स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य मेंस्ट्रुअल कप अपनाने में क्यों होती है वर्जिनिटी को लेकर चिंता?

मेंस्ट्रुअल कप अपनाने में क्यों होती है वर्जिनिटी को लेकर चिंता?

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के शोधके अनुसार, भारत के कई राज्यों में किए गए शोध और वैज्ञानिक विश्लेषण यह स्पष्ट करते हैं कि मेंस्ट्रुअल कप को अपनाने की प्रक्रिया केवल व्यक्तिगत चुनाव नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष है।

आज के दौर में महिलाओं, पुरुषों और क्वीयर समुदाय को पीरियड के बारे में जागरूक और संवेदनशील बनाने की कोशिश तेज़ हुई है। तकनीक, सोशल मीडिया और बढ़ती बातचीत ने इस विषय पर संवाद को पहले से ज़्यादा सहज बना दिया है। लोग अब सैनिटरी नैपकिन, टैम्पोन, मेंस्ट्रुअल कप, पीरियड अंडरवियर जैसे उत्पादों के बारे में जानकारी रखते हैं और अपनी ज़रूरत और सुविधा के अनुसार चुनाव कर रहे हैं। इसके बावजूद, मेंस्ट्रुअल कप को अपनाने को लेकर कई तरह की चिंताएं और मिथक आज भी मौजूद हैं। खासतौर पर वर्जिनिटी से जुड़ी गलत मान्यताएं, जो युवा लड़कियों, महिलाओं, ट्रांस-पुरुषों और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों के लिए भी एक बड़ी बाधा बनकर सामने आती है। दरअसल, पीरियड से जुड़ी यह झिझक सिर्फ स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि कथित नैतिक पवित्रता की सामाजिक धारणाओं से भी जुड़ी है, जिनका बोझ अक्सर लड़कियों और क्वीयर समुदाय के व्यक्तियों के शरीर पर डाल दिया जाता है। जब तक शरीर को सम्मान और नियंत्रण की बजाय आज़ादी और अधिकार के नज़रिये से नहीं देखा जाएगा, तब तक ऐसे मिथक पूरी तरह खत्म नहीं किए जा सकते हैं।

क्या है मेंस्ट्रुअल कप

मेंस्ट्रुअल कप सिलिकॉन या लेटेक्स से बना एक छोटा, लचीला, कप के आकार का उपकरण है, जिसे पीरियड्स के दौरान रक्त को सोखने के बजाय इकट्ठा करने के लिए योनि में डाला जाता है। इसे साफ़ करके बार-बार उपयोग किया जा सकता है, जिससे यह एक टिकाऊ और किफ़ायती विकल्प बनता है। इसकी लोकप्रियता खासतौर पर शहरी, शिक्षित और अपेक्षाकृत उच्च सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की युवा महिलाओं के बीच ज़्यादा देखी जाती है। नैशनल लाईब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के अनुअसार भारत के तमिलनाडु में डॉक्टरों के बीच किए गए एक अध्ययन में मेंस्ट्रुअल कप के उपयोग की दर केवल 4.4 फीसदी बताई गई। हालांकि, इन समूहों में भी जागरूकता की तुलना में वास्तविक उपयोग की दर अब भी काफी कम है। गुणवत्ता और देखभाल के अनुसार, एक मेंस्ट्रुअल कप 6 माह से 10 सालों तक भी प्रयोग किया जा सकता है, जो कि पर्यावरण और आर्थिक रूप से सतत है। 

इसकी लोकप्रियता खासतौर पर शहरी, शिक्षित और अपेक्षाकृत उच्च सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की युवा महिलाओं के बीच ज़्यादा देखी जाती है। नैशनल लाईब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के अनुअसार भारत के तमिलनाडु में डॉक्टरों के बीच किए गए एक अध्ययन में मेंस्ट्रुअल कप के उपयोग की दर केवल 4.4 फीसदी बताई गई।

पवित्रता की राजनीति और मेंस्ट्रुअल कप का डर

भारत में, सेक्स जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय के प्रति रूढ़िवादी सोच के कारण महिलाएं अपनी परेशानियों को बेझिझक साझा नहीं कर पाती हैं। भारत में यौन शिक्षा का प्रसार न होने के कारण, पीरियड्स एक हास्य और शर्म का विषय बन जाता है। महिलाएं अपनी योनि के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। क्योंकि मेंस्ट्रुअल कप को योनि में प्रवेश करना होता है, वह असहजता को लेकर काफी चिंतित रहती हैं। हाइमन एक पतली झिल्ली होती है, जो योनि के द्वार के पास होती है। यह जन्म के समय मौजूद होती है, और समय के साथ खेलकूद, टैम्पोन के उपयोग, या यौन संबंध बनाने जैसी गतिविधियों से यह खिंच सकती है या फट सकती है। मेंस्ट्रूअल कप को लेकर कई मिथक हमारे समाज में मौजूद हैं, जैसे मेंस्ट्रूअल कप का इस्तेमाल करने से दर्द होता है। इसके साथ ही मेंस्ट्रुअल कप को लेकर मुख्य संशय यह है कि इसे इस्तेमाल करने से वर्जिनिटी खत्म हो जाती है। वर्जिनिटी का भारतीय महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी माने जाने के पीछे पितृसत्तात्मक समाज का एक नज़रिया है, जो महिलाओं की वर्जिनिटी को उसके चरित्र से जोड़कर देखता है

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई की एक स्त्री रोग विशेषज्ञ का कहना है कि, वह अविवाहित और यौन रूप से निष्क्रिय महिलाओं को इसकी (मेनस्ट्रुअल कप) सलाह नहीं देंगी, क्योंकि इसका असर हाइमन पर पड़ेगा। अविवाहित रहते हुए वह मेंस्ट्रुअल कप नहीं लगा सकती। एक महानगर की शिक्षित स्त्री रोग विशेषज्ञ अगर ऐसी मिथक का समर्थन कर रही है, तो यह कितनी गंभीर स्थिति है। महिलाओं की पवित्रता को हाइमन से जोड़ना एक व्यापक और ग़लत सामाजिक मिथक है, जो अब भी जारी है। जबकि चिकित्सकीय रूप से यह बिल्कुल भी सच नहीं है। सामाजिक दबाव और रूढ़िवादिता के कारण, महिलाएं अपने यौन स्वास्थ्य को लेकर सजग नहीं हो पाती हैं। इसके साथ ही, उन्हें अपने व्यवहार और फैसलों को लेकर लोगों की बेवजह रोक-टोक और आलोचना भी झेलनी पड़ती है।

हाइमन एक पतली झिल्ली होती है, जो योनि के द्वार के पास होती है। यह जन्म के समय मौजूद होती है, और समय के साथ खेलकूद, टैम्पोन के उपयोग, या यौन संबंध बनाने जैसी गतिविधियों से यह खिंच सकती है या फट सकती है।

मेंस्ट्रुअल कप और लैंगिक पहचान का संघर्ष

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, क्वीयर समुदाय, विशेषकर ट्रांस मेन्स्ट्रुएटर्स और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों के लिए मेंस्ट्रुअल कप को अपनाना केवल एक उत्पाद का चुनाव नहीं, बल्कि एक जटिल मानसिक और सामाजिक चुनौती भी है। इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा ‘जेंडर डिस्फोरिया’ है, जिसमें कप को शरीर के भीतर डालने की प्रक्रिया, उन्हें उन जैविक अंगों का आभास दिलाती है। हालांकि जो उनकी वर्तमान लैंगिक पहचान से मेल नहीं खाते, जिससे उनमें तीव्र मानसिक तनाव उत्पन्न होता है। इस आंतरिक संघर्ष को बाज़ार की जेंडर-आधारित मार्केटिंग और गहरा कर देती है, जहां उत्पादों की पैकेजिंग और ‘महिलाओं के लिए’ जैसी भाषा उन्हें यह महसूस कराती है कि वे इस उपभोक्ता वर्ग का हिस्सा नहीं हैं, जिससे उनमें अलगाव की भावना जन्म लेती है।

व्यावहारिक स्तर पर, सार्वजनिक बुनियादी ढांचा उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बन जाता है। पुरुष शौचालयों के क्यूबिकल्स के भीतर पानी और डस्टबिन का नहीं होना मेंस्ट्रुअल कप को धोने या बदलने को असंभव बना देता है और सार्वजनिक सिंक का उपयोग करने से उनकी पहचान उजागर होने और हिंसा या भेदभाव का शिकार होने का डर बना रहता है। इसके साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं में संवेदनशीलता की कमी और डॉक्टरों की ‘मिसजेंडरिंग’ का भय उन्हें पेशेवर चिकित्सकीय सलाह लेने से रोकता है, जिस कारण वे सुरक्षित और स्वच्छ पीरियड प्रबंधन से वंचित रह जाते हैं।

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, क्वीयर समुदाय, विशेषकर ट्रांस मेन्स्ट्रुएटर्स और नॉन-बाइनरी व्यक्तियों के लिए मेंस्ट्रुअल कप को अपनाना केवल एक उत्पाद का चुनाव नहीं, बल्कि एक जटिल मानसिक और सामाजिक चुनौती भी है। इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा ‘जेंडर डिस्फोरिया’ है

भारत में वर्जिनिटी टेस्टिंग की क्रूर वास्तविकता

वर्जिनिटी को लेकर यह जुनून केवल मानसिक दबाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘वर्जिनिटी टेस्टिंग‘ जैसी अमानवीय प्रथाओं का रूप भी ले लेता है। भारत के कई समुदायों में आज भी शादी की पहली रात को ‘सफेद चादर’ की रस्म निभाई जाती है, जहां नव विवाहित महिलाओं को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए रक्तस्राव का सबूत देना होता है। इसके अलावा, चिकित्सा के क्षेत्र में लंबे समय तक ‘टू-फिंगर टेस्ट‘ का उपयोग किया जाता रहा, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट ने असंवैधानिक और मानवाधिकारों का हनन करार दिया है। यह प्रथाएं वैज्ञानिक रूप से आधारहीन हैं, क्योंकि हाइमन का टूटना यौन संबंध का प्रमाण नहीं है, फिर भी मेंस्ट्रुअल कप का उपयोग करने से हाइमन टूटने का डर महिलाओं को इस प्रगतिशील विकल्प से दूर रखता है, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि वे समाज की इन परीक्षाओं में विफल हो जाएंगी। 

भारत में ‘वर्जिनिटी’ टेस्ट को कानूनी तौर पर समाप्त कर दिया गया है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे प्रतिगामी और  महिलाओं की गरिमा के खिलाफ बताया है। शीर्ष अदालत और स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार, तथाकथित ‘टू-फिंगर टेस्ट’ का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इसे करना अब भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (निजता के अधिकार) का उल्लंघन माना जाता है। नेशनल मेडिकल कमीशन ने भी इसे ‘मेडिकल मिसकंडक्ट’ घोषित किया है, जिसके तहत ऐसा करने वाले डॉक्टरों का लाइसेंस तक रद्द हो सकता है। 

यह ‘वर्जिनिटी टेस्टिंग’ जैसी अमानवीय प्रथाओं का रूप भी ले लेता है। भारत के कई समुदायों में आज भी शादी की पहली रात को ‘सफेद चादर’ की रस्म निभाई जाती है, जहां नव विवाहित महिलाओं को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए रक्तस्राव का सबूत देना होता है।

मेंस्ट्रुअल कप अपनाने में चुनौतियां 

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के शोध के अनुसार, भारत के कई राज्यों में किए गए शोध और वैज्ञानिक विश्लेषण यह स्पष्ट करते हैं कि मेंस्ट्रुअल कप को अपनाने की प्रक्रिया केवल व्यक्तिगत चुनाव नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संघर्ष है। स्कूलों में प्रजनन स्वास्थ्य पर सीमित संवाद और इंटरनेट पर मौजूद भ्रामक जानकारियों के कारण वैज्ञानिक तथ्यों तक उनकी पहुंच बाधित रहती है। बिहार में 18 साल से अधिक उम्र की महिलाओं पर किया गया अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि उचित परामर्श और धैर्य के साथ इस कप की स्वीकार्यता बढ़ती है। हालांकि, सबसे चौंकाने वाला विरोधाभास महाराष्ट्र में नर्सिंग अधिकारियों पर किए गए शोध में सामने आया, जहां चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ी होने और कप की सुरक्षा का पूर्ण ज्ञान होने के बावजूद, लगभग सभी महिलाओं ने इसे व्यवहार में नहीं अपनाया। यह स्थिति साफ़ तौर पर दिखाती है कि केवल सूचना का प्रसार काफी नहीं है। जब तक मानसिक अवरोध, सामाजिक झिझक और वर्जिनिटी से जुड़े डर को जड़ से नहीं मिटाया जाता, तब तक वैज्ञानिक रूप से बेहतर होने के बावजूद मेंस्ट्रुअल कप जैसे उत्पादों की वास्तविक उपयोग दर सीमित ही बनी रहेगी।

भारत में यौन शिक्षा को अनिवार्य बनाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह केवल महिलाओं या पुरुषों तक सीमित मुद्दा नहीं है, यह हर व्यक्ति, हर लैंगिक पहचान और हर उम्र के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है, जब स्कूलों में व्यापक यौन शिक्षा दी जाएगी और घरों में माता-पिता अपने बच्चों से खुले और सम्मानजनक तरीके से बातचीत करेंगे, तो वर्जिनिटी, शरीर, पीरियड, हाइजीन और रिश्तों से जुड़े मिथक स्वाभाविक रूप से टूटने लगेंगे। साथ ही, ऐसी शिक्षा समाज में क्वीयर समुदाय, महिलाओं और पुरुषों, सभी के बीच समानता, समझ और सम्मान को मजबूत करेगी। मेंस्ट्रुअल कप जैसे उत्पादों को लेकर व्याप्त भ्रांतियां तभी कम होंगी, जब हम यह स्वीकार करेंगे कि शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाएं किसी की नैतिकता का पैमाना नहीं होतीं। इसलिए, सही जानकारी और संवेदनशील संवाद ही वह रास्ता है जो एक ऐसे समाज की ओर ले जाता है, जहां हर व्यक्ति अपने शरीर और स्वास्थ्य को लेकर सुरक्षित, जागरूक और आज़ाद महसूस कर सके।

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