परिवार की ‘शांति’ के नाम पर कैसे औरतों को उनके अधिकार से दूर किया जाता है
तस्वीर साभार:CSR Journal
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बनारस ज़िले के छतेरी गाँव की मुसहर बस्ती में रहनेवाली पचीस वर्षीय सोनी ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। शराबी पति और तीन छोटे बच्चों के साथ सोनी की ज़िंदगी बेहद संघर्ष में बीत रही है। हर दूसरे दिन पति के साथ मारपीट तो जैसे अब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका है। इस पर जब सोनी से बात की तो उन्होंने बताया, “हमने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। माँ-बाप ने छोटी उम्र में शादी कर दी। मुसहर जाति के लोगों की तो ज़िंदगी वैसे से बहुत संघर्ष वाली है, ऊपर से जब आप पढ़े-लिखे न हो और हाथ में एक हुनर न हो तो रोटी का जुगाड़ भी मुश्किल हो जाता है।”

सोनी इस बस्ती में अकेली नहीं हैं। अधिकतर महिलाओं की कमोबेश यही स्थिति है। बस्ती की इन महिलाओं को आर्थिक रूप से निर्भर बनाने के लिए बस्ती में एक सिलाई केंद्र की शुरुआत की गई, जहां ये मुसहर महिलाएं मुफ़्त में सिलाई सीख सकती हैं। सोनी अपनी बस्ती की दूसरी महिलाओं और लड़कियों के साथ वहां सिलाई सीखने जाने लगीं, लेकिन यह बात बस्ती के कुछ पुरुषों को नागवार गुज़री। कई मर्दों ने अपने घर की महिलाओं के साथ मारपीट कर उन्हें सिलाई पर जाने से ये कहते हुए मना कर दिया कि औरतें बाहर सिलाई सीखने जाती हैं तो गाँव के दूसरे पुरुषों की नज़र उन पर पड़ती है और सिलाई टीचर ने अगर इन औरतों को ज़्यादा होशियार बना दिया तो ये हाथ से निकल जाएंगी

सिलाई सेंटर पर सोनी, तस्वीर साभार: रेणू

इसके बाद कई महिलाओं ने सिलाई सीखना बंद कर दिया। इसके बारे में जब बस्ती की दूसरी महिला रन्नो से बात की तो उन्होंने बताया, “हम लोग सिलाई सीखने जा रहे थे, वहां हम लोगों को बहुत अच्छा लगता था। ये हमारी ज़िंदगी का पहला मौक़ा है जब हम कुछ सीख रहे थे, लेकिन हमारे आदमी ने मना कर दिया। अब हमारे लिए परिवार ज़्यादा ज़रूरी है। जब परिवार में ही शांति नहीं रहेगी तो हम कुछ सीखकर या चार पैसे कमाकर क्या करेंगें।”

सवाल यह है कि क्या सच में परिवार और समाज की शांति महिलाओं के घर बैठने और पुरुषों के हिसाब से ज़िंदगी गुज़ार देने में है या ये सिर्फ़ महिलाओं पर रोक लगाने के लिए पितृसत्ता का हथियार मात्र है।

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महिलाएं जब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने और अपनी पहचान बनाने के लिए आगे बढ़ती हैं, तो उन्हें हमेशा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ये अपने पितृसत्तात्मक समाज की सच्चाई है। लेकिन वह समाज जो आज के समय में महिलाओं के सशक्त होने के दावे करता है, वहां शिक्षा और कौशल विकास के अवसर के लिए भी औरतों द्वारा घर के बाहर कदम निकालने पर हिंसा का सामना करना एक अलग ही भारत की तस्वीर को दिखाता है। अब सवाल यह है कि क्या सच में परिवार और समाज की शांति महिलाओं के घर बैठने और पुरुषों के हिसाब से ज़िंदगी गुज़ार देने में है या ये सिर्फ़ महिलाओं पर रोक लगाने के लिए पितृसत्ता का हथियार मात्र है।

सिलाई सीखतीं महिलाएं और लड़कियां, तस्वीर साभार: रेणू

घरेलू हिंसा का हर रोज़ सामना करती महिला का चुप रहना है ‘शांति’?

इस बस्ती में अधिकतर महिलाएं हर दिन घरेलू हिंसा का सामना करती हैं। यह हिंसा शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और यौनिक रूप में होती है। बच्चे हर दिन अपनी माँ को पिता से मार खाते देखते हैं। ऐसा इसलिए नहीं होता कि उनकी माँ ने कुछ गलती की हुई है, बल्कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि किसी के पिता ने मज़दूरी के पैसे की शराब पी ली होती है और रात के वक्त जब भूख से बिलखते बच्चों को माँ चुप नहीं करवा पाती है तो नशे में धुत पिता माँ के साथ इस बात को लेकर मारपीट करता है। इस स्थिति में सवाल यह है कि क्या महिलाओं के हिस्से में मार खाकर चुप रहना ही परिवार की ‘शांति’ का मानक है?

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हिंसा करनेवाले पुरुष और महिलाओं को खुद से कमतर आंकनेवाले पुरुषों को कभी भी परिवार की अशांति का कारण नहीं माना जाता है। लेकिन जब महिलाएं पुरुषों की वास्तविक अशांति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती हैं तो उन्हें अशांति करने का कारण बताया जाता है।

क्या महिलाओं का अवसरों से दूर हो जाना ही है ‘शांति’?

महिलाएं जब भी समाज में अपनी पहचान बनाने या अपनी सशक्तिकरण के लिए कदम बढ़ाती हैं तो पितृसत्ता को यह बात नागवार गुज़रती है। ठीक यही हुआ इस बस्ती की महिलाओं के साथ भी। ग़रीबी, हिंसा और बदहाली से खुद को निकालने के लिए जब इन महिलाओं ने अपने कदम घर से निकाले तो पुरुषों को इस बात का डर सताने लगा कि कहीं ऐसा न हो कि वे उन्हें ज़वाब देने लग जाए या चार पैसे कमाने लगे। पैसा, पहचान और निर्णय लेने का अधिकार, ये सभी सत्ता के रूप हैं जो सदियों से पुरुषों के पास रहे हैं और जब भी महिलाएं इनकी तरफ़ अपने कदम बढ़ाती हैं तो पुरुषों को अपनी सत्ता खोने का डर दिखने लगता है।

भले ही वे आर्थिक रूप से कमजोर हो या उनकी सामाजिक प्रस्थिति और की अपेक्षा कम हो, लेकिन इन सबके बावजूद वे महिलाओं को खुद से कम आंकते हैं और उन्हें हर अवसर से दूर रखते हैं। अक्सर ये सुनने और देखने को मिलता है कि जब शादी के बाद महिलाएं अपने काम पर लौटने की बात करती हैं तो उनके सामने परिवार या नौकरी दोनों में से एक का चुनाव करने की शर्त रख दी जाती है। महिलाओं को अवसर से दूर करने का ये मूल है, जिसकी भाषा और रूप अलग-अलग समुदाय में अलग-अलग रूप में देखने के मिलते हैं, लेकिन मतलब सबका एक ही होता है।

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पैसा, पहचान और निर्णय लेने का अधिकार, ये सभी सत्ता के रूप हैं जो सदियों से पुरुषों के पास रहे है और जब भी महिलाएं इनकी तरफ़ अपने कदम बढ़ाती हैं तो पुरुषों को अपनी सत्ता खोने का डर दिखने लगता है।

हिंसा करनेवाले पुरुष और महिलाओं को खुद से कमतर आंकनेवाले पुरुषों को कभी भी परिवार की अशांति का कारण नहीं माना जाता है। लेकिन जब महिलाएं पुरुषों की वास्तविक अशांति के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती हैं तो उन्हें अशांति का कारण बताया जाता है। हिंसा के ख़िलाफ़ महिलाओं का आवाज़ उठाना एक पहलू हुआ, लेकिन यहां हम लोगों को यह भी समझना होगा कि आख़िर क्यों जब एक महिला अपने लिए कुछ भो सोचती हैं अपने निर्णय लेती हैं तो इससे परिवार और समाज की शांति भंग होने लगती है?

इन सबकी वजह से सदियों से चली आ रही जेंडर आधारित भूमिकाओं की रीति। चूंकि समाज ने महिला के हिस्से की ज़िम्मेदारी और काम को बक़ायदा बताया है और बचपन से उसे निभाने के लिए मजबूर किया है, इसलिए जैसे ही वे इस रूढ़िवादिता के ख़िलाफ़ बढ़ती हैं तो उन पर शांति बनाए रखने का दबाव दिया जाने लगता है। यहां हम लोगों को यह भी सोचना होगा कि इस शांति के मानक कौन तय करता है? कहीं ऐसा तो नहीं जिसने सदियों से समाज में राज किया है, वो अपने इस राज को सालों-साल क़ायम रखने के लिए महिलाओं को चुप करवाने को ही शांति और सबकी भलाई का नाम देता है।

बस्ती से लेकर शहरों तक महिलाओं के संघर्ष क़ायम हैं। उनके रूप अलग हैं लेकिन चुनौतियां सबके सामने ज़रूर हैं। आज जहां एक तरफ़ अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी जीने के लिए महिलाओं को संघर्ष करना पड़ रहा है, ठीक उसी समय जातिगत भेदभाव और हिंसा की वजह से हाशिएबद्ध समुदाय की महिलाओं को शिक्षा के अवसर तक पहुंचने के लिए भी हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। इन सभी प्रक्रियाओं में महिलाएं कभी हारती हैं तो कभी जीत जाती हैं और कई बार जीवनभर संघर्ष में गुज़ार देती हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि महिलाएं आगे बढ़ने, बेड़ियों को तोड़ने और घर की चौखट से कदम निकालने का प्रयास कर रही हैं, जो हमेशा राहत देता है।  

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तस्वीर साभार: CSR Journal

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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