेक्स, जेंडर की तर्ज़ पर अलग अलग बांट देता है, इसे ही श्रम का लैंगिक विभाजन कहते हैं। जैसे घर की साफ़ सफाई, खाना बनाना, कपड़े धुलना, बच्चे पालना, घर में सभी सदस्यों का ध्यान रखना, आदि महिलाओं के काम बना दिए गए हैं। वहीं, बाहर जाकर कमाना, परिवार के भरण-पोषण के लिए संसाधनों को इकट्ठा करना पुरुषों के काम बना दिए गए हैं। दोनों ही व्यक्ति जब अपने लिए तय गए कामों से अलग कुछ करते हैं तो सामाजिक तिरस्कार के शिकार होते हैं।

“घर में बैठी रहती हो, तुम्हारा काम भी कोई काम है” यह बात हमने अपने घरों में पुरुषों द्वारा औरतों के लिए अकसर सुनी है। औरतें के घरेलू श्रम को श्रम ही नहीं माना जाता है, उनका श्रम परिवार के लिए कर्तव्य माना जाता है।

अभी के वक्त में भी महिला घरेलू काम से अलग बाहर जाकर कोई भी अलग नौकरी करे, वह एक अच्छी महिला के तौर पर तभी स्वीकार की जाती है जब वह अपने लिए तय कामों को ठीक से पूरा करती है। समाज ने जो नियम महिलाओं के लिए बनाए हैं और उनकी धारणा जो गढ़ी है उसने महिलाओं के श्रम को हद प्रभावित किया है। महिलाएं जब घर से निकलकर काम करना चुनें तो उन्हें अधिकतर वे नौकरियां मिलती हैं जो उनके महिला होने से जोड़ी जाती हैं। जैसे एक टीचर जो बच्चों को संभाले क्योंकि बच्चे संभालना औरत का काम है। एक खाना बनाने, सर्व करने, आदि आदि में महिलाओं को ज़्यादा लिया जाता है और भुगतान भी कम दिया जाता है क्योंकि ये धारणा अभी भी पूरी तरह से हमारे बीच बनी हुई है कि महिलाएं पुरुषों के बाद आती हैं इसीलिए उनके साथ हर स्तर पर पुरुषों के मुकाबले कम दिया जाए। 

भारतीय परिपेक्ष्य में चीजें थोड़ी बदलती हैं क्योंकि यहां जाति सामाजिक संरचना का केंद्र है। इसीलिए जब महिला तथाकथित निचली जाति से आती है तब न वह सिर्फ औरतों के लिए गढ़े गए नियमों से बंधी होती है बल्कि जाति आधारित नियमों से भी बंधी होती है। इनका पालन न करने पर न सिर्फ़ घर के पुरुषों की ओर से बाकी तथाकथित उच्च जाति के पुरुष और महिलाओं से भी तिरस्कार सहती हैं। 

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श्रम को नियंत्रित करती सार्वजनिक और निजी पितृसत्ता 

इतिहास काल से राजनीतिक थियोरिस्ट एंगल्स के अनुसार संसाधनों पर पुरुष वर्ग ने कब्ज़ा किया और प्राइवेट प्रॉपर्टी बनानी शुरू की तब समाज मातृसत्ता से पितृसत्ता में बदला और महिलाओं ने अपने सब अधिकार, आधिपत्य गंवा दिए। उन्हें हर तरह से दबा दिया गया और उनके क्षेत्र निर्धारित कर दिए गए कि महिलाओं के क्या काम हैं और उन्हें कहां कैसे रहना है। बतौर एंगल्स ये फीमेल सेक्स की विश्व ऐतिहासिक हार थी। हम इससे यह तो कह सकते हैं कि महिलाओं को दबाने में उनसे संसाधन छीन लिया जाना और बाद में उन्हें प्रॉपर्टी की तरह नियंत्रित करा जाना तमाम कारणों में से उनके पीड़ित होने के प्रमुख कारण है लेकिन हर समाजिक संरचना में यही तर्क लागू होगा ऐसा नहीं है क्योंकि पितृसत्ता एकवचन नहीं, ये हर समाज में एक तरह से काम नहीं करती।

महिलाएं जब घर से निकलकर काम करना चुनें तो उन्हें अधिकतर वे नौकरियां मिलती हैं जो उनके महिला होने से जोड़ी जाती हैं। जैसे एक टीचर जो बच्चों को संभाले क्योंकि बच्चे संभालना औरत का काम है।

पितृसत्ता समाज में मौजूद बाकी सामाजिक संरचनाओं पर भी निर्भर करती है और अलग-अलग तरीके से शोषण के रूप बदलती है। भारत में ये पितृसत्ता वर्ग, जाति, धर्म, नस्ल, जेंडर, आदि संरचनाओं के साथ मिलकर अलग तरह से काम करती है। ठीक इसी तरह ब्रिटिश सोशियोलॉजिस्ट सिल्विया वाल्बी के अनुसार दो तरह की और पितृसत्ता हैं –  पितृसत्ता घर के अंदर यानी निजी पितृसत्ता और बाहरी यानी सार्वजनिक पितृसत्ता।  

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ये दो तरह की पितृसत्ता भारत में बाकी संरचनाओं के साथ मिलकर औरत के श्रम को नियंत्रित करती है। निजी क्षेत्र यानी परिवार/घर में पति, पिता यानी घर के पुरुष सीधे दमनकर्ता होते हैं और महिलाओं को बाहर के क्षेत्र में जाने से रोकते हैं और इसमें बाकी आधिकारिक संस्थाएं मिलकर काम करती हैं। भारत के परिपेक्ष्य में तथाकथित उच्च जाति की महिलाएं घर के बाहर जाकर ठीक वे काम नहीं करतीं जो तथाकथित निचली जाति की महिलाएं करती हैं। मसलन आज भी मैला ढोने का काम तथाकथित निचली जाति की महिलाएं जीवन यापन के लिए कर रही हैं। हालांकि, इसका अर्थ ये नहीं कि तथाकथित निचली जाति की महिलाओं पर उनके ऊपर उत्पीड़क के तौर पर उनके घर के पुरुष भागीदार नहीं हैं। 

सार्वजनिक पितृसत्ता वह है जिसमें महिलाओं का बाहरी क्षेत्र से संबंध बनता है और घर के पुरुष सीधे तौर पर दमनकर्ता नहीं होते। सार्वजानिक पितृसत्ता महिलाओं के श्रम का सामूहिक तौर से शोषण करती है। सार्वजनिक जगहों में महिलाओं के श्रम का शोषण किसी भी फैक्ट्री, संस्था आदि जगह हो सकता है। यहां उन्हें बहुत कम वेतन पर रखना, खराब हालातों में रखना, बुनियादी सुविधाएं न होना उनके श्रम को अपने तरीके से इस्तेमाल करना उनके श्रम का शोषण है। हमने अपने घरों में जो जाति, धर्म, आदि के आधार पर महिलाओं के श्रम का ख़ासकर उनके घरेलू श्रम का मज़ाक बनते देखा है।

हमें नीतियों के स्तर पर भी महिलाओं के श्रम को पहचान देनी होगी। महिलाओं को यह समझना होगा कि उनका श्रम सिर्फ घर की ज़िम्मेदारी भर नहीं है बल्कि इसमें उनका शरीर, भाव सब एक बराबर रूप से शामिल हैं। इसीलिए जब तक हमारी सरकारें महिलाओं के घरेलू श्रम को लेकर किसी ठोस नीति को लेकर नहीं आती तब तक महिलाएं अपने लिए खुद बोलें। हालांकि सभी महिलाओं पर बोलने का अधिकार तक नहीं होगा जो कि दोबारा पितृसत्ता के कारणवश है। स्कूल में जब बच्चे से पूछा जाता है कि मां क्या करती है? तब वह जवाब देता/देती है कि मम्मी घर में रहती है कुछ नहीं करती। हमें ये सिखाना होगा कि मम्मी काम करती है, हमारे घर में जो औरतें हैं वह श्रम करती हैं और इतना करती हैं कि पुरुष उन्हें पूरा भुगतान नहीं कर सकते इसीलिए उनके श्रम को श्रम ही नहीं कहा जाता है।

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तस्वीर साभार: Candid Orange

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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