लड़कियों के पढ़ाई और रोज़गार के सपने अक्सर अधूरे क्यों रह जाते हैं?
तस्वीर साभार: जागरण जोश
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बड़ौरा गाँव की रहनेवाली काजल ने अपने परिवार में महिलाओं के आर्थिक रूप से स्वावलंबी न होने की वजह से उन्हें हिंसा का सामना करते हुए देखा था। इसलिए उसने हमेशा से वह ग्रेजुएशन पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी करना चाहती थी। उसने हमेशा पढ़ाई पूरी करके आत्मनिर्भर होने का सपना देखा था। लेकिन परिवारवालों ने उसे सिर्फ़ बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी करने का अवसर दिया। इसके बाद आर्थिक तंगी की दुहाई देकर उसकी शादी करवा दी। काजल कहती है, “मेरा बहुत मन था पढ़ाई करने का लेकिन घरवालों ने आर्थिक तंगी की वजह से आगे पढ़ने नहीं दिया।”

चांदनी बारहवीं कक्षा के बाद ब्यूटी पार्लर का कोर्स करके अपना बिज़नेस शुरू करना चाहती थी। उसने अपनी पढ़ाई के लिए सिर्फ़ बारहवीं तक ही पढ़ाई की मांग की क्योंकि वह आगे की पढ़ाई के पैसे को अपने कौशल विकास में खर्च करना चाहती थी। चांदनी को हमेशा से ही पता था कि अगर उसने ग्रैजुएशन की पढ़ाई और ब्यूटी पार्लर का कोर्स करने की मांग की तो परिवार उसकी मांग को पूरा नहीं करेंगे। इसलिए उसने अपने सपने समेट लिए। लेकिन इसके बावजूद उसे ब्यूटी पार्लर के कोर्स के लिए बहुत ज़्यादा संघर्ष करना पड़ा।कोर्स पूरा करने से पहले ही उसकी शादी कर दी गई। शादी के बाद उसके ससुरालवाले चांदनी को अपना बिज़नस शुरू करवाने के लिए तैयार नहीं हुए और चांदनी का सपना अधूरा रह गया।

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मैं एक मज़दूर परिवार से ताल्लुक़ रखती हूं। मैंने अपना बचपन आर्थिक तंगियों को देखते हुए गुज़ारा है। इन समस्याओं का हल मुझे हमेशा अच्छी पढ़ाई करके नौकरी करना लगता था। इसलिए हमेशा से ही पढ़ाई में मेरी ख़ास रुचि थी। लेकिन आर्थिक तंगी के चलते मैं आठवीं के बाद पढ़ाई नहीं कर सकी। लेकिन मेरे भाई को बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी करवाई गई, यह कहते हुए कि मुझे तो दूसरे घर जाना है लेकिन भाई पढ़ लेगा तो हमारा परिवार चलाएगा।

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ग्रामीण क्षेत्रों में युवा महिलाओं के साथ काम करते हुए ऐसे कई अनुभव अक्सर सामने आते हैं, जब युवा महिलाओं के वे सपने अधूरे रह जाते हैं जो उनके बुनियादी अधिकार से जुड़े हैं।

चांदनी, काजल और मेरी जैसी कई युवा महिलाएं अपने लिए बेहतर और आत्मनिर्भर भविष्य की कल्पना करते हैं पर अफ़सोस उनके सपने अक्सर अधूरे ही रह जाते हैं। हमारे देश में हर नागरिक को शिक्षा, रोज़गार और विकास का अधिकार है। ये उनका मौलिक अधिकार है, जो उन्हें हमारा भारतीय संविधान जन्म से प्रदान करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में युवा महिलाओं के साथ काम करते हुए ऐसे कई अनुभव अक्सर सामने आते हैं, जब युवा महिलाओं के वे सपने अधूरे रह जाते हैं जो उनके बुनियादी अधिकार से जुड़े हैं। इन अनुभवों से मैंने कई बार इसकी वजहों को तलाशने और समझने की कोशिश की, जिसमें मैंने इन निम्नलिखित वजहों को सबसे ज़्यादा प्रभावी पाया।

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जेंडर आधारित कंडिशनिंग

बचपन से ही हमारा समाज जेंडर के आधार पर बच्चों के नाम से लेकर, उसका पहनावा, खानपान, काम और सपने जैसे हर पहलू समाज के बनाए जेंडर आधारित नियमों से प्रभावित होते है। ये जेंडर आधारित कंडिशनिंग ही है जो इंसान को लड़का और लड़की बनाने का काम करते हैं। लड़की है तो खाना और घर का काम ही करेगी। लड़का है तो स्कूल जाएगा और पैसे कमाएगा। सभी के काम बक़ायदा निर्धारित कर दिए जाते हैं। इन कामों के साथ यह भी तय कर दिया जाता है कि उनके अधिकार के दायरे क्या होंगे। यही वजह है कि अगर कोई लड़की पढ़ने या अपने सपने बुनने का ख़्वाब देखे तो इसे हमारा समाज स्वीकार नहीं करता, क्योंकि लड़कियों के लिए पहला काम घर का काम करना है, इसलिए उनके लिए इसे ही वरीयता दी जाती है। ये जेंडर आधारित कंडिशनिंग ही है जो आगे चलकर शिक्षा, शादी और चुनाव के मुद्दे पर जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा को बढ़ावा देती है।

आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा है जो ग़रीबी और पितृसत्ता के ढांचे की वजह से शिक्षा और रोज़गार जैसे मौलिक अधिकारों से दूर रह जाता है।

पितृसत्तात्मक समाज

भारतीय समाज एक पितृसत्तात्मक समाज है, जो पुरुषों को महिलाओं से बेहतर मानता है। इसलिए ज़्यादातर अवसर और अधिकार पुरुषों के हिस्से में जाते हैं। महिलाओं की भूमिका को सिर्फ़ परिवार संभालने और वंश आगे बढ़ाने तक ही सीमित कर दिया गया है। पितृसत्ता हमेशा महिलाओं को हर उस अवसर से दूर रखती है, जिससे वे अपने अधिकारों को जान सके और पितृसत्ता को चुनौती दे सके। इसके लिए अलग-अलग माध्यमों में महिलाओं को ये एहसास करवाया जाता है कि वे पुरुषों से कम हैं। यही वजह है कि आज भी महिलाओं और लड़कियों को घर में बोझ समझा जाता है और जब भी परिवार में किसी भी तरह की दिक़्क़त आती है तो हर समस्या का समाधान लड़की की शादी में ही देखा जाता है।

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क़ानून और सरकारी नीतियों का पालन न होना

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जो अपने नागरिक को बिना किसी भेदभाव के नागरिक होने का दर्जा देता है और इतना ही नहीं उन्हें अपने जीवन में आगे बढ़ने का भी पूरा अवसर देता है। फिर बात चाहे शिक्षा या रोज़गार की हो या फिर शादी की हो। राज्य सरकारें भी अपने-अपने प्रदेश में वंचित व ग्रामीण क्षेत्रों के पिछड़े वर्ग और महिलाओं को समाज में विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए हमेशा अलग-अलग योजनाएं लाती हैं पर इसके बावजूद महिलाएं आज भी इन योजनाओं और अधिकारों का लाभ नहीं ले पाती हैं जिसकी प्रमुख वजह है– क़ानून और सरकारी नीतियों का सही तरीक़े से लागू न होना। ऐसा न होने के पीछे के कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे का भी हाथ है पर जब बात महिला अधिकारों और विकास की आती है समाज में पितृसत्ता कई मायनों में क़ानून से ज़्यादा प्रभावी दिखाई पड़ती है।

ये कुछ ऐसी बुनियादी वजहें जो अक्सर चाँदनी, काजल और मेरी जैसी तमाम लड़कियों के शिक्षा और रोज़गार के सपने को पूरा करने के बीच रोड़ा बनती है। हमें अब यह समझना होगा कि हर नई सरकार महिलाओं के विकास के लिए चाहे कितनी भी योजनाएं बना लें, लेकिन जब तक वे लागू नहीं होंगी ये बातें सिर्फ़ काग़ज़ी ही होंगी। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा है जो ग़रीबी और पितृसत्ता के ढांचे की वजह से शिक्षा और रोज़गार जैसे मौलिक अधिकारों से दूर रह जाता है, जिसपर अब हमें न केवल विचार करने बल्कि काम करने की भी ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार: जागरण जोश

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लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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