इंटरसेक्शनलजेंडर बृजभूषण सिंह की सभा में आई पितृसत्ता का चारण गाती महिलाएं क्या पितृसत्ता का सच नहीं जानतीं?

बृजभूषण सिंह की सभा में आई पितृसत्ता का चारण गाती महिलाएं क्या पितृसत्ता का सच नहीं जानतीं?

स्त्रीद्वेष का ज़हर हमारे पूरे भारतीय समाज में भरा हुआ है लेकिन कहीं-कहीं की जमीन में स्त्रीद्वेष की इतनी गहरी सतहें हैं कि देखने भर से मन संताप से भर जाता है। यौन उत्पीड़न के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में कुछ महिलाओं की टिप्पणी आई है जो कि बेहद शर्मनाक और स्त्रीद्वेषी ही नहीं पूरी स्त्री अस्मिता की गरिमा पर फेंका गया कीचड़ है। इससे भी दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन लड़ती हुई स्त्रियों के विरोध में सत्ता का चरण पकड़े स्त्रियां ही खड़ी हैं।

वे महिलाएं जिस तरह से महिला पहलवानों के आरोप पर बात कर रही हैं वह पूरा दृश्य ही बेहद विद्रुप लगता है। चाटूकारिता ने जैसे उनकी चेतना को कुंद कर दिया है कि वे खुद को ऑब्जेक्ट की तरह प्रस्तुत कर रही हैं। जैसे स्त्री की इच्छा का कोई महत्व ही नहीं है जो भी है बस सत्ता के शीर्ष पर बैठे उस आरोपी पुरुष की इच्छा ही सर्वोपरि है।वे स्त्रियां इस तरह बात कर रही हैं जैसे वह आरोपी सत्ताधारी पुरुष कोई उद्धारक हो। महिला पहलवानों के लिए उनकी जो अपमानजन बातें हैं वह कोई नयी बात नहीं है। स्त्रियों के प्रतिरोध पर भारतीय पितृसत्तात्मक समाज सदियों से ऐसे ही तर्क देते आया है। वे स्त्रियां घोर मर्दवादी ज़मीन पर खड़ी होकर पितृसत्ता की लाठी लेकर औरतों पर प्रहार कर रही हैं। सत्ता के विरोध में खड़ी स्त्रियों के लिए अश्लील टिप्पणी करती ये स्त्रियां महज पितृसत्तात्मक सत्ता की चाटुकारिता नहीं कर रही हैं। साथ में ये भी दिख रहा है कि समाज में ऐसे लोगों की भीड़ है जो जहां ताकत रहेगी, जहां की जमीन कितनी भी लहूलुहान हो वे वहीं खड़े मिलगें।

आज बृजभूषण शरण सिंह के समर्थन में उतरी ये महिलाएं सत्ता के नशे में चूर हैं वे स्त्रियों की लड़ाई को कमज़ोर करने के लिए इस तरह की भाषा में बात कर रही हैं नहीं तो इस मर्दवादी समाज में हर स्त्री जानती है कि महिला पहलवानों के आरोप में कितनी सच्चाई है। अगर स्त्रियों की आत्मा से पूछा जाए तो उनके जीवन अनुभव में इस तरह के जाने कितने अपराध दर्ज हैं। महिला पहलवानों ने जो आरोप  बृजभूषण शरण सिंह पर लगाया है अपने जीवन में हर स्त्री कभी न कभी उस उत्पीड़न को झेलती ही है जो बेहद चालाकी और धूर्तता से किए जाते हैं। 

बृजभूषण की सभा में आई वे स्त्रियां कह रहीं हैं, “क्या हम लोग महिला पहलवानों से कम सुंदर हैं …और हमारे पास तो कोई ताकत भी नहीं, हमें अपने कमरे में क्यों नहीं बुला लेते सांसद जी।“ इसी तरह की जाने कितनी शर्मनाक बातें वे स्त्रियां कहतीं जा रही हैं। पितृसत्ता की कंडीशनिंग और उनके निजी स्वार्थ ने उन्हें इतना असंवेदनशील बना दिया कि वे अपनी पूरी अस्मिता को झुठला रही हैं। स्त्री चेतना की लड़ाई जिसे लड़कर हमारी पुरखिनें यहां तक लेकर आई हैं जिसे ये महिलाएं पीछे धकेल रही हैं। यहां ग्राम्शी का कथन साकार हो उठता है कि जब शोषक की भाषा शोषित बोलने लगते हैं तो किसी समाज के लिए वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होता है। अन्याय और अतार्किकता में लिपटी वे सदियों की दुहराई जानेवाली गलीज बोली बोलते हुए जिस तरह लहालोट हैं वह किसी गंभीर और ज़िम्मेदार महिलाओं की बोली नहीं हो सकती। निश्चित ही वह भाषा अवैज्ञानिक और गैरबराबरी की सोच में सनी चाटुकार की बोली-भाषा है। ये स्त्रियां सत्ता और पितृसत्ता दोनों के द्वारा इस्तेमाल किया जानेवाला हथियार हैं।

राज्य जब खुद पितृसत्ता का घोर पोषक हो तो समाज में ऐसे लोगों को बल मिलता है जो स्त्रीद्वेषी गतिविधियों में शामिल रहते हैं। ये सत्ता की झंडाबरदार स्त्रियां राज्य की स्त्रीविरोधी सोच की उपज हैं। आज स्त्रियों की परवरिश जिस पितृसत्तात्मक वातावरण में हो रही हैं वह लगभग इसी तरह की स्त्रियों के निर्माण में लगी हुई है। फिर वर्तमान सत्ता ने जिस तरह का सांस्कृतिक वातावरण तैयार किया है वह बहुत खतरनाक तरह से इस मानसिकता को बढ़ावा देता है। पहले तो बतौर स्त्री आपकी चेतना को तहस-नहस करना दूसरा बतौर शोषित भी आपको शोषकों का बगलगीर बनाना। शिक्षा की सही दिशा और वैज्ञानिक चेतना ही इस अंधेरे की तरफ बढ़ते समाज को उबार सकती है नहीं तो घृणा और उन्माद से भरी एक बहुत बड़ी भीड़ मानवीय संवेदनाओं, मूल्यों को कुचलने के लिए तैयार हो रही है।

बृजभूषण की सभा में आई वे स्त्रियां कह रहीं हैं, “क्या हम लोग महिला पहलवानों से कम सुंदर हैं …और हमारे पास तो कोई ताकत भी नहीं, हमें अपने कमरे में क्यों नहीं बुला लेते सांसद जी।“ इसी तरह की जाने कितनी शर्मनाक बातें वे स्त्रियां कहतीं जा रही हैं। पितृसत्ता की कंडीशनिंग और उनके निजी स्वार्थ ने उन्हें इतना असंवेदनशील बना दिया कि वे अपनी पूरी अस्मिता को झुठला रही हैं।

पता नहीं कितनी स्त्रियों ने इस सत्ता समाज से अपनी लड़ाई लड़ी और हार गई हैं लेकिन उस हारी लड़ाई का भी एक अर्थ मिलता है हम स्त्रियों की अस्मिता को। उस लड़ाई से एक संदेश जाता है पूरे मर्दवादी समाज को कि हमें रौंदना इतना आसान नहीं है। कल हो सकता है कि जिस तरह का सत्ता का चलन है कि महिला पहलवान अपनी लड़ाई हार जाएं पर उस हार से भी उनका संघर्ष व्यर्थ नहीं जाएगा। इस तरह के अपराध करने वाले सत्ता में बैठे पुरुष जब यौन उत्पीड़न जैसा अपराध करेंगे तो एकबार सोचेंगे। ऐसा नहीं है कि बृजभूषण शरण सिंह जैसे लोग इस इस तरह की लड़ाई में कुछ खोते नहीं हैं। उनके ऊपर इतने गंभीर आरोप लगने पर यूं ही उन्हें सत्ता का संरक्षण नहीं मिला होगा। आज से कुछ समय पहले एमजे अकबर पर 11 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। सत्ता ने उन्हें भी संरक्षण दिया लेकिन क्या उन्होंने कुछ गंवाया नहीं। इसी तरह ये लड़ाई किसी भी हालत में व्यर्थ नहीं जाएगी। जाने कितनी लड़कियों और स्त्रियों के साथ रोज इस तरह का अन्याय होता है और वे अपनी लड़ाई नहीं लड़ पातीं।

सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहे बृजभूषण शरण सिंह की सभा के उस वीडियो में महिलाओं के साथ एक पुरुष भी महिला पहलवानों पर अश्लील टिप्पणी करने में उनका उनका साथ दे रहा है वो कह रहा ह, “क्या सांसद जी को औरतों की कमी है यहां एक से बढ़कर एक सुंदरियां पड़ी हुई हैं। इस तरह वह पुरुष भी महिला पहलवानों की शक्ल-सूरत पर सवाल कर रहा है। उसके कहने का सीधा अर्थ ये निकल रहा है कि महिला पहलवानों की शक्ल-सूरत इतनी सुंदर नहीं है कि उनके सांसद जी उनका यौन उत्पीड़न करेंगे। वह व्यक्ति जो बातें कह रहा है सदियों से स्त्री का शोषण करन वाला मर्दवादी समाज यही बातें कहता है। कितनी ग़ैर-तार्किक बात है ये कि छोटी बच्चियों का यौन शोषण करनेवाला समाज महिला पहलवानों की शक्ल-सूरत पर बात कर रहा है। यौनकुंठा से भरे समाज में ये दोहरान खूब देखा जा सकता है।

लखनऊ में रहकर नेट परीक्षा की तैयारी करती दिव्या बताती हैं कि सार्वजनिक जगहों पर लड़के जब कॉमेंट पास करते हैं तो अगर लड़की ने विरोध किया तो वे तुरंत लड़कियों की बॉडी शेमिंग पर उतर आते हैं कि जैसे शक्ल देखी अपनी शीशे में? इसी तरह यहीं गाँव के पास कॉलेज में पढ़नेवाली सांची बताती हैं कि पहले तो लड़के बत्तमीजी करते हैं और विरोध करने पर उनके शरीर को लेकर ताने देते हैं।

बहुत पहले टीवी पर एक फ़िल्म देखी थी ‘शीशा’ जिसमें नायिका जहां नौकरी करती है वहां उसका यौन उत्पीड़न होता है। लेकिन वह उनके अन्याय को सहती नहीं बल्कि उसका विरोध करती है। हर बार कार्यस्थल पर ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ वह पुलिस में शिकायत कर देती है। हालांकि, भ्रष्ट तंत्र के कारण वे सब लोग बच निकलते हैं और वह नौकरी के लिए भटकती रहती है। बाद में जहां नौकरी मिलती हैं वहां का मालिक उसका बलात्कार करने की कोशिश करता है। वह पुलिस तक पहुंचती है और मुकदमा चलता है जिसमें आखिरकार वह हार जाती है क्योंकि ऊपर से नीचे तक सब स्त्रीद्वेषी और घूसखोर थे।  फ़िल्म का सबसे बड़ा मुद्दा था कि स्त्री के साथ बलात्कार के केस में उसके पिछले जीवन में जो अन्याय हुए जिसका उसने प्रतिरोध किया था उसी प्रतिरोध को उसपर आरोप बनाया गया कि वह स्त्री तो जहां नौकरी करती है सब पर झूठा आरोप लगाती है। जबकि घर से लेकर बाहर स्कूल, कोचिंग, नौकरी, सभा संगठनों, बस, ट्रेन ,ऑटो में सफर करती स्त्री और पुरुष भी जानते हैं कि कोई महिला यौन उत्पीड़न का आरोप लगा रही है तो वो कितना सच हो सकता ,कितना झूठ हो सकता है। ये स्त्रीद्वेष में डूबी स्त्रियां बहुत बेहतर समाज का सच जानती होगीं लेकिन सत्ता का बाजा बन जाना उनकी नियति बन गई है।

लखनऊ में रहकर नेट परीक्षा की तैयारी करती दिव्या बताती हैं कि सार्वजनिक जगहों पर लड़के जब कॉमेंट पास करते हैं तो अगर लड़की ने विरोध किया तो वे तुरंत लड़कियों की बॉडी शेमिंग पर उतर आते हैं कि जैसे शक्ल देखी अपनी शीशे में? इसी तरह यहीं गाँव के पास कॉलेज में पढ़नेवाली सांची बताती हैं कि पहले तो लड़के बत्तमीजी करते हैं और विरोध करने पर उनके शरीर को लेकर ताने देते हैं। यह विडम्बना समाज या व्यक्तियों तक नहीं सीमित है। राज्य और व्यवस्था में भी तो यहीं से चलकर गए पुरुष बैठे हैं।

आज जब ये महिलाएं महिला पहलवानों के रंग-रूप आदि की बातें कर के बृजभूषण शरण सिंह को निर्दोष बता रही हैं तो भंवरी देवी के केस में आरोपी के पक्ष में फैसला देने वाले न्यायधीश का कुतर्क याद आता है कि तथाकथित ऊंची जाति का पुरुष हाशिये की जाति की महिला का बलात्कार नहीं कर सकता। हम सभी ये सच जानते हैं कि ये कितना बड़ा झूठ है। वह न्यायधीश भी इसी देश समाज का व्यक्ति है जहां हर रोज़ दलित, आदिवासी महिलाओं के साथ इस तरह के अपराध होते हैं। इसी तरह सत्ता की छांव में बैठी उनके लिए चारण गाती ये महिलाएं भी पितृसत्तात्मक समाज का सारा सच जानती होगीं लेकिन आज उनकी ही लाठी थामकर खड़ी हैं और न्याय के लिए लड़ रही औरतों पर वार कर रही हैं।


About the author(s)

रूपम मिश्र

रूपम मिश्र मूल रूप से कवि हैं विभिन्न पत्र , पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हैं । 7 जून1983 को उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव तिलहरा( सुजानगंज) में जन्म। प्रारंभिक से लेकर स्नातक तक शिक्षा जौनपुर जिले में पूर्वांचल में ही हुई। प्रतापगढ़ जिले में पट्टी तहसील के बिनैका गाँव में रहनवारी हैं।

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