इतिहास जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 103 साल: जानें, इस यूनिवर्सिटी को तराशने वाली महिलाओं के बारे में

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के 103 साल: जानें, इस यूनिवर्सिटी को तराशने वाली महिलाओं के बारे में

जामिया के निर्माण उसे सजाने, संवारने में महिलाओं की महती भूमिका रही लेकिन अक्सर पुरुष संस्थापक और निर्माताओं की चर्चा करते वक्त उनको भुला दिया जाता है।

80 के दशक के मध्य में आयोजित जामिया के स्थापना दिवस पर भाषण देते हुए उर्दू साहित्य की लेखिका सलीहा आबिद हुसैन ने कहा था “मैं जामिया की महिलाओं के बारे में बात करना चाहती हूं जो सम्राट शाहजहां और ताजमहल का निर्माण करने वाले शाही वास्तुकारों के पीछे राज-मजदूर की तरह थी। उन्होंने कभी भी संगमरमर पर नाम खुदवाने के बारे में नहीं सोचा।”  हाल ही में जामिया मिल्लिया इस्लामिया अपने 103 वें स्थापना दिवस का जश्न मना रहा है। जामिया की स्थापना 29 अक्टूबर, 1920 को हुई थी। विश्वविद्यालय की स्थापना स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हुई थी। जामिया के निर्माण उसे सजाने, संवारने में महिलाओं की महती भूमिका रही लेकिन अक्सर पुरुष संस्थापक और निर्माताओं की चर्चा करते वक्त उनको भुला दिया जाता है।

स्थापना दिवस पर जामिया, तस्वीर साभार: श्वेता

शिक्षाविद् और विद्वान डॉ. ज़ाकिर हुसैन से हर कोई परिचित होगा। ज़ाकिर हुसैन आगे चलकर भारत के राष्ट्रपति बने। प्रोफेसर मोहम्मद मुजीब इतिहास के विद्वान थे और विशेषकर उनकी पुस्तक इंडियन मुस्लिम द्वारा जाना जाता है। आबिद हुसैन को दुनिया भर में विशेषकर जर्मनी में दर्शनशास्त्र और इस्लामी अध्ययन के छात्रों द्वारा जाना जाता है। लेकिन कितने लोग जाकिर हुसैन की पत्नी शाहजहां बेगम, मोहम्मद मुजीब की पत्नी आसिफा मुजीब और सैयद आबिद हुसैन की पत्नी सालिहा आबिद हुसैन से परिचित होंगे? आइए जामिया के इस स्थापना दिवस के मौके पर उन महिलाओं के बारे में जानते हैं जिन्होंने विश्वविद्यालय को बनाने, सजाने, संवारने और वर्तमान समय में जामिया जिस शीर्ष पर पहुंचा है, वहां तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1- ग्रेडा फिलिप्सबोर्न

ग्रेडा फिलिप्सबोर्न का जन्म साल 1895 में हुआ था। फिलिप्सबोर्न एक जर्मन मूल की यहूदी महिला थी। साहित्य, संगीत और कला इनका पसंदीदा विषय था। लेकिन इन्हें पढ़ाना बहुत पंसद था। लगभग साल 1924 के दौरान उनकी मुलाकात बर्लिन में ज़ाकिर हुसैन, आबिद हुसैन और मोहम्मद मुजीब से हुई थी। चारों की दोस्ती गहरी हो गई। 1930 के दशक में उन्होंने निर्णय लिया कि जामिया ही उनका मिशन है। फिलिप्सबोर्न एक जनवरी 1933 को जामिया में आधिकारिक रूप से शामिल हो गईं। वह धीरे-धीरे जामिया की अवधारणा के प्रति आकर्षण हुई और अपना सहयोग करने के लिए आतुर हुई। उन्हें मालूम था कि यह सब कुछ इतना आसान नहीं फिर भी उन्होंने इतना बड़ा कदम उठाया। ज़ाकिर हुसैन ने ग्रेडा का परिचय अपनी आपा जान के रूप में करवाया। वह जल्द ही पूरी जामिया बिरादरी की प्यारी बड़ी बहन बन गईं। संस्थान को जब भी उनके सहयोग की जरूरत हुई वह निडर होकर साथ देती रहीं। वर्तमान समय में जामिया की दो इमारतों एक गर्ल्स हॉस्टल और एक डे केयर का नाम गेरडा फिलिप्सबोर्न के नाम पर रखा गया है।

जीवन के अंतिम समय तक खुद को संस्थान की सेवा में झोंके रखा। लेकिन बेहद ही कम आयु 47 वर्ष में उनकी कैंसर से मौत हो गई। उनकी इच्छा थी कि मौत के बाद उन्हें मुस्लिम साथियों और सहयोगियों के बीच दफनाया जाए। इसलिए उन्हें जामिया कब्रिस्तान में दफनाया गया। महिला और शिक्षाविद् कार्यकर्ता डॉ. सैयदा हमीद ने शैक्षणिक संस्थानों के निर्माण में मुस्लिम और अन्य महिलाओं के अप्रकाशित और कम प्रशंसित योगदान पर अपनी चर्चा में फिलिप्सबोर्न को जामिया का ‘अदृश्य वास्तुकार’ कहा है।

2- आसिफा मुजीब

बेगम आसिफ़ा मुजीब पूर्व यूपी के संडीला की रहने वाली थीं। उनका जन्म साल 1906 में बेहद संपन्न परिवार में हुआ था। उनका पालन-पोषण घर की चार दीवारों और पर्दे के भीतर हुआ। लेकिन शादी के बाद उन्होंने पर्दा त्याग दिया और जामिया समुदाय को बढ़ावा देने के लिए अपने पति (मोहम्मद मुजीब) के साथ शामिल हो गईं। वह तीन भाषाओं उर्दू, फारसी और अंग्रेजी की विद्धान थी। उन्होंने अपनी अधिकतर कहानियां उर्दू में लिखीं। आसिफा को मंच पर छात्रों को सम्मानित करते, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का जश्न मनाते और अतिथि का स्वागत करते हुए देखा गया। बाद में आसिफा मुजीब के घर पर महिलाओं का  विशेष समारोह आयोजित किया जाता था, जहां जामिया की महिलाएं उनसे मिलने के लिए इकट्ठी हुआ करती थीं।

3-  ताहिरा ख़ातून

ताहिरा ख़ातून का जन्म साल 1902 में हुआ था। जब मुजीब परिवार ने अपने छोटे बेटे मुईन को खो दिया तब ताहिरा ख़ातून अपनी छोटी बहन आसिफा मुजीब के पास रहने के लिए जामिया आ गईं। इसके बाद कई साल तक जामिया में ही रहीं। आगे चलकर उन्हें जामिया जूनियर स्कूल का वार्डन नियुक्त किया गया था। ताहिरा को छोटे बच्चों से बेहद प्रेम था। उन्होंने एक बच्ची को गोद लिया था जिसका जीवन भर पालन-पोषण किया। लेकिन बाद में मुजीब साहब को ब्रेन हैमरेज हुआ तो उन्हें वार्डनशिप छोड़नी पड़ी और उनकी देखभाल के लिए अपनी बहन के पास चली गईं।

4- सुगरा मेहंदी

सुगरा मेहंदी का जन्म साल 1937 में हुआ था। उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा घर पर हुई थी। वह जामिया में शामिल होने वाली पहली कुछ लड़कियों में से थीं, जब लड़के और लड़कियां एक साथ पढ़ते थे। उनके चाचा सैयद हुसैन और शिक्षिका सलीहा आबिदा हुसैन ने उन्हें शिक्षा हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया। मेहंदी ने अपने करियर की शुरुआत स्कूली शिक्षक के रूप में की थी। आगे चलकर उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की उर्दू की प्रोफेसर के ओहदे पर काम किया। उन्होंने लघु कथाएं लिखी और कई लेखों का अनुवाद किया। इनका पहला उपन्यास राग भोपाली 1969 में प्रकाशित हुआ था।

हमारी जामिया’ इनकी आखिरी मौलिक कृति थी जो उनकी मुत्यु से कुछ महीने पहले 2014 में प्रकाशित हुई थी। साहित्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए यूपी, दिल्ली और एमपी उर्दू अकादमियों द्वारा सम्मानित किया गया। वह मुस्लिम महिला मंच की संस्थापक ट्रस्टी थीं।अपने एक भाषण में महिला और शिक्षाविद् कार्यकर्ता डॉ. सैयदा एस. हमीद कहती हैं कि प्रोफेसर सुग़रा मेहदी ने अपने निधन से ठीक पहले असीम इच्छा शक्ति व्यक्त करते हुए कहा था कि जामिया की महिलाओं की कहानियां एक अद्भुत पुस्तक ‘हमारी जामिया’ में जीवित है। जिसका कई भाषा में अनुवाद करके दुनिया भर में उपलब्ध कराया जएगा। यदि वह न होती तो ये कहानियाँ हमेशा के लिए खो जातीं।

5-  वनलीला शाह

स्वतंत्रता सेनानी और कलाकार वनलीला शाह का जन्म साल 1916 में हुआ था। इन्हें ‘बहनजी’ के नाम से भी जाना जाता है। वह अपने पति जगुभाई शाह के साथ जामिया मिल्लिया इस्लामिया आई थी। शाह एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। डॉ. जाकिर हुसैन के राष्ट्रवादी कलाकारों को संस्थान में शामिल होने के आह्वान के जवाब में वह 1951 में कला प्रशिक्षक के रूप में जामिया में शामिल हुईं। 15 साल तक उन्होंने जामिया गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन के रूप में भी काम किया। सांप्रदायिक सद्भाव की प्रतीक और वंचित महिलाओं की चैंपियन होने के नाते उन्हें स्टाफ और छात्रों द्वारा खूब प्यार किया जाता था। उन्हें सभी सामाजिक और धार्मिक कार्यों और त्योहारों में जामिया की महिलाओं के साथ सक्रिय भाग लेने के लिए याद किया जाता है।

6- सलीहा आबिद हुसैन

पंजाब के तत्कालीन हिस्से, पानीपत में जन्मी सलीहा आबिद हुसैन उर्दू की एक प्रमुख लेखिका थीं। उनके उपन्यास, लघु कथाएँ, निबंध, पत्र-संग्रह और अनुवाद की संख्या पचास से अधिक हैं। अपने परदादा और कवि मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली से उन्हें काफ़ी प्रेरणा मिली। उनका संपूर्ण साहित्यिक कोश इसी उद्देश्य से ओत-प्रोत है। महिलाओं के संघर्ष से उनके भावनात्मक जुड़ाव ने उन्हें उर्दू साहित्य का पहला लैंगिक विशेषज्ञ बना दिया। उन्होंने राष्ट्रवाद, मानवीय मूल्यों, इस्लामी न्यायशास्त्र और महिला शिक्षा के मुद्दों पर बात की। कुरान पर पूरी तरह से आधारित होने के कारण, उन्होंने इस्लाम की शिक्षाओं के आलोक में मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के लिए साहस और दृढ़ विश्वास के साथ बात की। उन्हें कई बार साहित्यिक और राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया है।

7- बेग़म इनाम फातिमा हबीबुल्लाह

बेग़म इनाम फ़ातिमा हबीबुल्लाह का जन्म साल 1883 में हुआ था। फातिमा एक शिक्षिका, लेखिका और महिला कार्यकर्ता थी। लड़कियों के उत्थान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने लड़कियों के लिए एक स्कूल तालीम गाह-ए-निस्वां की स्थापना की। वर्तमान समय में यह स्कूल काफी फल-फूल रहा है। उन्होंने खुद से अंग्रेजी भाषा सीखी। पर्दा प्रथा को त्याग किया इसके लिए उन्हें काफी आलोचना का सामना करना पड़ा। फ़ातिमा लखनऊ की पहली महिला नगर आयुक्त हुई थी। वह साल 1936 में संयुक्त प्रांत की विधानसभा के लिए चुनी गई। उन्हें यात्रा करना बेहद पसंद था। साल 1924 में महाद्वीप की यात्रा की। इस यात्रा पर आधारित उन्होंने एक पूर्ण यात्रा वृतांत ता’सुरत-ए सफ़र-ए यूरोप लिखा। इस्लाम को समझने के लिए नज़र-ए अक़ीदत नाम से निबंध लिखा।

8- शाहजहां बेग़म

शाहजहां बेगम का जन्म साल 1903 में हुआ था। महज 10 साल की उम्र में उनकी शादी 15 साल के जाकिर हुसैन से हुई थी। शाहजहां बेगम को कुरान तो पढ़ाया गया लेकिन औपचारिक शिक्षा से वंचित रखा गया। जाकिर हुसैन की पत्नी स्वभाव से बहुत दयालु थीं। वह लोगों की मदद करने में नहीं हिचकती थी। जानवरों से उनको अथाह प्रेम था। जो भी उनके नजदीक गया, उनका प्रिय बन गया। जामिया बिरादरी उन्हें एक सार्वभौमिक मां के रूप में प्यार करती थी जिसकी रसोई सभी के लिए खुली थी। उन्होंने उनके सीमित साधनों लेकिन असीमित उदारता से से पकाया गया स्वादिष्ट भोजन खाया। उनके सपोर्ट के कारण जाकिर हुसैन अपना पूरा जीवन शिक्षा और देश की सेवा में समर्पित करने में सक्षम हो सके।


सभी तस्वीरें जामिया में लगी प्रदर्शनी से प्राप्त की गई हैं।

About the author(s)

My name is Shweta. I am from Delhi. I studied Journalism at Jamia Millia Islamia and currently pursuing a PhD in Diaspora Studies. I am interested in writing and reporting on issues related to women and marginalized communities.

Comments:

  1. Sandhya says:

    Excellent Shweta,keep writing regularly..

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