समाजकानून और नीति भारत में बढ़ती गिग वर्कर्स इकॉनमी और छोटे शहरों में डिलिवरी वर्कर्स का संघर्ष

भारत में बढ़ती गिग वर्कर्स इकॉनमी और छोटे शहरों में डिलिवरी वर्कर्स का संघर्ष

हाल ही में गिग वर्कर्स के कामकाज को लेकर फेयरवर्क इंंडिया रेटिंग 2022 एक रिपोर्ट जारी हुई है। फेयर वर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल लेबर प्लेटफॉर्म की काम करने की स्थितियों का मूल्याकंन करता है। इस रिपोर्ट के अनुसार गिग वर्कर्स जिन कंपनियों के साथ काम करते हैं वे उन्हे उचित वेतन, ठेके, प्रबंधन और बेहतर काम की सुविधाएं नहींं दे पाती है। 

आज के समय में लोगों की अपने घरों में बैठकर फोन के ज़रिये सुविधाएं हासिल करने की पसंद बढ़ती जा रही है। इस तरह से वे इंटरनेट पर खाने-पीने, कपड़े, टैक्सी बुकिंग, दवाईयां, सब्जी लेने तक की सारी सुविधाएं ऑनलाइन पा रहे हैं। इन्हीं ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आज एक बड़ा ऑनलाइन मार्केट बन गया है जिसमें कई बड़ी-बड़ी कंपनियां बाज़ार में आ गई हैं। इनका पहला वादा तेजी से डिलिवरी कर ग्राहक को खुद से जोड़े रखना है। करोड़ों का टर्न ओवर बिजनेस करनेवाली इन कंपनियों के सबसे बड़े सूत्राधार यानी डिलीवरी वर्कर्स हैं। ये लोग सीधे तौर पर कंपनी के कर्मचारी नहीं होते हैं लेकिन कंपनियों की होम डिलीवरी की सेवा बिना इनके अधूरी है। गिग वर्कर्स की श्रेणी में आनेवाले इन कर्मचारियों की स्थिति को लेकर कंपनियों की बात करें तो उनका ग्राफ ज्यादा बेहतर नज़र नहीं आता है। 

भले ही हर साल के होम डिलीवरी प्रॉडक्ट देकर कंपनियां मुनाफा कमा रही हो, बडे़-बड़े विज्ञापन दे रही हो लेकिन जब गिग वर्कर्स के कामकाज की स्थिति की बात आती है तो इनका स्कोर शून्य हो जाता है। हाल ही में गिग वर्कर्स के कामकाज को लेकर फेयरवर्क इंंडिया रेटिंग 2022 एक रिपोर्ट जारी हुई है। फेयर वर्क अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल लेबर प्लेटफॉर्म की काम करने की स्थितियों का मूल्याकंन करता है। इस रिपोर्ट के अनुसार गिग वर्कर्स जिन कंपनियों के साथ काम करते हैं वे उन्हें उचित वेतन, ठेके, प्रबंधन और बेहतर काम की सुविधाएं नहींं दे पाती हैं। 

न्यूज क्लिक में प्रकाशित ख़बर के अनुसार यह रिसर्च रिपोर्ट ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सहयोग सेंटर फॉर आईटी एंड पब्लिक पॉलिसी के नेतृत्व में की गई है। इसमें 12 डिजिटल प्लेटफॉर्म को रेटिंग दी गई है। फेयर वर्क ने काम की स्थिति और गिग वर्कर्स की स्थिति के आंकलन में 12 कंपनियां शामिल हैं। इसमें फ्लिपकार्ट, जोमैटो, बिगबास्केट, स्विगी, अमेजॉन, जेप्टो, पोर्टर जैसी कंपनियों की गिग वर्कर्स के साथ काम करने की स्थिति का आंकलन किया है। इस रिसर्च रिपोर्ट में 10 में से अर्बन कंपनी को सात स्कोर, बिगबास्केट को छह, फ्लिपकार्ट और स्विगी को पांच, जोमेटो को चार, जेप्टो को दो और ग्लोबल बेक्ड को एक नंबर दिया है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि ये कंपनियां जितना उदार प्रचार-प्रसार करती हैं वास्तव में ऐसी नहीं हैं।  

रिपोर्ट में कहा गया है कि बिग बास्केट, फ्लिपकार्ट और अर्बन कंपनी के अलावा कोई अन्य प्लेटफॉर्म कर्मचारियों की आमदनी और उनके द्वारा किए गए काम के घंटों के अनुसार न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित नहीं करता है। दूसरा जब ये कर्मचारी और उनके समूह स्थायी आय के महत्व पर जोर देते हैं तो न्यूनतम वेतन नीति के लिए ये प्लेटफॉर्म सार्वजनिक रूप से बात करने में अनिच्छुक होते हैं या बचते हैं। भारत में गिग वर्कर्स को घंटों के हिसाब से स्थानीय न्यूनतम मजदूरी देने की लिए अधिकतर कंपनियां प्रतिबधता नहीं दिखाती हैं। 

फेयर वर्क ने काम की स्थिति और गिग वर्कर्स की स्थिति के आंकलन में 12 कंपनियां शामिल हैं। इसमें फ्लिपकार्ट, जोमैटो, बिगबास्केट, स्विगी, अमेजॉन, जेप्टो, पोर्टर जैसी कंपनियों की गिग वर्कर्स के साथ काम करने की स्थिति का आंकलन किया है। इस रिसर्च रिपोर्ट में 10 में से अर्बन कंपनी को सात स्कोर, बिगबॉस्केट को छह, फ्लिपकार्ट और स्विगी को पांच, जोमेटो को चार, जेप्टो को दो और ग्लोबल बेक्ड को एक नंबर दिया है। यह रिपोर्ट दिखाती है कि ये कंपनियां जितना उदार प्रचार-प्रसार करती हैं वास्तव में ऐसी नहीं हैं।  

काम के आधार पर भुगतान पानेवाले कर्मचारियों को गिग वर्कर कहा जाता है। ये कर्मचारी स्वतंत्र रूप से कंपनी के साथ काम करते हैं। गिग वर्कर के तौर पर काम करने वाले कर्मचारी और कंपनी के बीच एक समझौता होता है।। इस समझौते के तहत कर्मचारी कंपनी की कॉल पर काम करता है। इस काम के बदले कंपनी गिग वर्कर को भुगतान करती है। इन कर्मचारियों को कंपनी के स्थायी वेतन-भत्ते आदि के तहत लाभ नहीं मिलता है।

छोट शहरों में गिग वर्कर्स की चुनौतियां  

डिजिटल सर्विस का दौर बडे़ शहर, राजधानियों से निकलकर छोटे शहरों, कस्बो और गाँवों में पहुंच गया है। यहां भी लोग धीरे-धीरे इन सेवाओं की और बढ़ रहे हैं और इस वजह सर्विस के लिए डिलीवरी बॉय बनना रोज़गार के तौर पर एक विकल्प बन गया है। गिग वर्कर्स का छोटे शहरों में काम करने के अनुभव, आय, सुरक्षा और भविष्य को लेकर फेमिनिज़म इन इंडिया ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर में डिलीवरी का काम करने वाले कुछ लोगों से बात की। 

“पता नहीं कब कंपनी लॉग ऑउट कर काम देना बंद कर दें”

तस्वीर में अंश।

मुजफ़्फ़रनगर में डिलीवरी बॉय के तौर पर काम करनेवाले अंश लगभग पिछले तीन सालों से काम कर रहे हैं। बीकॉम की पढ़ाई पूरी कर चुके अंश का कहना है, “शुरू में मैंने यह काम पार्ट टाइम के लिए शुरू किया था। कॉलेज के बाद डिलीवरी का काम शुरू किया था। आज से तीन साल पहले तो हमारे शहर में ऑनलाइन डिलीवरी की समझो शुरुआत हुई थी। जब कहीं कुछ काम नहीं मिला तो मैंने यह शुरू कर दिया था। मैं आज भी कई जगह काम की तलाश करता रहता हूं। कुछ स्थायी मिल जाए तो ज्यादा बेहतर रहेगा। हम लोगों की कंपनी में आईडी बनी रहती है उसे हम जुड़े रहते हैं। पता नहीं कब कंपनी आईडी बंद कर दे और कब काम खत्म हो जाएं। यह अनिश्चिता बनी रहती है। दूसरा यहां रहते हुए ज्यादा ग्रोथ नज़र नहीं आती है। एक डिलीवरी का 20-25 रुपया मिलता है और ज़रूरी नहीं है कि हर दिन बेहतर हो और उतनी डिलीवरी मिले ही जितनी एक दिन की औसत तय की हुई है। बस कोई दूसरा काम नहीं होने के कारण विकल्प यही दिखता है तो कर रहे हैं। कहने को जब  ज्वाइन करते हैं तो मेडिकल इंश्योरेंस की बात होती है। अगर किसी तरह की चोट या एक्सीडेंट होता है तो मिलेगा लेकिन ऐसा मैंने किसी को मिलता देखा नहीं है। बस कुछ न होने और खाली रहने से कुछ तो करना चाहिए उस हिसाब से यहां काम कर रहे हैं लेकिन इसमें भविष्य कुछ नज़र नहीं आता।”  

दिनेश (बदला हुआ नाम)।

दिनेश (बदला हुआ नाम) पिछले डेढ़ साल से फूड कंपनी के साथ डिलीवरी का काम कर रहे हैं। उनका कहना है, “पहले के मुकाबले यहां डिलीवरी के काम में मंदी आई है। अब ज्यादा राइडर हो गए हैं। छोटा शहर है तो उसके हिसाब से काम भी बस ठीक-ठाक है। बस एक तरह से गुजारा चल रहा है। इसमें काम करने का एक फायदा यह है कि किसी तरह की बंदिश नहीं है। ना किसी मालिक की चिकचिक है। इसमें मजदूरी जितना कड़ा काम नहीं है। फैक्ट्रियों में भी काम करने पर महीने का यहां इतना ही मिलता है तो यह काम करना चुन लिया था। अब कुछ नये नियम आ गए हैं उसके बाद से थोड़ी चीजें बदल गई हैं। पहले तो हर हफ्ते बोनस भी कमा लेते थे। अब तक तक तो बस गुज़ारा चल रहा है। लेकिन अलग डिलीवरी चार्ज नहीं बढ़ता है और बाकी खर्चे ऐसे ही चलते रहे तो फिर सोचना पड़ेगा। फोन के इंटरनेट और पेट्रोल का खर्चा हमें खुद उठाना पड़ता है। नेट और तेल दोंनो के दाम लगातार बढ़ रहे हैं।”

विशांत इंजीनियरिंग की पढ़ाई करनेवाले छात्र हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वह डिलीवरी बॉय के तौर पर भी पार्ट टाइम काम करते हैं। उनका कहना है,”यहां कोई स्थायी कमाई तो है नहीं। आज लोगों का खाने का मन है तो हम कमा रहे हैं नहीं है तो हम इंतजार करके वापिस चले जाते हैं। दूसरा छोटा शहर में अभी भी लोगों की पुरानी आदतें है। यहां लोग बाहर आकर खुद खाना ज्यादा पसंद करते हैं। इस वजह से सीमित ही काम चलता रहता है।”

हर कस्टमर के व्यवहार और कंपनी के नियम को देखना पड़ता है

तस्वीर में विशांत ऑर्डर लेते हुए।

विशांत इंजीनियरिंग की पढ़ाई करनेवाले छात्र हैं। पढ़ाई के साथ-साथ वह डिलीवरी बॉय के तौर पर भी पार्ट टाइम काम करते हैं। उनका कहना है, “घर की परिस्थितियों को देखते हुए अक्सर छुट्टी और कॉलेज के बाद मैं डिलीवरी का काम करता हूं। इससे मेरी खुद की ज़रूरतों, कॉलेज के साथ कुछ काम करने से खर्चा आसानी से चल रहा है। पिछले दो महीनों से मैं यह काम कर रहा हूं। डिलवरी बॉय के तौर पर काम करने में यहां मुजफ़्फ़रनगर में ज्यादा स्कोप नहीं है। दूसरा डिजिटल पेमैंट भी कम करते हैं अधिकतर कैश ऑन डिलीवरी मिलती है। इसमें एक समस्या यह आती है कि लोग रिसीविंग के लिए फोन नहीं उठाते हैं। ऑर्डर बुक करके के डिलीवरीन लेना हो तो वे फोन नहीं उठाते इस वजह से हमारा नकुसान होता है। हम जगह से जाकर वापस आते हैं। तेल का पैसा तो हमारा लगता है।”

वह आगे बताते हैं, “हर कंपनी के अलग-अलग नियम हैं। हमारे यहां एक फूड कंपनी डिलीवरी रिसीव न होने पर उसे लेती नहीं है तो ऐसे में अगर बड़ी रकम की डिलीवरी हो तो हम कहां से चुकाएंगे। ऐसे नियम की वजह से हम उस कंपनी का कैश ऑन डिलीवरी का ऑर्डर लेने से बचते हैं। अगर हम सालों से इस काम में लगे लोगों की बात करें तो बस सबका काम चल रहा है। यहां कोई स्थायी कमाई तो है नहीं। आज लोगों का खाने का मन है तो हम कमा रहे हैं नहीं है तो हम इंतजार करके वापिस चले जाते हैं। दूसरा छोटा शहर में अभी भी लोगों की पुरानी आदतें है। यहां लोग बाहर आकर खुद खाना ज्यादा पसंद करते हैं। इस वजह से सीमित ही काम चलता रहता है। हां लेट नाइट में ऑर्डर डिलीवरी को लेकर कुछ सुरक्षा को लेकर भी डर रहता है पता नहीं जिसने खाना मंगाया है वो कैसा है।”

तस्वीर में अभिषेक गुप्ता।

अभिषेक गुप्ता काफी समय से डिलीवरी बॉय के तौर पर काम कर रहे हैं। वह ये काम देहरादून में भी कुछ समय कर चुके हैं उसके बाद उन्होंने अपने मुजफ़्फ़रनगर में डिलीवरी का काम करना चुना था। छोटे शहर में काम की चुनौतियों के बारे में बात करते हुए उनका कहना है, “शहर छोटा है तो यानी कस्टमर भी कम हैं। इस वजह से लिमिटेड ही राइड करने का मौका मिलता है। दूसरा यहां लोकेशन की प्रॉब्लम और कस्टमर का व्यवहार भी ज्यादा ठीक नहीं है। ज्यादा दूर की लोकेशन होने पर उस तरह से सुरक्षित नहीं जैसे दिल्ली या देहरादून में है। यहां लोकेशन ढूढ़ने में बहुत परेशानी होती है। रोज़गार के लिए बहुत सुरक्षित विकल्प तो नहीं है लेकिन कुछ तो काम करना है इस वजह से बस इसी में लगे हुए हैं। बहुत डर भी लगता है क्योंकि काम को तय सीमा में करना होता है। तेजी से बाइक चलाकर जाना है। यहां आप महीने की औसत तय कमाई जब ही कमा पाओंगे तब ज्यादा आर्टिकल डिलीवर करेंगे। दूसरा जब कमाने का लालच आता है तो वह फिर टाइम, घंटों को नहीं देखता। मैं सुबह 12 से रात ग्यारह बजे तक डिलीवरी का काम करता हूं। छुट्टी लेना अपने हाथ में होता है तो जब ज़रूरत हो तब ही लेते है। मन से छुट्टी लेकर नुकसान होता है इसलिए बस काम करते हैं।”

अनिश्चिताओं को लेकर रोज काम पर वापस लौटना

ऑर्डर डिलीवरी के लिए जाते हुए संजीव।

संजीव एक निजी कंपनी जो अलग-अलग डिजिटल प्लैटफॉर्म के ऑर्डर डिलीवर करती है उनके लिए काम करते हैं। उनका कहना है, “कोई भी काम आसान तो नहीं है। ऐसे ही डिलीवरी के काम में भी बहुत मुश्किले हैं। हमारी कंपनी सैलरी और पैकेट के आधार पर रखती है। हम आर्टिकल पर काम करते हैं उसमें थोड़ा सैलरी से ज्यादा मिलता है। एक आर्टिकल की डिलीवरी के 13 रुपये मिलते हैं। यहां हर डिलीवरी बॉय के लिए एक रूट तय किया हुआ है उस पर जितने भी ऑर्डर हैं वह डिलीवर करने होते हैं। यह बहुत तय नहीं है कि हर बार आपको ज्यादा डिलीवरी मिलेगी। बहुत बार बहुत कम भी होती है। फिर गुजारिश करके दूसरे खाली रूट की डिलवरी लेते हैं। इस तरह से काम चलता है। कुछ भी तय नहीं है लेकिन हर दूसरे दिन काम पर वापस आ जाते हैं। हमारा पेमेंट हफ्ते में होता है। कुछ बंंधा नहीं है। सुबह लगभग 11 बजे से शाम 6-7 बजे तक काम करता हूं।” 

अभिषेक गुप्ता काफी समय से डिलीवरी बॉय के तौर पर काम कर रहे हैं। वह ये काम देहरादून में भी कुछ समय कर चुके हैं उसके बाद उन्होंने अपने मुजफ़्फ़रनगर में डिलीवरी का काम करना चुना था। छोटे शहर में काम की चुनौतियों के बारे में बात करते हुए उनका कहना है, “शहर छोटा है तो यानी कस्टमर भी कम हैं। इस वजह से लिमिटेड ही राइड करने का मौका मिलता है। दूसरा यहां लोकेशन की प्रॉब्लम और कस्टमर का व्यवहार भी ज्यादा ठीक नहीं है। ज्यादा दूर की लोकेशन होने पर उस तरह से सुरक्षित नहीं जैसे दिल्ली या देहरादून में है। यहां लोकेशन ढूढ़ने में बहुत परेशानी होती है। रोजगार के लिए बहुत सुरक्षित विकल्प तो नहीं है लेकिन कुछ तो काम करना है इस वजह से बस इसी में लगे हुए हैं।”

एक तरफ करोड़ों कमानेवाली कंपनियां हैं तो दूसरी तरफ जिनके दम पर कंपनियां मुनाफा कमाती हैं वे कर्मचारी। सुविधाओं की आदर्श स्तिथि देकर ऑनलाइन शॉपिंग के लिए लोगों को लुभानेवाली ये ही कंपनियां खुद के कर्मचारियों को बेहतर सुविधाओं देने में बहुत पीछे हैं। डिलीवरी बॉय का काम करने वाले कर्मचारी अनिश्चिताओं के आधार पर रोज काम कर रहे हैं जहां कुछ भी तय नहीं है, न समय और न ही वेतन। बाकी अन्य कर्मचारी सुविधाओं और चुनौतियों को लेकर बात करने तो बहुत अलग बात है।

भारत में डिजिटल बाजार जितनी तेजी से बढ़ेगा उतनी तेजी से डिलीवरी के रोजगार भी बढ़ेगा लेकिन बावजूद इसके इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की कार्यस्थल पर होने वाली चुनौतियों और काम के बदले वेतन को अभी गंभीरता से नहीं लिया गया है। इस लेख के दौरान हमने जितने भी डिलीवरी वर्कर्स से बातचीत की उनमें से कुछ को अपनी पहचान जाहिर करने तक को लेकर संदेह था। उनका कहना था कि कहीं कंपनी हमारी किसी बात को बुरा मानकर कंपनी से हमें बैन कर दें। इस दौर में हमारा कोई समूह या वर्ग नहीं है जिससे हम एकता जाहिर कर किसी तरह का दबाव बना सके क्योंकि यहां सब अस्थायी और अनिश्चित है। 


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