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चेतावनी: आत्महत्या से मौत

इस साल स्वतंत्रता दिवस के अगले ही दिन 40 साल की महिला डॉक्टर अवंतिका भट्टाचार्य की आत्महत्या से मौत हो गई। उन्होंने अपनी मौत से पहले एक फेसबुक पोस्ट भी लिखी थी। यह घटना बंगाल की मीडिया में कुछ दिनों तक चर्चा में रही फिर यह भी भीड़ में खो गई हर ख़बर की तरह। अवंतिका, आठ साल की एक ऑटिस्टिक बच्ची की माँ भी थीं। वह पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर ज़िला सरकारी अस्पताल में ‘कम्यूनिटी मेडिसिन’ की डॉक्टर और असिस्टेंट प्रोफ़ेसर की हैसियत से पिछले आठ सालों से काम कर रही थीं। उनके पति मुर्शिदाबाद ज़िले में सरकारी डॉक्टर हैं। रोज़ कोलकाता के घर में बेटी को अटेंडेंट के भरोसे छोड़कर तकरीबन 12 घंटे सफर और ड्यूटी, फिर वापस आकर बेटी की देखभाल, अवंतिका के आठ साल ऐसे ही बीते। 

पति से दूरी, इस दौरान माँ-बाप की मौत, बच्ची की ज़रूरतें और एक बेहद ज़िम्मेदारी वाला काम। अवंतिका बड़ी हौसले से ज़िंदगी की तमाम चुनौतियों को झेलती रहीं, इसी उम्मीद से की उनका तबादला आखिरकार कोलकाता में हो जाएगा, जहां वह अपनी बच्ची को ज़्यादा समय दे सकेंगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, एक सीनियर डॉक्टर होते हुए भी ट्रांसफर कर दिया गया, जहां उनके लिए अपनी बेटी को ले जाना कतई संभव नहीं था। अपनी नई पोस्टिंग और निरंतर मानसिक तनाव से वह कईं महीनों से बेइंतहा हताश थीं। “Where peace lies for me resignation? After 8 years of peripheral service, again dragged into another peripheral service. In the same capacity. Can’t take it anymore.” इस पोस्ट को लिखने के बाद उन्होंने खुद को आग के हवाले कर दिया।

कम्यूनिटी मेडिसिन की डॉक्टर होने के नाते और अपने अवसाद के कारण अवंतिका को कामकाजी सिंगल मदर्स के मानसिक स्वास्थ्य पर रिसर्च करने का प्रोत्साहन मिला। उन्होंने ऐसी माँओं में डिप्रेशन और स्ट्रेस के कारण और इनके असर पर कईं शोधपत्र भी लिखे, जो इस विषय पर उनकी गहरी चिंता और अंदर की उद्वेग को दर्शाता है। अपनी रिसर्च में अवंतिका ने कई सवालों के उत्तर खोजती थीं, जो पितृसत्तात्मक सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था में हर ऐसी औरत ढूंढती रहती है।

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रोज़ इस देश में लगभग जितनी महिलाओं की मौत आत्महत्या से होती है उनमें एक बड़ी संख्या होती हैं शादीशुदा कामकाजी औरतों की। करोड़ों औरतें रोज़ सुबह काम की ओर निकलतीं हैं। कभी अपनों के लिए तो कभी अपने आप के लिए। पर क्या समाज और राष्ट्र इन्हें कुछ नहीं दे सकता?

आपको हम बता दें कि इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 79 फीसदी भारतीय महिलाएं (15 वर्ष और उससे अधिक आयु की) काम की तलाश तक नहीं करती हैं। वहीं, लैंसेट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 में हर तीसरी महिला जिसकी मौत आत्महत्या से हुई वह भारतीय थी। इसी रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में 37% महिलाएं जिनकी मौत आत्महत्या से हुई वे भारत से थीं। बड़ी संख्या में कामकाजी महिलाएं नियमित रूप से डिप्रेशन और स्ट्रेस संबंधी दूसरी बीमारियों से जुझतीं हैं जिनमें अधिकतर महिलाएं घर और बाहर दोंनो से जुड़े अगिनत दबाव संभालती हैं कि उन्हें ठीक से खाना खाने का भी वक्त नहीं मिल पाता।

जब किसी महिला, किसान या फिर बेरोज़गार नवजवान की आत्महत्या से मौत होती है, तब समाज की ज़्यादातर उंगलियां उन पर ही उठती हैं। आत्महत्या से होनेवाली मौत को लंबे समय तक भारतीय कानून के तहत अपराध माना जाता रहा। आत्महत्या से मौत में नाकाम व्यक्ति को अपराधी करार देते हुए गिरफ्तार किया जाता था। साल 2017 में आत्महत्या को ‘अपराध’ के दायरे से तो बाहर तो कर दिया गया पर अब भी इसे लेकर समाज का नज़रिया सुधरा नहीं है। 

डिप्रेशन से जूझते लोगों की पीड़ा साझा करने ना परिवार, ना समाज, ना सरकार, कोई भी हाथ नहीं बढ़ाता पर मौत के बाद उन्हें डरपोक, एस्केपिस्ट, गैरज़िम्मेदार, मानसिक रूप से बीमार जैसे न जाने कितने ही निष्ठुर तानों से घायल करने सब आगे आ जाते हैं। हालात और मन से घायल अवसादग्रस्त एक इंसान अकेले कितनी हिम्मत से हर दिन अपने बेरुखी ज़िंदगी का सामना करता होगा यह कोई सोचता भी नहीं।

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कामकाजी औरतों की ज़मीनी हक़ीक़त  

काम के लिए बाहर निकलती एक शिक्षित शहरी महिला और गांव-देहात की अनपढ़ असंगठित क्षेत्रों में काम करनेवाली महिलाओं पर पितृसत्तात्मक, आर्थिक, सामाजिक संस्कृति रोज़ अलग-अलग तरह से हावी होती है। इसी विषमता में पली-बढ़ी महिलाओं को भी क्या समाज और परिवारवालों के साथ-साथ खुद से अत्यधिक अपेक्षाएं नहीं होती? पुरुष जहां पत्नी के ऊपर घर और बच्चों का बोझ डाल आराम से निकल सकते हैं वहीं महिलाएं भी तो सबकी और खुद की हर अपेक्षा पर खरी उतरने की कोशिश करती रहती हैं। 

कामकाजी महिलाओं को पुरुषों जैसे कोई सहूलियत नहीं मिलती, चाहे वे समाज के किसी भी तबके से आती हो। बच्चों और घरवालों की देखभाल, अंतहीन घरेलू ज़िम्मेदारियां, अक्सर बच्चों की रहने के लिए कोई सुरक्षित जगह का ना होना, समय पर नौकरी पर पहुंचने और काम करने के निरंतर दबाव, साफ टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाओं का अक्सर ना होना, पुरुष बॉस और सहकर्मियों से आए दिन मिलता लैंगिक भेदभाव, आए दिन काम की योग्यता पर ताने सुनना, मानसिक और यौन उत्पीड़न का सामना करना, पीरियड्स और प्रेग्नेंसी में उचित छुट्टी ना मिलना। मॉल जैसी जगहों पर काम करतीं महिलाओं के लिए बैठने या आराम करने की जगह ना होना। देर रात घर वापस आने का जोख़िम, कभी अपने पहनावे तो कभी तेवर के लिए फिर ‘अपनों’ से ही बातें सुनना। नींद की कमी, शरीर की थकान। उनकी दशों दिशाओं को घेरती हुई परेशानियों की यह लंबी लिस्ट बस दीर्घ हो चलती है समय के साथ। 

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अवंतिका की आत्महत्या से मौत

अवंतिका को सालों यही सब झेलना पड़ा होगा। जहां वह हर रोज़ शारीरिक और मानसिक तौर पर और थकती रहीं, टूटती रहीं। अपने डिप्रेशन के लिए उन्होंने मनोचिकित्सकों की सहायता भी लीं पर समझ भी गई कि अगर वास्तविक तौर पर किसी के जीवन के हालात बेहतर ना हो तो अवसाद से निजात पाना मुश्किल है। शादीशुदा होते हुए भी अवंतिका की स्थिति एक जुझतीं हुई ‘सिंगल माँ’ जैसी ही थी बिल्कुल जिससे शायद उनका अकेलापन और विकट बना। अपनों के मौत या दूर रहने पर उन्होंने अपनी बच्ची को अपने जीने का एकमात्र ज़रिया बनाया और वैसे ही खुश रहने की हर मुमकिन कोशिश करती रहीं। फिर भी अपनी बच्ची की भविष्य की चिंताएं और उसे ज़रूरी वक़्त ना दे पाने का गिल्ट उनको निगलता रहा।

रोज़ इस देश में लगभग जितनी महिलाओं की मौत आत्महत्या से होती है उनमें एक बड़ी संख्या होती हैं शादीशुदा कामकाजी औरतों की। करोड़ों औरतें रोज़ सुबह काम की ओर निकलतीं हैं। कभी अपनों के लिए तो कभी अपने आप के लिए। पर क्या समाज और राष्ट्र इन्हें कुछ नहीं दे सकता? बेहतर तनख्वाह, साफ टॉयलेट, सुरक्षित क्रेश व्यवस्था, पीरियड्स की छुट्टी, बैठने और आराम करने की जगह, घर के पास ट्रांसफर, काम करने की बेहतर स्थिति या वर्कप्लेस में उत्पीड़ित महिलाओं के लिए सही कानून को लागू करना? क्या राष्ट्र के लिए वाकई असंभव है वर्किंग महिलाओं की मौलिक ज़रूरतों को पूरा करना? अवंतिका भट्टाचार्य या उन जैसी हज़ारों महिला जो इस व्यवस्था से हार जाती हैं या वे जो समस्याओं में झुलसकर भी खड़ी होती हैं रोज़। उन सबकी ख़ातिर एक आसान, समालोचना मुक्त, स्वच्छ दुनिया बनाकर राष्ट्र, समाज और परिवार अपने ज़िम्मेदारीओं को तो एक बार निभा ही सकता है ना?

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तस्वीर: श्रेया टिंगल फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

Suchetana is a govt school teacher in rural West Bengal. A restless soul in love with almost every bit of the journey called life and a hopelessly hopeful dreamer-seeker-learner-doer.

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