स्वास्थ्यमानसिक स्वास्थ्य घरेलू हिंसा के बीच उपेक्षित महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य

घरेलू हिंसा के बीच उपेक्षित महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य

महिलाओं के खिलाफ़ होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा का, फिर वह चाहे वह शारीरिक या फिर यौन, इनका महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा यह हिंसा वैश्विक स्तर पर एक तिहाई से अधिक महिलाओं को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित करने वाली एक सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारी के रूप में पहचान की गई है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में शायद मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसा विषय है जो सबसे ज्यादा उपेक्षित और गैर-ज़रूरी समझा जाता है। हमारे देश की महिलाओं की आधी से ज्यादा आबादी घरेलू हिंसा का सामना करती है। घरेलू हिंसा शब्द का अर्थ घर के भीतर, अपने पति या परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा घर की महिलाओं या अन्य सदस्यों के खिलाफ मनोवैज्ञानिक, शारीरिक या यौन हिंसा है। इस पर कोई बात नहीं करना चाहता क्योंकि यह हिंसा पितृसत्तात्मक व्यवस्था के मानसिक अनुकूलन के कारण सभी को सामान्य लगती है। घरेलू हिंसा को अक्सर शारीरिक हिंसा से ही जोड़कर देखा जाता है। लेकिन घरेलू हिंसा शारीरिक होने के साथ-साथ भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक भी होती है।

घरेलू हिंसा एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट है। कुछ आंकड़ों की समीक्षा से पता चलता है कि दुनिया भर में हर तीन में से एक महिला ने किसी न किसी रूप में इस हिंसा का सामना ज़रूर किया होता है। घरेलू हिंसा लगभग सभी उम्र, समुदायों और आर्थिक वर्गों में पाई जाने वाली हिंसा का सबसे ख़तरनाक रूप है।

महिलाओं के खिलाफ़ होने वाली किसी भी प्रकार की हिंसा का, फिर चाहे वह शारीरिक हो या फिर यौन, इनका महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा यह हिंसा वैश्विक स्तर पर एक तिहाई से अधिक महिलाओं को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित करने वाली एक सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारी के रूप में पहचानी गई है।

जिन महिलाओं ने घरेलू हिंसा का अनुभव किया है, उनमें पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), अवसाद, चिंता और आत्महत्या से मौत के विचारों सहित कई मानसिक परेशानियों से पीड़ित पाया गया है। लेकिन गृहस्थी एवं परिवार को संभालने की जिम्मेदारी के बीच ये महिलाएं इन परेशानियों को नज़रअंदाज़ करते हुए, जीवन का एक सामान्य अंग मान लेती हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शारीरिक और भावनात्मक शोषण घरेलू हिंसा की सर्वाइवर महिला के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से हानिकारक होते हैं। वेबसाइट द कॉन्वर्सेशन द्वारा की गई अध्ययनों की एक समीक्षा से पता चलता है कि PTSD का अनुभव करने की संभावना घरेलू हिंसा का सामना करनेवाली महिलाओं में लगभग सात गुना अधिक होती है। इन महिलाओं में अवसाद विकसित होने की संभावना भी लगभग 2.7 गुना अधिक होती है। इनमें चिंता करने की आदत चार गुना ज्यादा होती है और नशीली दवाओं और शराब के दुरुपयोग की संभावना 6 गुना अधिक होता है। घरेलू हिंसा का अनुभव करने वाली महिलाओं के मन में आत्महत्या से मौत का विचार आने की संभावना तकरीबन 3.5 गुना अधिक होती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ (2009) बताता है कि हर 4 में से 1 वयस्क मानसिक विकार से पीड़ित है। अनेक शोधों से यह भी संकेत मिलता है कि 54-84 फीसदी महिलाएं पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित हैं। 64-77 फीसदी महिलाएं अवसाद से पीड़ित हैं और 38-75 फीसद महिलाएं चिंता से ग्रस्त हैं। इसलिए ऐसा कहना गलत न होगा कि घरेलू हिंसा के सर्वाइवर लोगों को गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा को अनदेखा करना, गंभीर स्वास्थ्य विकारों में बदल सकता है जो अक्सर शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य को थोड़े या लंबे समय के लिए गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। मानसिक रूप से स्वस्थ दिखने वाली महिलाओं में मानसिक परेशानियों के कई लक्षण ऐसे होते हैं जो स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते और आगे चलकर गंभीर रूप धारण कर लेते हैं। परिणामस्वरूप घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा घरेलू हिंसा वैश्विक स्तर पर एक तिहाई से अधिक महिलाओं को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित करने वाली एक सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारी के रूप में पहचानी गई है।

महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा से जुड़े आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि घरेलू हिंसा के मामले अक्सर या तो दर्ज ही नहीं किए जाते और किए भी जाते हैं तो बहुत कम संख्या में। यह किसी चौंकाने वाली बात से कम नहीं कि घरेलू हिंसा के आंकड़े भारत के कई राज्यों में 18 साल से स्थिर ही बने हुए हैं।

हालांकि, ये आंकड़े हिंसा की केवल आधिकारिक रिपोर्टों से संबंधित हैं, वास्तविक आकंड़े इससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाले हो सकते हैं। घरेलू हिंसा की चपेट में आई महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर इसका गहरा प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, लेकिन इनके मानसिक स्वास्थ्य पर किसी का ध्यान नहीं जाता। खुद महिलाएं भी अपने मानसिक अनुकूलन के कारण इसे नज़रअंदाज़ करती हैं।

जिन महिलाओं ने घरेलू हिंसा का अनुभव किया है, उनमें पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD), अवसाद, चिंता और आत्महत्या से मौत के विचारों सहित कई मानसिक परेशानियों से पीड़ित पाया गया है। लेकिन गृहस्थी एवं परिवार को संभालने की जिम्मेदारी के बीच ये महिलाएं इन परेशानियों को नज़रअंदाज़ करते हुए, जीवन का एक सामान्य अंग मान लेती हैं।

घरेलू हिंसा, हिंसा का एक ऐसा क्षेत्र है जो पीड़ित महिलाओं को बिना किसी मानसिक नुकसान का आभास दिलाए उसके मानसिक स्वास्थ्य को पूरी तरह से तहस-नहस कर के रख देता है। यह हिंसा का एक ऐसा रूप है जो पीड़ित महिलाओं के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके मानसिक स्वास्थ्य को बिल्कुल हाशिये पर लेकर चला जाता है। महिलाएं भी अपनी घर-गृहस्थी को सजाने-संवारने और औरत होने की पितृसत्तात्मक सामाजिक कंडीशनिंग के नाम पर इस मानसिक यातना को नज़रअंदाज़ कर उसे सहती रहती हैं।

रूढ़िवादी धाराओं ने उसका इस ढंग से मानसिक अनुकूलन कर दिया है कि उसे ये सारी यातनाएं एकदम सामान्य लगती हैं। वे सोच भी नहीं सकती कि इसका उसके मानसिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि अपने विषय में सोचने के लिए उसके पास समय ही नहीं होता।


About the author(s)

Renu Kumari

Passionate explorer of social development. Master's candidate at Hindu college, University of Delhi. Vice president at Hindi Sahitya Sabha, Department of Hindi, Hindu College. Worked at VIDYA, a teaching NGO under the National Service Scheme of LSR. Worked with SCHOLASTIC INDIA. Translated various books of Scholastic from English to Hindi. Former Hindi language Editor at LSR College magazine. Former president of Editorial Team, Department of Hindi, LSR.

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content