संस्कृतिख़ास बात ख़ास बात: तीन बार माउंट एवरेस्ट फतह कर चुकीं अनीता कून्डू से

ख़ास बात: तीन बार माउंट एवरेस्ट फतह कर चुकीं अनीता कून्डू से

"साल 2015 में हम चीन की तरफ से क्लाइम्बिंग कर रहे थे। उस समय एक भूकंप आया और चीन की सरकार ने भूकंप के चलते उस अभियान को बंद कर दिया था। जब अभियान बंद कर दिया गया तब भी मैं क्लाइम्ब करने की इच्छा दिखा रही थी। सभी को लगा कि मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है इसलिए मेरे मेंटल चेकअप करवाए गए। मैं पूरी तरीके से ठीक थी। मुझ से पूछा गया कि भूकंप की स्थिति में भी आपको क्लाइम्ब क्यों करना है? मेरा जवाब था कि मुझे अपना लक्ष्य पूरा करना है चाहे कितनी भी मुश्किलें हो।"

हमारा समाज एक पितृसत्तात्मक समाज है। गैर-बराबरी और पुरुष प्रधानता हमारे व्यवहार में रची हुई है। हम बंटे हुए हैं, अपने काम और भूमिकाओं को लेकर। लेकिन अनीता कून्डू जैसी महिलाएं  ग्रामीण परिवेश में पितृसत्ता को चुनौती दे रही हैं। अनीता कून्डू हरियाणा के हिसार जिले में फरीदपुर गांव की रहने वाली हैं। वह लड़कियों को खुलकर सपने देखना सिखा रही हैं। वह एक पर्वतारोही हैं। उन्होंने अपना सफर अभाव और संघर्षों से शुरू किया और आज वह चीन और नेपाल की तरफ से मांउट ऐवरेस्ट को फतेह करने वाली भारत की पहली महिला हैं। 2019 में भारत सरकार की तरफ से अनीता को ऐडवेंचर के सर्वोच्च सम्मान ‘तेंजिग नार्गे नेशनल ऐडवेंचर अवार्ड’ सम्मानित किया गया। जहां साहस पुरुषों की जागीर समझी जाती है वहां अनीता का पहाड़ो की चोटियों को छूना साबित करता है कि साहस, सपनों और स्वतंत्रता का कोई जेंडर नहीं होता है। उनके इस सफ़र को और करीब से जानने के लिए पढ़ें अनीता कुन्डू के साथ फेमिनिज़म इन इंडिया की बातचीत के कुछ अंश:

फेमिनिज़म इन इंडिया: आप देश और विश्व की एक प्रसिद्ध महिला पर्वतारोही हैं पर इसके अतिरिक्त आप अपनी पहचान को किस रूप में देखती हैं?

अनीता कून्डू: सबसे पहले फेमिनिज़म इन इंडिया का धन्यवाद। एक पर्वतारोही के अतिरिक्त मैं खुद को एक नारी शक्ति और युवा के रूप में देखती हूं। मैं एक मोटिवेशनल स्पीकर हूं और नारी सशक्तिकरण, समाज कल्याण के लिए लोगों को जागरूक करने का प्रयास करती हूं। अपने आस-पास के इलाकों में नशे के खिलाफ मैं मुहिम चला रही हूं। एक पर्वतारोही होने के कारण मैं खुद को पर्यावरण के बहुत करीब पाती हूं। समाज में पर्यावरण को लेकर बेहद कम जागरूकता है इसलिए अपने प्रयासों से लोगों को पर्यावरण सरंक्षण के लिए जागरूक करती हूं।

एक महिला के तौर पर माउंटेन क्लाइम्बिंग में मेरे लिए अलग से चुनौतियां थीं। जब मैं क्लाइम्बिंग करती तो मैं 30 घंटे तक वॉशरूम नहीं जा पाती थी। मेरे लिए खुले में वॉशरूम जाना मुश्किल था। मेरे साथ के पुरुष पर्वतारोहियों, क्लाइम्बिंग और मुश्किल हो जाती थी। पीरियड्स के चलते क्लाइम्बिंग और मुश्किल हो जाती थी।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आप ग्रामीण परिवेश से संबंध रखती हैं, जहां लोगों को पर्वतारोहण की बहुत कम जानकारी थी। ऐसे माहौल में आपने कैसे तय किया कि आपको पहाड़ो की ऊंचाईयों को छूना है?

अनीता कून्डू: मैं बचपन से ही एक खिलाड़ी बनना चाहती थी। पिता जी के सहयोग के कारण मैंने बचपन में कबड्डी, खो-खो खेला। बॉक्सिंग मैंने खास तौर पर शुरू की। जब मैं 12 साल की थी तो मेरे पिता जी की मृत्यु हो गई। फिर घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रही। संसाधनों के अभाव में मेरे लिए अपने खेल को जारी रखना मुश्किल हो गया। जैसा कि गांवों में देखने को मिलता है, लड़की होने के कारण शादी का दबाव भी मेरे उपर बढ़ने लगा था इसलिए मैंने नौकरी तलाशनी शुरू की। मुझे हरियाणा पुलिस में नौकरी मिली। अपनी सर्विस के दौरान पहाड़ों में जाने का मौका मिला। वहां कुछ लोग मांउटेन क्लाइम्बिंग कर रहे थे। ये देखकर मेरी मांउटेन क्लाइम्बिंग में रूचि पैदा हुई। हालांकि, पहाड़ों को चढ़ने की कठिनाइयों के कारण मेरे साथ के कई लोगों ने मुझे ये सलाह भी दी कि यह लड़कियों के लिए बहुत मुश्किल है और वे पहाड़ नहीं चढ़ सकतीं। आस-पास के लोगों का भी मेरी इस रूचि के लिए नकारात्मक रवैया रहा लेकिन मैंने अपने सपनों को पूरा करने की ठान ली थी। डिपार्टमेंट के सामने अपने इस एडवेंचर में जाने की इच्छा व्यक्त की। मैंने ITBP के साथ पर्वत अभियान किए और चार साल तक कड़ी ट्रेनिंग की। ट्रेनिंग के बाद 18 मई 2013 को मैंने पहली बार माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा लहराया।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आपने 2013 में पहली बार मांउट ऐवरेस्ट की चढ़ाई की इसके बाद आपने कौन से अभियान पूरे किए?

अनीता कून्डू: मैंने माउंट एवरेस्ट के चार अभियान किए हैं। साल 2013 में मैंने पहली बार नेपाल की तरफ से माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई की। 2015 में चीन की तरफ से क्लाइम्बिंग के दौरान भूकंप आ गया था। भूकंप के कारण अभियान को बीच में रोकना पड़ा। इसके बाद 2017 में मैंने चीन की तरफ से माउंट ऐवरेस्ट की चढ़ाई की। इस तरह मैं चीन और नेपाल की तरफ से ऐवरेस्ट फतेह करने वाली भारत की पहली महिला बनीं। साल 2019 में मैंने मांउट एवरेस्ट का तीसरा अभियान किया। यह अभियान मेरे लिए खास इसलिए रहा क्योंकि इस अभियान में मैंने टीम लीडर के तौर पर चढ़ाई की। टीम में विश्व की अलगअलग जगहों के पर्वतारोही थे। मैंने पूरी टीम को सुरक्षित और सफलापूर्वक अभियान पूरा करवाया। अभियान पूरा होने के बाद सर्टिफिकेट्स के ऊपर लीडर के तौर पर अनीता कून्डू, इंडिया के नाम से मैंने हस्ताक्षर किए। मैंने अपने देश का प्रतिनिधित्व किया, इससे मुझे बहुत खुशी मिली। मैंने सेवन समिट अभियान भी किया है। इसके अंदर मुझे दुनिया के सातों महाद्विपों की सबसे ऊंची चोटियों पर तिरंगा लहराने का सौभाग्य मिला। अंटार्कटिका, अलास्का डेनाली जैसे कठिन अभियान मेरे लिए काफी स्मरणीय हैं। हरियाणा सरकार की तरफ से मुझे कल्पना चावला, सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री, नारी शक्ति, हरियाणा पुलिस पदक आदि अवार्ड से सम्मानित किया गया है। 2019 में भारत सरकार के द्वारा मुझे सर्वश्रेष्ठ साहसिक अवार्डतेंजिग नार्गे नेशनल ऐडवेंचर अवार्डसे सम्मानित किया गया। इसके अलावा लोगों से जो प्यार और सम्मान मिलता है वह मेरे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।

फेमिनिज़म इन इंडिया: जब आप एक स्पोर्ट्सपर्सन बनने का सपना देख रहीं थी तो घर और समाज का रवैया कैसा रहा?

अनीता कून्डू: समाज का रवैया मेरे सपनों के लिए नकारात्मक ही था। हम एक पुरुषप्रधान देश में रहते हैं जहां महिलाओं के शोषण करने के प्रयास किए जाते हैं। जब मैंने अपने आस-पास के लोगों को बताया तो मेरा साथ नहीं दिया गया गया बल्कि बहुत गलत तरीके की बातें/ शब्द मुझे सुनने को मिले। उस समय समझ नहीं पाती थी पर आज जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो ग्रामीण परिवेश में लड़कियों के लिए अपने सपनों को पूरा करना, बहुत मुश्किल पाती हूं। समाज की तरफ से जो नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली उसके चलते घरवाले भी चिंतित थे। समाज के कारण शादी का दबाव घर और रिश्तेदारों की तरफ से रहता था।

अपनी सर्विस के दौरान पहाड़ों में जाने का मौका मिला। वहां कुछ लोग मांउटेन क्लाइम्बिंग कर रहे थे। ये देखकर मेरी मांउटेन क्लाइम्बिंग में रूचि पैदा हुई। हालांकि, पहाड़ों को चढ़ने की कठिनाइयों के कारण मेरे साथ के कई लोगों ने मुझे ये सलाह भी दी कि यह लड़कियों के लिए बहुत मुश्किल है और वे पहाड़ नहीं चढ़ सकतीं। आस-पास के लोगों का भी मेरी इस रूचि के लिए नकारात्मक रवैया रहा लेकिन मैंने अपने सपनों को पूरा करने की ठान ली थी।

फेमिनिज़म इन इंडिया: माउंट एवरेस्ट फतेह करने तक के सफर में क्या चुनौतियां रहीं?

अनीता कून्डू: मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती मेरी आर्थिक स्थिति को लेकर रही। अगर आप आर्थिक रूप से सशक्त होते हैं तो कुछ हद तक समस्याएं कम हो जाती हैं। महिला और गरीब होना आपकी कठिनाइयों को और बढा़ देते हैं। हरियाणा में एक कहावत भी है कि गरीब की बहू ( पत्नी), पूरे गांव की भाभी। इसलिए मैं मानती हूं कि महिला सशक्तिकरण के लिए महिलाओं का आर्थिक रूप से मज़बूत होना बहुत ज़रूरी है। शुरू में समाज का मुझे समर्थन नहीं मिला। इसके अलावा एक महिला के तौर पर समाज का शोषण करने का उद्देश्य रहा। बचपन में कई ऐसी घटनाएं रही जिससे मैं मानसिक तौर पर परेशान रही। मुझे याद आता है कि जब हम खेत में जाते थे, कुछ पुरुष अपने प्राइवेट पार्ट्स दिखाते थे। मेरे लिए घर पर इसके बारे में बताना भी मुश्किल था क्योंकि घर पर बताती तो शायद घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाताI बचपन की इन घटनाओं के कारण उपजे मानसिक तनाव के चलते मुझे कांउसलिंग लेनी पड़ी थी। कभी मैं अपनी किताब में इस सब के बारे में ज्यादा खुलकर बात करूंगी।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आप खेल के क्षेत्र में लैंगिक असमानता को कैसे देखती हैं? क्या आपको अपने खेल में जेंडर इसूज का सामना करना पड़ा? 

अनीता कून्डू: हर क्षेत्र की तरह खेल के अंदर भी लैंगिक असमानता है। एक आम धारणा यह रहती है कि महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले शारीरिक रूप से कमजोर हैं जिसके कारण महिलाओं की क्षमताओं को कम करके आंका जाता है। एक महिला के तौर पर माउंटेन क्लाइम्बिंग में मेरे लिए अलग से चुनौतियां थीं। जब मैं क्लाइम्बिंग करती तो मैं 30 घंटे तक वॉशरूम नहीं जा पाती थी। मेरे लिए खुले में वॉशरूम जाना मुश्किल था। मेरे साथ के पुरुष पर्वतारोहियों, क्लाइम्बिंग और मुश्किल हो जाती थी। पीरियड्स के चलते क्लाइम्बिंग और मुश्किल हो जाती थी। जेंडर के आधार पर खेल में लड़कियों को शोषण का सामना करना पड़ता है। अकसर यौन शोषण सहना पड़ता है। मेरे साथ कुछ अवसर ऐसे रहे जहां मेरे शोषण के प्रयास किए गए। मैंने जब विरोध किया तो मेरे नंबर काटे गए। खेल के क्षेत्र में लैंगिक असमानता और भेदभाव है। इसे नकारा नहीं जा सकता है।

फेमिनिज़म इन इंडिया: जो लड़कियां खेल में अपना भविष्य देखती हैं उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगी?

अनीता कून्डू: कोई भी रास्ता आसान नहीं है। शुरूआत में सहयोग नहीं मिलता है, न घर से और न ही समाज से। आपको परेशानियों का सामना करना पड़ेगा मगर अपने आप पर और अपने सपनों पर भरोसा रखें, लगातार प्रयास और मेहनत करती रहें।

फेमिनिज़म इन इंडिया: पूरे सफर में ऐसे कौन से ऐसे खुबसुरत पल रहे जिन्होने तमाम परेशानियों के बावजूद आपको प्रेरित रखा?

अनीता कून्डू: कई ऐसे लोग रहे जिन्होंने मुझे आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित किया। लेकिन मेरे लिए मेरी चुनौतियां और अभाव ही हमेशा एक प्रेरणा रहे। अभावों ने बेहतरी के लिए हौसला दिया। एक घटना मैं आपको बताती हूं। मैं पहली बार बेसिक कोर्स करने के लिए गई थी और बेसिक कोर्स करने के बाद मेरा एक्सपीडिशन के लिए सलेक्शन हो गया मुझे रात को ही मधुबन अकादमी में वापस आना था। हमारी अकादमी के सामने एक पुल है और जब मैं वापस आ रही थी तो उसे समय वह पुल नहीं बना था तब वहां मिट्टी डाली हुई थी। मैं रात को 1:00 बजे वापस आई , मेरे पास भारी भरकम बैग थे मुझे सुबह 4:00 बजे देहरादून के लिए निकलना था। मैं अपना कुछ सामान अपनी ट्रेनिंग सेंटर में रखना चाहती थी और कुछ सामान साथ लेकर जाना चाहती थी अंधेरे में मुझे पता नहीं चला और रास्ता पार करते दौरान मैं अपने सामान के साथ उस मिट्टी में पूरी तरीके से धंस गई। मैंने समझा ये सब मेरे संघर्ष हैं। मैं हताश हुई पर आगे बढ़ती रही। 

साल 2015 में हम चीन की तरफ से क्लाइम्बिंग कर रहे थे। उस समय एक भूकंप आया और चीन की सरकार ने भूकंप के चलते उस अभियान को बंद कर दिया था। जब अभियान बंद कर दिया गया तब भी मैं क्लाइम्ब करने की इच्छा दिखा रही थी। सभी को लगा कि मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है इसलिए मेरे मेंटल चेकअप करवाए गए। मैं पूरी तरीके से ठीक थी। मुझ से पूछा गया कि भूकंप की स्थिति में भी आपको क्लाइम्ब क्यों करना है? मेरा जवाब था कि मुझे अपना लक्ष्य पूरा करना है चाहे कितनी भी मुश्किलें हो। ये मेरे लिए एक यादगार पल है। इसके अलावा लोगों से जो प्यार मिलता है, मेरी उपलब्धियों पर लोग बधाई देते हैं, मेरा सहयोग करते हैं, सरकार से जो सहयोग मिलता है उससे हमेशा प्रेरित रहती हूं।

फेमिनिज़म इन इंडिया: माउंटेन क्लामिंग के दौरान जब आप अपने अभियान पर होती हैं तो सारी अनिश्चितताओं के साथ कैसे अपने आप को अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर रखती है? 

अनीता कून्डू: मुझे किताबे पढ़ने का शौक है। जब मैं अभियान पर होती हूं तो भी मैं अपने साथ किताबें रखती हूं। हरिवंशराय बच्चन, अटल बिहारी वाजपेयी आदि लोगों की कविताएं मेरे मन में चल रही होती हैं। मेरी मां मेरे लिए निरंतर अपने लक्ष्य के लिए प्रेरणा रहती हैं। उन्होंने अपना जीवन हौसले के साथ जिया है। तमाम अभावों के बावजूद हमारे लिए संघर्ष किया, हमेशा हमारे लिए लड़ती रही हैं। मेरे पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हम लोगों के लिए तमाम प्रयास किए।

साल 2015 में हम चीन की तरफ से क्लाइम्बिंग कर रहे थे। उस समय एक भूकंप आया और चीन की सरकार ने भूकंप के चलते उस अभियान को बंद कर दिया था। जब अभियान बंद कर दिया गया तब भी मैं क्लाइम्ब करने की इच्छा दिखा रही थी। सभी को लगा कि मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है इसलिए मेरे मेंटल चेकअप करवाए गए। मैं पूरी तरीके से ठीक थी। मुझ से पूछा गया कि भूकंप की स्थिति में भी आपको क्लाइम्ब क्यों करना है? मेरा जवाब था कि मुझे अपना लक्ष्य पूरा करना है चाहे कितनी भी मुश्किलें हो।

फेमिनिज़म इन इंडिया: आपने लैंगिक असमानता को बेहद करीब से देखा है। इसे खत्म करने के लिए आप कौन से प्रयास जरूरी समझती हैं? 

अनीता कून्डू: मुझे लगता है कि इसके लिए हमें शुरू से ही प्रयास करने होंगे। बचपन से ही बच्चों को समानता के साथ बड़ा किया जाए। काम और ज़िम्मेदारी का जो बंटवारा हम लोगों ने समाज में बना रखा है उसे खत्म करके बिना किसी भेदभाव के बिना बच्चों को बड़ा किया जाए। मेरे घर में मेरे पिता जी के द्वारा हमें यही सिखाया गया। महिला और पुरुष के काम जैसा बंटवारा बहुत अधिक नहीं था। मेरे घर में मेरे भाई-बहनों के बीच देखभाल और काम को लेकर भेदभाव नहीं रहा। हम घरेलू काम और खेती मिलकर करते थे। शुरू से ही एक जैसी परवरिश लड़के और लड़कियों को दी जानी चाहिए।


About the author(s)

Monika

मेरा नाम मोनिका है। मैं हरियाणा के हिसार जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली हूँ। मैंने राजनितिक विज्ञान विषय में दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से अपना ग्रेजुएशन किया है।  जेंडर, जाति, धर्म, समानता,स्वतंत्रता,अधिकार आदि विषयों पर जानना समझना मुझे पसंद है।

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