संस्कृतिकिताबें बतौर लेखिका शिवरानी देवी के अनुभवों का दस्तावेज है ‘प्रेमचंद घर में’

बतौर लेखिका शिवरानी देवी के अनुभवों का दस्तावेज है ‘प्रेमचंद घर में’

'प्रेमचंद : घर में’ यह किताब शिवरानी देवी द्वारा संस्मरणों की एक शृंखला के रूप में लिखी गई किताब है। हालांकि, शिवरानी देवी ने इसमें जीवनी-लेखन की व्यवस्थित शैली का कोई दावा नहीं किया है, फिर भी यह प्रेमचंद और शिवरानी देवी के जीवनी का एक आरंभिक और प्रामाणिक स्रोत है जो घरेलू होते हुए भी महत्वपूर्ण है।

एक स्त्री के मन की अनगिनत परतों को खोलते हुए ये किताब पितृसत्तात्मक समाज की भी बहुत सी अनदेखी परतों को खोलती है। शिवरानी देवी ने किताब की भूमिका में जो सहजता और साफ़गोई बरती है वह स्त्री चिंतन के लिए महत्वपूर्ण बिंदु है। शिवरानी देवी भूमिका में यह भी लिखती हैं, “पाठकों के सामने इस पुस्तक को रखते हुए मुझे वही सुख अनुभव हो रहा है जो किसी व्यक्ति को अपना कर्तव्य पूरा करने से होता है। इस किताब को लिखने का उद्देश्य उस महान आत्मा की कीर्ति को फैलाना नहीं है जैसा कि अधिकांश जीवनियों का होता है।”

किताब में एक जगह शिवरानी देवी ने लिखा है कि एक बार गोरखपुर में डॉ. एनी बेसेंट की लिखी हुई एक किताब आप लाए। मैंने वह किताब पढ़ने के लिए मांगी। आप बोले, “तुम्हारी समझ में नहीं आएगी।” मैं बोली, “क्यों नहीं आएगी? मुझे दीजिए तो सही।” उसे मैं छह महीने तक पढ़ती रही। रामायण की तरह उसका पाठ करती रही। उसके एक-एक शब्द को मुझे ध्यान में चढ़ा लेना था क्योंकि उन्होंने कहा था कि यह तुम्हारे समझ में नहीं आएगी। मैं उस किताब को ख़तम कर चुकी तो उनके हाथ में देते हुए बोली, “अच्छा, आप इसके बारे में मुझसे पूछिए। मैं इसे पूरा पढ़ गई।” आप हंसते हुए बोले, “अच्छा!” मैं बोली, “आपको बहुत काम रहते भी तो हैं। फिर बेकार आदमी जिस किसी चीज़ के पीछे पड़ेगा, वही पूरा कर देगा।”

प्रेमचंद और शिवरानी देवी, तस्वीर साभार: The Patriot

आगे शिवरानी देवी लिखती हैं, “मेरी कहानियों का अनुवाद अगर किसी और भाषा में होता तो आपको बड़ी प्रसन्नता होती। हां, उस समय हम दोनों को बहुत बुरा लगता, जब दोनों से कहानियां मांगी जातीं या जब कभी प्लाट ढूंढने के कारण मुझे नींद न आती, तब वे कहते, “तुमने क्या अपने लिए एक बला मोल ले ली? आराम से रहती थीं, अब फ़िजूल की एक झंझट ख़रीद ली।” मैं कहती, “आपने नहीं बला मोल ले ली! मैं तो कभी-कभी लिखती हूं, आपने तो अपना पेशा बना रखा है।”

यह किताब पढ़ते हुए आपको एकबारगी यही ख्याल आएगा कि यह महज घरेलू संस्मरण हैं लेकिन प्रेमचंद का स्त्री चिंतन जहां से पल्लवित हुआ जिस स्त्री के साथ चलकर प्रेमचंद की जीवन यात्रा साहित्य के श्रेष्ठतम आयामों को छूती है वह स्त्री शिवरानी देवी हैं। उनके लिखे ये घरेलू संस्मरण अपने साहित्यिक मूल्यों को साथ लेकर चलते हैं।

आप बोलते, “तो उसकी नक़ल तुम क्यों करने लगीं?” मैं कहती, “हमारी इच्छा! मैं भी मज़बूर हूं। आदमी अपने भावों को कहां रखे?” क़िस्मत का खेल कभी नहीं जाना जा सकता। बात यह है कि वे होते तो आज और बात होती। लिखना-पढ़ना तो उनका काम ही था। मैं यह नहीं लिख रही हूं बल्कि शांति पाने का एक बहाना ढूंढ़ रखा है। बीसों वर्ष की पुरानी बातें याद करके मेरा दिल बैठ जाता है। मेरे वश में है ही क्या? हां, पहली बातों को सोचकर मुझे नशा-सा हो जाता है। उस नशे से कोई उत्साह नहीं मिलता, बल्कि एक तड़पन-सी पैदा होती है। अब बीती बातों को याद करके मन बहला लेती हूं। ये एक साहित्य संस्कृति की दुनिया के पति-पत्नी के आपसी संबंध की बात है लेकिन सदियों की स्त्री और पुरुष संबंधों का यह लेखा-जोखा भी है। स्त्री की खुद की इच्छाएं घर-परिवार और जीवनसाथी के आगे हमेशा गौण ही रहीं।”

‘प्रेमचंद : घर में’ यह किताब शिवरानी देवी द्वारा संस्मरणों की एक शृंखला के रूप में लिखी गई किताब है। हालांकि, शिवरानी देवी ने इसमें जीवनी-लेखन की व्यवस्थित शैली का कोई दावा नहीं किया है। फिर भी यह प्रेमचंद और शिवरानी देवी के जीवनी का एक आरंभिक और प्रामाणिक स्रोत है जो घरेलू होते हुए भी महत्वपूर्ण है। शिवरानी देवी ने संस्मरण को प्रसंग और घटनाओं की तरह लिखा है। जो प्रेमचंद की साहित्यिक यात्रा का महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

यह किताब पढ़ते हुए आपको एकबारगी यही ख्याल आएगा कि यह महज घरेलू संस्मरण हैं लेकिन प्रेमचंद का स्त्री चिंतन जहां से पल्लवित हुआ जिस स्त्री के साथ चलकर प्रेमचंद की जीवन यात्रा साहित्य के श्रेष्ठतम आयामों को छूती है वह स्त्री शिवरानी देवी हैं। उनके लिखे ये घरेलू संस्मरण अपने साहित्यिक मूल्यों को साथ लेकर चलते हैं। शिवरानी देवी लिखती हैं, “साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं मानवता की दृष्टि से भी वह व्यक्ति कितना महान, कितना विशाल था यह बताना भी मेरे लिखने का उद्देश्य है और यह बताने का अधिकार जितना मुझे है उतना और किसी को नही है।” 

किताब पढ़कर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शिवरानी देवी ने यह बात साबित भी की प्रेमचंद के साथ के जीवन के सारे संस्मरण बिना अपनी तरफ से कुछ जोड़े उन्होंने ज्यों का त्यों लिख दिया है। संस्मरणों को पढ़ते हुए ये बहुत बार सामने आती है कि शिवरानी देवी ने किताब को साहित्यकार की तरह नहीं लिखा, एक घरेलू स्त्री की दृष्टि से सब बातें याद करते हुए लिखती जा रही हैं।

अधिकार की बात करते हुए शिवरानी देवी जी सजग और ईमानदार हैं किताब पढ़ते हुए लगातार लगता है कि कोई स्त्री अपने अनन्य प्रेमी के लिए सब लिख रही है इतना आदर इतना स्नेह इतना प्रेम और उतनी अपने साथी के लिए चिंता भी। पढ़ते हुए कई बार लगने लगता है कि शिवरानी देवी महज पारंपरिक भारतीय पत्नी हैं पति को देवता माननेवाली। वह खुद दासी और स्वामी शब्द का प्रयोग कर रही हैं और अपने दाम्पत्य के सारे खट्टे-मीठे प्रसंगों को दर्ज कर रही हैं और एक आदर्श दाम्पत्य का विवेचन कर रही हैं। तभी शिवरानी देवी हम सब को चौका देती हैं प्रेमचंद के विवाहेत्तर संबंध को लिखकर। यह किताब पढ़कर और शिवरानी देवी का पूरा व्यक्तित्व पढ़कर ये स्वीकार्यता बहुत बड़ी और दुर्लभ लगती। प्रेमचंद के जीवन के इस संबंध को लिखकर शिवरानी देवी ने यह बात भी साबित की कि स्त्रियां जिस तरह से पतियों के जीवन इन संबंधों को स्वीकार कर लेती हैं और समझ भी लेती हैं, पुरुष स्वीकार भी नहीं कर पाते और समझने की कोशिश भी नहीं करते।

जिस तरह शिवरानी देवी किताब लिख रही थीं उसके ब्लर्ब में ही यह बात स्पष्ट लिखी थी कि इस किताब का उद्देश्य प्रेमचंद की महानता और मनुष्यता को बताना है। उन्होंने लिखा है, “दुख में, सुख में मैं हमेशा उनके साथ उनके बगल में थी आदमी पहचान हमेशा तकलीफ़ के भंवर में पड़कर ही होती है। चूंकि हम दोनों साथ साथ तकलीफों से लड़े, साथ-साथ रोए और हंसे इसलिए उनकी विशालता का थोड़ा सा अंदाजा लगाने का मौका मुझे मिला। किताब लिखते हुए मैंने सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बात का ध्यान रखा है वह है सच्चाई और ईमानदारी।”

किताब पढ़कर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शिवरानी देवी ने यह बात साबित भी की प्रेमचंद के साथ के जीवन के सारे संस्मरण बिना अपनी तरफ से कुछ जोड़े उन्होंने ज्यों का त्यों लिख दिया है। संस्मरणों को पढ़ते हुए ये बहुत बार सामने आती है कि शिवरानी देवी ने किताब को साहित्यकार की तरह नहीं लिखा, एक घरेलू स्त्री की दृष्टि से सब बातें याद करते हुए लिखती जा रही हैं और उन्हें ये लगता भी है कि कोई बात दोबारा तो नहीं लिख रही हैं। इन बातों से पता चलता है कि किताब कितनी सहजता और ईमानदारी से लिखी गई है।

शिवरानी देवी लिखती हैं, “साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं मानवता की दृष्टि से भी वह व्यक्ति कितना महान, कितना विशाल था यह बताना भी मेरे लिखने का उद्देश्य है और यह बताने का अधिकार जितना मुझे है उतना और किसी को नहीं है।” 

संस्मरण के एक अंश में शिवरानी देवी ने प्रेमचंद के विवादस्पद कहानी-संग्रह ‘सोज़े वतन’ का संदर्भ दिया है। प्रकाशन के बाद 1905 में किसी समय इस संग्रह को तब की अंग्रेज़ी सरकार ने सत्ता विरोधी पाया था और उसके लिए लेखक को तलब किया गया। इस अंश में प्रेमचंद के व्यक्तित्व में सच्चे राष्ट्रप्रेमी लेखक के रूप में प्रेमचंद का संघर्ष, दुविधा, उलझन और लेखक-धर्म के प्रति निष्ठा एकसाथ देखने को मिलती है। यहां लेखिका ने ईमानदारी से यह भी स्वीकार किया है कि प्रेमचंद के रचनाकार व्यक्तित्व के सान्निध्य में क्रमशः उनकी रचना-क्षमता का भी विकास हुआ और एक लेखक होने के दैनंदिन अनुभवों को अक्सर उन दोनों ने साथ-साथ महसूस भी किया।

शिवरानी देवी ने कुछ कहानियां और लेख लिखे इस बात का किताब में जिक्र करते हुए वह लिखती हैं, “मेरी पहली ‘साहस’ नाम की कहानी ‘चांद’ में छपी। मैंने वह कहानी उन्हें नहीं दिखाई। ‘चांद’ में आपने देखा। ऊपर आकर मुझसे बोले, “अच्छा, अब आप भी कहानी-लेखिका बन गईं।” फिर बोले, “यह कहानी ऑफ़िस में मैंने देखी। ऑफ़िसवाले पढ़-पढ़कर खूब हंसते रहे। कइयों ने मुझपर संदेह किया।”

शिवरानी देवी लिखती हैं, “शादी के पहले मेरी रुचि साहित्य में बिल्कुल नहीं थी। उसके बारे में मैं कुछ जानती भी नहीं थी। मैं पढ़ी भी नहीं के बराबर थी। उन दिनों मैं अकेले महोबे में रहती थी। वे जब दौरे पर रहते तो मेरे साथ ही सारा समय काटते और अपनी रचनाएं सुनाते। अंग्रेज़ी अखबार पढ़ते तो उसका अनुवाद मुझे सुनाते। उनकी कहानियों को सुनते-सुनते मेरी भी रुचि साहित्य की ओर हुई। जब वह घर पर होते, तब मैं उनसे पढ़ने के लिए कुछ आग्रह करती। सुबह का समय लिखने के लिए वे नियत रखते। दौरे पर भी वे सुबह ही लिखते। बाद को मुआयना करने जाते। इसी तरह मुझे उनके साहित्यिक जीवन के साथ सहयोग करने का अवसर मिलता। जब वे दौरे पर होते, तब मैं दिन भर किताबें पढ़ती रहती। इसी तरह साहित्य में मेरा प्रवेश हुआ।”

यहां शिवरानी देवी लिखती हैं उनके घर रहने पर उन्हें पढ़ने की ज़रूरत महसूस नहीं होती। आगे वह लिखती हैं, “मुझे भी इच्छा होती कि मैं भी कहानी लिखूं। हालांकि, मेरा ज्ञान नाममात्र को भी न था पर मैं इसी कोशिश में रहती कि किसी तरह मैं कोई कहानी लिखूं। उनकी तरह तो क्या लिखती? मैं लिख-लिखकर फाड़ देती और उन्हें दिखाती भी नहीं थी। हां, जब उन पर कोई आलोचना निकलती तो मुझे उसे सुनाते। उनकी अच्छी आलोचना प्रिय लगती। काफ़ी देर तक यह ख़ुशी रहती। मुझे यह जानकार गर्व होता है कि मेरे पति पर यह आलोचना निकली है। जब कभी उनकी कोई कड़ी आलोचना निकलती, तब भी वे उसे बड़े चाव से पढ़ते। मुझे तो बहुत बुरा लगता। मैं इसी तरह कहानियां लिखती और फाड़कर फेंक देती। बाद में गृहस्थी में पड़कर कुछ दिनों के लिए मेरा लिखना छूट गया। हां, कभी कोई भाव मन में आता तो उनसे कहती, इस पर आप कोई कहानी लिख लें। वे ज़रूर उस पर कहानी लिखते।” इस बात से पता चलता है कि प्रेमचंद के लेखन में शिवरानी देवी का कितना सहयोग था।

शिवरानी देवी ने कुछ कहानियां और लेख लिखे इस बात का किताब में जिक्र करते हुए वह लिखती हैं, “मेरी पहली ‘साहस’ नाम की कहानी ‘चांद’ में छपी। मैंने वह कहानी उन्हें नहीं दिखाई। ‘चांद’ में आपने देखा। ऊपर आकर मुझसे बोले, “अच्छा, अब आप भी कहानी-लेखिका बन गईं।” फिर बोले, “यह कहानी ऑफ़िस में मैंने देखी। ऑफ़िसवाले पढ़-पढ़कर खूब हंसते रहे। कइयों ने मुझपर संदेह किया।” किताब का ये अंश पढ़कर लगता है कि हर स्त्री का साहित्यिक जीवन कहीं न कहीं घर गृहस्थी के कारण प्रभावित हुआ उसके व्यक्तित्व का समग्र आ नहीं पाता कहीं कहीं घर परिवार में छूट जाता है।

शिवरानी देवी लिखती हैं, “तब से जो कुछ मैं लिखती, उन्हें दिखा देती। हां, यह ख़याल मुझे ज़रूर रहता कि कहीं मेरी कहानी उनके अनुकरण पर न जा रही हो क्योंकि मैं लोकापवाद से डरती थी।” ये लगभग हर स्त्री लेखक का जीवन है उसके लेखन को हमेशा संदेह से देखा गया। एक घटना का जिक्र करते हुए लिखती हैं कि लखनऊ में वह आंदोलनों में खूब बढ़चढ़कर भाग लेती थीं और वहीं महिला आश्रम में काम करती थीं। एक दिन शिवरानी देवी को पता चला प्रेमचंद जेल जाने वाले हैं वह खुद जेल जाने के लिए तैयार हो गई और प्रेम चंद को ये बात बताई नहीं। जब प्रेमचंद लखनऊ से काशी आए तो शिवरानी देवी ने खुद की गिरफ्तारी दे दी। उन्हें दो महीने की सजा हुई।

लखनऊ आकर प्रेमचंद जेल में शिवरानी देवी से मिलने गए। उन्हें जेल में देखकर प्रेमचंद रो पड़े। कहने लगे, “मैं गिरफ्तारी देने आनेवाला था तुमने गिरफ्तारी क्यों दी।” शिवरानी देवी ने कहा, “आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं था। जेल में और बीमार पड़ जाते।” किताब में बार-बार शिवरानी देवी का अपने साथी प्रेमचंद से प्रेम का ऐसा मार्मिक रूप आता है कि आंखें नम हो जाती हैं। साथ ही यह बात लगातार सालती है कि शिवरानी देवी को पढ़ने-लिखने का वह अवसर न मिला जो प्रेमचंद को मिला।


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