बच्चे अपना अधिकतर समय स्कूल में बिताते हैं। यही वह जगह है जहां वे सामाजिक विकास से जुड़ी अन्य चीजें और व्यवहार से परिचित होते हैं। ऐसे में स्कूल में बच्चों के लिए हर लिहाज से एक सुरक्षित माहौल मिलना बहुत आवश्यक है। इसके साथ-साथ उनके हर तरह के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अहमियत देनी भी बहुत ज़रूरी है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारियां देने के लिए स्कूल सबसे मुफीद जगहों में से एक इसलिए साबित हो सकते हैं क्योंकि यहां बच्चा घर से अलग और एक दूसरे माहौल में होता है। जहां वह अलग-अलग लोगों से मिलता है, वहां उसका अनुभव अलग होता है और उसके परिणाम भी अलग होते हैं। हर तरह के बदलावों को समझने के लिए स्कूलों में बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देकर उन्हें बेहतर स्वस्थ्य जीवन जीने के लिए तैयार किया जा सकता है।
यह वास्तविकता है कि स्कूल और पढ़ाई उन प्रमुख वजहों में से एक है जिससे कम उम्र में बच्चे तनाव, दबाव, चिंता, बॉडी इमेज जैसे भावों से परिचत होते हैं। अगर स्कूल सक्रिय तौर पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी गतिविधियों में शामिल है तो मानसिक परेशानियों को समय रहते पहचान कर उनका इलाज किया जा सकता है।
हाल ही में बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को देखते हुए एनसीईआरटी ने स्कूलों के लिए गाइडलाइंस जारी किये हैं जिससे बच्चों के हर तरह के स्वास्थ्य को बेहतर रखा जा सकें। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने छात्रों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को पहचाने के लिए स्कूलों के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं। इसमें स्कूलों में पैनल की स्थापना, स्कूल आधारित मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिए शैक्षणिक सहायता और अभिभावकों को शामिल करना तय किया गया है। स्कूली बच्चों के बीच मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आधार पर एनसीईआरटी ने गाइडलाइंस जारी की है।
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एनसीईआरटी के किए एक सर्वे में कक्षा 6-12 तक के कुल 3,79,842 बच्चे शामिल किए गए जिसमें बच्चों से मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अनेक पहलुओं पर सवाल किए गए जिसमें बॉडी इमेज, तनाव, कम्युनिकेश, दबाव, ध्यान की कमी जैसे मुद्दों को शामिल किया गया था। सर्वे के अनुसार 81 फीसद बच्चों ने तनाव की वजह एग्जाम, रिजल्ट को बताया गया। 84 फीसद ने पढ़ाई में अच्छा करने की जिम्मेदारी को भी माना है। सर्वे में केवल 55 प्रतिशत बच्चे ही अपनी बॉडी इमेज से संतुष्ठ नज़र आए हैं। वहीं 28.4 ने सवाल पूछने में हिचकिचाहट की बात भी मानी हैं। 43 फीसद बच्चों ने मूड स्विंग की बात को स्वीकारा है।
द हिंदू में प्रकाशित ख़बर के अनुसार ‘अर्ली आईडेटिफिकेश ऐंड इंटरवेनशन फॉर मेंटल हेल्थ प्रॉबल्म्स इन स्कूल गोइंग चिल्ड्रेन एंड अलडसेंट’ के तहत स्कूलों में बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सर्वेक्षण किया गया। स्कूलों को आम तौर पर ऐसे स्थान के तौर पर देखा जाता है जहां छात्रों को एक सुरक्षित वातावरण देने की उम्मीद की जाती है। भारत में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्कूल मैनेजमेंट, प्रिंसिपल, टीचर, स्टॉफ और बच्चे एक दिन का लगभग ⅓ और साल के लगभग 220 दिन बिताते हैं।
- अवासीय स्कूल के बच्चे स्कूल समुदाय के बच्चों से अधिक समय स्कूल में गुजारते हैं। गाइडलाइंस में कहा गया है कि स्कूलों और हॉस्टल में सभी बच्चों की सुरक्षा औरहर तरह के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्कूल की है।
- मैनुअल के अनुसार, हर स्कूल या स्कूलों के एक समूह को मानसिक स्वास्थ्य सलाहकार पैनल स्थापित करना चाहिए।
- पैनल की अध्यक्षता प्रिसिंपल द्वारा होनी चाहिए और जिसमें टीचर, माता-पिता, बच्चे और पूर्व छात्र होने चाहिए।
- यह बच्चों में जागरूकता लाने का काम करेगा और साथ ही एक उम्र और जेंडर अप्रोप्रिएट वार्षिक स्कूल मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की योजना भी लागू करनी होगी।
- एनसीआरटीई ने सिफारिश की है कि मानसिक बीमारी को प्रारंभिक स्तर पर पहचाने के लिए टीचर को इसकी ट्रेनिंग मिलनी ज़रूरी है। टीचर को बच्चों में लगाव के मुद्दे, अलगाव, तनाव, स्कूल रिफ्यूजल, संवाद की कमी, व्यवहार, हाइपरएक्टिव, अधिक इंटरनेट का इस्तेमाल, इन्टलेक्चुअल डिसबिलटी और लर्निंग डिसबिलटी को जानने की ट्रेनिंग होनी चाहिए।
- टीचर को बच्चों के साथ बुली (परेशान या बदमाशी करना) के बारे में खुलकर बात करनी चाहिए। बच्चों को डराने-धमकाने के व्यवहार के बारे में जानकारी देनी चाहिए जिससे वे इस तरह के व्यवहार से परिचित हो। साथ ही बच्चों में गलत व्यवहार के बारे में खुलकर बात करने और रिपोर्ट करने का आत्मविश्वास भी बनाना चाहिए।
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क्यों स्कूल में बच्चों के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी शिक्षा है ज़रूरी
वेस्टर्न गवर्नेंस यूनिवर्सिटी में प्रकाशित लेख के मुताबिक ‘द नेशनल एलाइंस ऑन मेंटल इलनेस’ के आकलन के अनुसार पांच में से एक इंसान किसी न किसी तरह के मानसिक बीमारी या डिसऑर्डर का सामना अपने जीवन में करता है। इस तथ्य के अनुसार मानसिक बीमारी शुरू होने की औसतन उम्र 14 साल दर्ज की गई है और अधिकतर युवा होने तक इससे उभरने के लिए किसी तरह की मदद का सहारा नहीं लेते हैं। जिस वजह से बड़ी संख्या में बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। न्यू यार्क मेंटल हेल्थ विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या को सही समय हस्तक्षेप करने से बच्चों के उभरने के सकारात्मक नचीजे सामने आ सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की शिक्षा को स्कूल में शामिल करने का पहला लक्ष्य इससे जुड़ी जानकारी बच्चों को देना है। यदि बच्चे, माता-पिता और शिक्षक मानसिक स्वास्थ्य के महत्व के बारे में परिचित होंगे तो वे पॉजिटिव मानसिक स्वास्थ्य को कायम रखने में कामयाब होंगे। यदि युवा सेल्फ केयर के महत्व को अच्छी तरह से समझेंगे तो वह मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान ज्यादा बेहतर तरीकें से कर पाएंगे। स्कूल स्तर से मानसिक स्वास्थ्य के बारे में जानकारी होने पर उसकी चुनौतियों से निपटने के लिए रणनीति और अन्य अनुभव होंगे जो परेशानी का समाधान निकालने में मदद करेगा। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी होने पर मानसिक बीमारियों की चिंता और डर को दूर किया जा सकता है। शिक्षा के ही माध्यम से मानसिक बीमारियों के बारें में बातचीत करके एक सहज माहौल बनाया जा सकता है और कलंक, अपमान जैसी भावनाओं को खत्म करने का काम किया जा सकता है।
सर्वोदय कन्या विद्यालय में पढ़ाने वाली रोज़ी का इस विषय पर कहना है, “आज हमारा जो लाइफ स्टाइल है उसको देखते हुए मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं बहुत अधिक बढ़ रही है। हम स्कूल के लेवल से बच्चों को इससे जुड़ी जानकारी देंगे तो यह पूरे समाज के लिए ही बेहतर होगा। मानसिक बीमारियों को लेकर हमारा भाषा स्तर बहुत खराब है इसकी एक वजह सही जानकारी न होना है। इसके बारे में खुलकर बात नहीं करना है। स्कूल में बच्चे को शिक्षा के माध्यम से एक सांचे में ढ़ालने का काम किया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में उसके पास सही और शुरूआत से जानकारी होने की वजह से वह खुद की सेहत का ख्याल बेहतर तरीके से रख सकता है और बच्चा को संसेटिव बनाया जा सकता है।”
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भारत के बच्चों के बीच मानसिक स्वास्थ्य की समस्या
यूनिसेफ इंडिया में प्रकाशित लेख के अनुसार ‘द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन 2021’ के मुताबिक़ भारत में 15-24 की उम्र के 14 फीसदी बच्चे डिप्रेस्ड या चीजों को करने में कम रुचि दिखाई। कोविड-19 ने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। केवल 41 फीसदी युवाओं ने ही मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियों में बेहतर सहयोग मिलने की बात मानी हैं। भारत में आज भी बड़ी संख्या में लोग मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं है और न ही इसे गंभीरता से लेते हैं। इंडिया टुडे में प्रकाशित विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत दुनिया का सबसे डिप्रेस्डेड देश है। 10-19 साल का छह में से एक बच्चा और युवा डिप्रेशन का सामना कर रहा है। यहां युवाओं की आत्महत्या के मामले बड़ी संख्या में दर्ज किए जाते हैं।
स्कूल में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी शिक्षा के बारे में सजगता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। एक निजि स्कूल में पढ़ाने वाली चांदनी का कहना है कि, “अगर हम बच्चों में दबाव, तनाव और उनके सीखने की कमी के बारे में अवगत होंगे तो हम बच्चों के बारें में ज्यादा बेहतर तरीके से जान पाएंगे। बच्चों के साथ बात करके उनकी परेशानियों को हल कर पाएंगे। इससे उसकी प्रोग्रेस सही तरीके से होंगे। पढ़ाई का दबाव बच्चों की मेंटल हेल्थ पर असर डालता है इसके अलावा टाइम बदल रहा है तो कम्पीटिशन भी बहुत है। अगर बच्चों और टीचर में इस तरह के इनीशिएटिव से अच्छी बॉड बन सकती है तो यह पूरे सोशल इनवॉयरमेंट के लिए ही बहुत बेतहर होगा।”
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तस्वीर साभारः Children’s Hope India
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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

