संस्कृतिकिताबें स्त्री मुक्ति के प्रश्नः परंपरा, सामंतवाद और आधुनिकता में स्त्री की स्थिति पर विमर्श

स्त्री मुक्ति के प्रश्नः परंपरा, सामंतवाद और आधुनिकता में स्त्री की स्थिति पर विमर्श

रामविलास शर्मा कवि, भाषाविद् और विचारक के साथ ही एक प्रगतिशील साहित्यिक आलोचक थे। "स्त्री मुक्ति के प्रश्न" इनके द्वारा लिखित पचास से अधिक रचनाओं में से एक है। इस किताब में मुख्यतः उन्होंने कुल दस अध्यायों में समाज में स्त्री की स्थिति पर विचार रखते हैं।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में स्थित उंचगाँव सानी में जन्में रामविलास शर्मा कवि, भाषाविद् और विचारक के साथ ही एक प्रगतिशील साहित्यिक आलोचक थे। “स्त्री मुक्ति के प्रश्न” इनके द्वारा लिखित पचास से अधिक रचनाओं में से एक है। इस किताब में मुख्यतः उन्होंने कुल दस अध्यायों में समाज में स्त्री की स्थिति पर विचार रखते हैं। इन अध्यायों में क्रमशः गण समाज में स्त्री, महात्मा बुद्ध: भिक्षु, नारी और संसार, सामंती अवशेष और नारी समस्या, सतीप्रथा और राजा राममोहन राय, जन-संग्राम और नारी, नारी की स्वाधीनता और निराला, नारी-समस्या और हिंदी उपन्यास, भारतीय परिवार और नारी, नारी मुक्ति की समस्या एवम संबंधों का स्वीकार, नैतिकता में स्त्री की स्थिति को समाज के विकास के आरम्भ से लेकर वर्तमान परिप्रेक्ष्य तक में हुए सभी बदलाओं को दर्शाने की अच्छी कोशिश की है। साथ ही अपने साक्षात्कारों में हुई बातचीत का उल्लेख कर कुछ उपाय भी सुझाए हैं। 

लेखक ने ऋग्वेद, महाकाव्य और विभिन्न स्मृतियों के उद्धरणों का इस्तेमाल कर यह बताने की कोशिश की है कि गण समाज में स्त्रियां आज की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र थीं। वे महाभारत के विषय में कहते हैं कि यह कथा प्राचीन मातृसत्ता समाज की कथा है। यह कुंती और माद्री के पुत्रों की कथा है। इस चरण में लेखक वाल्मीकि रामायण में वर्णित किष्किंधाकांड में हनुमान के पिता केसरी और सामवेद उपनिषद के सत्यकाम की कहानी का भी उल्लेख करते हैं जिसमें पुत्र या तो उन व्यक्तियों के पुत्र के रूप में जाने जाते हैं जिन शासन की माता से विवाह किया हो भले वे जैविक रूप से किसी और के पुत्र हों या फिर कोई अपनी मां के नाम से ही जाने जाते हैं।

सामंती समाज में स्त्री समस्या को अधिक विस्तृत रूप से समझाते हुए लेखक इसे समाज में व्याप्त संपत्ति संबंध से जोड़ते है, और यह दिखाते हैं कि बाहर जिस तरह सामंती समाज में राजा और जमींदार निरंकुश होता था, उसी प्रकार परिवार के भीतर मुखिया परिवार के सदस्यों पर शासन करता था और स्त्रियों और बच्चों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझता था।

स्त्री की स्वाधीनता सिर्फ यौन संबंधों के रूप में ही ना दिखा कर, वे ऐसी स्त्रियों का भी वर्णन करते हैं जो वैदिक काल में युद्ध किया करती थी जैसे ऋग्वेद में वर्णित विशपला, वैदिक मंत्रों की रचयिता लोपामुद्रा, आत्रेयी अपाला, घोषा एकादश उपनिषद में अपने शास्त्र ज्ञान के लिए प्रसिद्ध मैत्रेयी और गार्गी का उल्लेख करने के साथ ही याज्ञवल्क्य स्मृति का वर्णन करके यह बताते हैं कि किस प्रकार पुत्र न होने पर पत्नी और पुत्रियां भी किसी मृत व्यक्ति की संपत्ति के उत्तराधिकारी हो सकती हैं। 

जब भी हम धर्मग्रंथों के आधार पर उस वक्त की सामाजिक स्थिति का आंकलन करने की कोशिश करते हैं तब हमें यह जरूर याद रखना चाहिए कि ये एक खास वर्ग द्वारा लिखित मिथक है न कि कोई इतिहास ग्रंथ और इनमें कई विरोधाभासी उद्धारण मिलते हैं। विशेषतौर पर जब स्त्रियों की स्थिति के बारे में इनके कुछ विशेष उद्धारण के आधार पर बेहतर बताने की कोशिश करते है तो यह भूल जाते हैं कि ऋग्वेद की हजारों मन्त्रो में से गिने चुने मन्त्रों की रचना अगर स्त्रियों ने की भी है तो इससे यह साबित नही होता कि सभी स्त्रियों की स्थिति अच्छी हो, साथ ही ये ग्रंथ एक तरह से आदर्श नियमावली थी न कि तत्कालीन समाज का ब्यौरा। लेकिन वहीं बुद्ध-काल की स्थिति दर्शाते हुए लेखक बताते है कि “स्त्री के प्रति बुद्ध का दृष्टिकोण सामंती व्यवस्था के बैरागियों जैसा है।” महात्मा बुद्ध स्त्री को एक ऐसी समस्या की तरह देखते हैं जिससे बचना भिक्षुओं के लिए बहुत जरूरी है।

सामंती समाज और स्त्री

सामंती समाज में स्त्री समस्या को अधिक विस्तृत रूप से समझाते हुए लेखक इसे समाज में व्याप्त संपत्ति संबंध से जोड़ते है, और यह दिखाते हैं कि बाहर जिस तरह सामंती समाज में राजा और जमींदार निरंकुश होता था, उसी प्रकार परिवार के भीतर मुखिया परिवार के सदस्यों पर शासन करता था और स्त्रियों और बच्चों को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझता था। लेखक ने वेश्यावृत्ति को सामंतवाद की विशेषता बताया है। साथ ही वे यह भी बताते हैं कि सामंतवाद का प्रभाव हर तरफ, एक जगह, हर जगह एक जैसा नहीं था। राजस्थान की स्त्रियों की स्थिति की तुलना में बुंदेलखंड और भोजपुरी क्षेत्र की स्त्रियां अधिक स्वाधीन थीं। वहीं केरल और लद्दाख में मातृसत्तात्मक व्यवस्था के अवशेष मिलते हैं, इन क्षेत्रों में स्त्री अब भी घर की मालकिन होती है।मध्यकालीन भारत में चरम पर पहुंचे भक्ति आंदोलन ने तमिलनाडु के अंडाल, कश्मीर के ललद्यद, राजस्थान के मीरा और कर्नाटक की अक्कमहादेवी जैसी कई महिला संतों को जन्म दिया जिन्होंने न सिर्फ़ पराधीनता त्यागकर, मुक्त जीवन बिताया बल्कि सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना की और सामंत-विरोधी धारा के साथ जुड़ीं।

ब्रिटिश शासन कायम होने के बाद जैसे-जैसे उद्योग धंधे तबाह हुए वैसे-वैसे कारीगर शहरों से देहात की तरफ बढ़े। लोगों की जमीदारों पर निर्भरता बढ़ी, जिससे सामंतवाद का प्रकोप गहराया, जाति बंधन कठोर हुए और स्त्री की स्थिति पहले से खराब हुई। लेकिन फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में कई स्त्रियों ने अंग्रेजो के ख़िलाफ़ लोहा लेने के साथ-साथ स्त्री का दायरा चारदीवारी तक सीमित रखने वाले सामंती मूल्यों को भी ध्वस्त किया, जिनमें रानी लक्ष्मी बाई, बेगम हजरत महल, ऊदा देवी, कर्नाटक की रानी चेन्नम्मा जैसे कई नाम शामिल हैं।

सती प्रथा का विस्तार

सती प्रथा के विषय में उल्लेख करते हुए लेखक राजा राममोहन रॉय का हवाला देते हैं जिनके अनुसार सती प्रथा का प्रचलन पूरे भारत में न होकर केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित था। जिसमें बंगाल मुख्य था और यह प्रथा केवल कुछ समय से ही प्रचलित थी। वे आगे यह भी लिखते हैं कि अंग्रेजी राज के कारण सामंती अंधविश्वास और अधिक मजबूत हुए, अंग्रेजों को सती प्रथा का विरोध करते हुए जरूर देखा गया है लेकिन वे सती प्रथा को चला रहे हैं पुरोहित और जमींदारों के पक्षधर रहे हैं।

बंगाल में प्रचलित हिंदू संपत्ति संबंधी उत्तराधिकार के ग्रंथ ‘दायभाग’ के अनुसार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति पर उसके पुत्र और पुत्र की माता का अधिकार था। यह दर्शाता है कि बंगाल में हमेशा से सती प्रथा नहीं थी क्योंकि अगर विधवाओं के पति के साथ जलने का प्रचलन होता तो उनके लिए संपत्ति में अधिकार की व्यवस्था नहीं की गई होती। बंगाल में ही प्रचलित एक और नियम के अनुसार एक पत्नी के होते हुए दूसरा विवाह करने के लिए उस पुरुष को शासन से अनुमति लेनी पड़ती थी। साथ ही यह साबित करना पड़ता था कि दूसरा विवाह करना क्यों आवश्यक है लेकिन अंग्रेजी शासन में इन नियमों का भरपूर उल्लंघन हुआ। जिसका नतीजा यह हुआ कि एक पुरुष बहुत सारी शादियां करने लगे, जिससे उनमें और उनकी पत्नियों में उम्र का फासला बढ़ा, पत्नी के रूप में उनकी संपत्ति के उत्तराधिकारी बढ़े, जिससे महिलाओं के विधवा होने और सती प्रथा दोंनो में ही इजाफा हुआ। 

स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी

भारतीय जन संग्राम में नारी के भागीदारी के विषय में बताते हुए लेखक कहते है कि अंग्रेजी शासन ने ज्यादातर स्कूल और विश्वविद्यालय इसलिए खोले थे जिससे कि उनके लिए कलर्क पैदा किए जा सकें। वहीं स्त्री शिक्षा तो केवल नाम मात्र की थी लेकिन स्त्रियों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जन संग्राम में भाग लिया। स्वतंत्रता संग्राम के हर धड़े में महिलाओं की भागीदारी थी। क्रांतिकारी युवकों के साथ कल्पना दत्त ने भी शास्त्रागार पर हमला किया। सन 1942 में अरूणा आसफ अली ने भी गुप्त राजनीतिक जीवन बिताया था। कारखानों की हड़ताल में मजदूर महिलाएं भी शामिल हुई और उन्होंने भी पुलिस का दमन झेला। जलसेना के विद्रोह में अंग्रेजी फौज द्वारा चलाई गोलियों का सामना करने वालों में वीर नारी कमल धोंदें भी थीं।

लोगों की जमीदारों पर निर्भरता बढ़ी, जिससे सामंतवाद का प्रकोप गहराया, जाति बंधन कठोर हुए और स्त्री की स्थिति पहले से खराब हुई। लेकिन फिर भी देश के अलग-अलग हिस्सों में कई स्त्रियों ने अंग्रेजो के ख़िलाफ़ लोहा लेने के साथ-साथ स्त्री का दायरा चारदीवारी तक सीमित रखने वाले सामंती मूल्यों को भी ध्वस्त किया, जिनमें रानी लक्ष्मी बाई, हजरत महल, उदा देवी पासी, कर्नाटक की रानी चेन्नम्मा जैसे कई नाम शामिल हैं।

भारतीय परिवारों में नारी की स्थिति दिखाते हुए हैं लेखक यह सलाह देते हैं कि नारी समस्या को ऐतिहासिक परिपेक्ष में देखना आवश्यक है क्योंकि ऐसा करके ही हम नारी की अधीनता की जड़ से अवगत हो सकेंगे और उसे खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे। लेखक का कहना हैं कि जिस प्रकार सामंती व्यवस्था में और समाज के सभी लोग जमीदार की प्रजा की तरह थे, उसी प्रकार संयुक्त परिवारों में घर के सरदारों के पास बंधुआ मजदूर के रुप में महिलाएं और बच्चे हैं। जिन परिवारों के पास जमीन नहीं थी या जिन क्षेत्रों में सामंती व्यवस्था ज्यादा सुदृढ़ नहीं था वहां स्त्रियां अधिक स्वतंत्र थीं। जहां भी स्त्रियां पुरुषों के साथ आर्थिक कामों जैसे-खेती करना, आम-महुआ बीनना इत्यादि में संलग्न थी वहां पर्दा प्रथा ना के बराबर मिलती है और ऐसी स्त्रियां अधिकार-संपन्न थीं। 

पूंजीवादी व्यवस्था और स्त्री पर दोहरा भार

जहां तक हमारे देश में पूंजीवादी व्यवस्था का सवाल है तो यह देश पूंजीवाद की तरफ बढ़ ज़रूर रहा है लेकिन अभी भी सामंती मूल्य पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। जिसका असर यहां के परिवारों में भी दिखता है जैसे दहेज के लिए बहुओं को जला देना या बार-बार उन पर पैतृक परिवार से पैसे लेकर आने का दबाव बनाना। जहां तक पूंजीवाद के साथ आए एकल परिवारों की बात की जाए तो ऐसा नहीं है कि स्त्रियों का शोषण केवल संयुक्त परिवारों में था और एकल परिवारों में नहीं है। मध्यम वर्गीय शहरी एकल परिवारों में भी महिला का भरपूर शोषण होता है।

कई शहरी मध्यम वर्गीय परिवार हैं जहां स्त्री और पुरुष दोंनो ही आर्थिक कार्यों में संलग्न है लेकिन फिर भी घरेलू काम का भार स्त्रियों पर ही है। इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि सामंती संस्कार हैं। दहेज जैसी समस्याओं के खत्म करने के लिए यह बहुत जरूरी है कि विवाह का आधार धर्म जाति न होकर केवल प्रेम हो वैसे ही पारिवारिक शोषण को खत्म करने के लिए यह जरूरी है कि परिवारों का गठन सहयोग के आधार पर हो, सभी सदस्य के पास समान अधिकार हो और वे इन अधिकारों के आधार पर सहयोग करें।

नारी-मुक्ति के विमर्श और आंदोलनों के दौरान हमें कुछ बातें जरूर ध्यान रखनी चाहिए जैसे स्त्री पराधीनता की समस्या केवल पुरुष द्वारा स्त्री के शोषण की न होकर वर्ग संघर्ष की समस्या है, और इस समाज में कई वर्ग हैं, वर्गों में बहुत सारे स्तर हैं सभी स्तरों की स्त्रियों की स्थिति एक-सी नहीं है, ना ही सबके लिए के लिए मुक्ति के अर्थ समान है। उच्च वर्ग की महिलाओं के पास आर्थिक सबलता के साथ-साथ नैतिकता का बोझ भी कम है। निम्न वर्ग की स्त्रियां सामाजिक व आर्थिक दोंनो ही स्थिति में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्र हैं। वहीं मध्यमवर्गीय स्त्रियों की स्थिति बाकी दोनों वर्गों की स्त्रियों से ज्यादा खराब है ना तो उनके पास आर्थिक स्वतंत्रता है, ना ही सामाजिक, साथ ही नैतिकता का बोझ भी सबसे अधिक उन पर ही हैं।

दूसरी बात यह कि नारी-मुक्ति के लिए हम शिक्षा और आर्थिक स्वावलंबन को एक बड़े हथियार के रूप में देखते हैं, जबकि विडंबना यह है कि स्त्रियां पढ़ लिखकर आज कई बड़ी जगहों पर नौकरी कर रही हैं लेकिन उनके कार्यस्थल में उनके साथ यौन शोषण की ख़बरों से अख़बार आज भी पटा हुआ है। तीसरी बात यह कि नारी मुक्ति आंदोलनों में हमें पुरुषों को स्त्रियों के शत्रु के रूप में न दिखाकर यह समझना जरूरी है कि इस पितृसत्तात्मक समाज में केवल स्त्री ही नहीं बल्कि पुरुष भी पीड़ित है उसे भी एक ढांचे में फिट करने की कोशिश की गई है।

कई शहरी मध्यम वर्गीय परिवार हैं जहां स्त्री और पुरुष दोंनो ही आर्थिक कार्यों में संलग्न है लेकिन फिर भी घरेलू काम का भार स्त्रियों पर ही है। इसका कारण कुछ और नहीं बल्कि सामंती संस्कार हैं।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ही हमें नारी मुक्ति के तरफ कदम बढ़ाना चाहिए। हमेशा कोशिश करनी चाहिए कि हमारे देश के अन्य क्षेत्रों की प्रगतिशील संस्कृति को हम लोगों तक पहुंचाएं जैसे- भले उत्तर भारत में पितृसत्तात्मक व्यवस्था बहुत मजबूती से जमी हुई है लेकिन वहीं केरल और कर्नाटक में आज भी मातृसत्तात्मक व्यवस्था के अवशेष मौजूद हैं। विभिन्न जनजाति समाजों में यौन संबंधों को लेकर एक स्वस्थ खुलापन है। गोंड एवं मुरिया आदिवासी समाजों में प्रचलित घोटुल संस्कृति स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को स्थायित्व और परिपक्वता प्रदान करने के साथ ही स्त्री द्वारा अपने जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता दर्शाते हैं। इतना ही नहीं इन समाजों में दहेज जैसी कुप्रथाओं के लिए कोई स्थान नहीं है।

ऐसा करके हम यह स्थापित कर पाएंगें कि स्त्री पराधीनता पर आधारित यह व्यवस्था ना तो साथ शाश्वत है और ना ही सर्वव्यापक। इस पुस्तक की मुख्य रुप से आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि लेखक ने कई जगह धर्मग्रंथों और भारतीय संस्कृति के पितृसत्तात्मक रवैया की बचाव करने की कोशिश की है। किताब स्त्री मुक्ति के प्रश्न को लेकर इस वजह से लेकर बीच-बीच में संस्कृति के परोकार की तरह नज़र आते हैं।


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