महिलाओं के रोज़गार और आर्थिक आत्मनिर्भरता में रुकावट बनती हैं ये बातें
तस्वीर साभार: The Economist
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“उसे नौकरी क्यों करनी, उसकी तो शादी हो जाएगी।”

 “शादी के बाद परिवार पहले होना चाहिए नौकरी नहीं।”

“औरत कमाएगी तो घर की इज़्ज़त चली जाएगी।”

औरतों की नौकरी से जुड़ी ऐसी बातें आपने भी कभी न कभी ज़रूर सुनी होंगी। मैंने भी ऐसी कई बातें सुनी हैं। हमारी सरकारें हमेशा लड़कियों की शिक्षा और उन्हें आगे बढ़ाने के नारे देती है। महिलाएं ज़्यादा शिक्षित हो सकें इस बात पर पिछले कई सालों से लगातार ज़ोर दिया जा रहा है। लेकिन महिलाएं रोज़गार में आगे आए इसके लिए सरकार से लेकर अपने समाज तक की सोच बहुत ही खोखली है। इसका अंदाज़ा हम ऊपर लिखी उन बातों से लगा सकते हैं, जिसका सामना अक्सर उन महिलाओं को करना पड़ता है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं।

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“मम्मी की रोटी गोल-गोल और पापा का पैसा गोल-गोल।” यह कविता आपने भी बचपन में सुनी होगी, जिसमें मम्मी का मतलब रोटी से और पापा का मतलब पैसे से लगाया जाता है। ये वही विचार है जो मानता है कि महिलाओं को घर के काम करने चाहिए और पुरुषों को पैसे कमाने चाहिए।

जैसा कि हम अपनी ज़िंदगी में देखते हैं कि महिलाओं को उनकी जाति, धर्म, सुंदरता, अच्छी-बुरी, उम्र, वर्ग और मैरिटल स्टेटस के आधार पर अलग-अलग बांटा जाता है। ये महिलाओं की ज़िंदगी को हमेशा प्रभावित करते हैं। इन सभी बंटवारों को महिलाओं की ज़िंदगी में हमेशा बोलकर नहीं कई बार विचार और व्यवहार से भी प्रभावित किया जाता है। इसी में जब हम महिलाओं के रोज़गार और उनके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की बात को देखते हैं, उस पर समाज का बंदिशें लगाने लगता है। इसके बाद समाज अलग-अलग बहाने, बातों और विचारों से महिलाओं के रोज़गार की तरफ़ बढ़ते कदम को रोकने की कोशिश करता है। आज हम बात करेंगे कुछ उन कारणों की जो महिलाओं को शिक्षा के अवसर तक तो पहुंचा देते हैं, लेकिन उन्हें रोज़गार के अवसर तक जुड़ने में हमेशा रुकावट बनते हैं।

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लड़की को नौकरी करने की क्या ज़रूरत?

“मम्मी की रोटी गोल-गोल और पापा का पैसा गोल-गोल।” यह कविता आपने भी बचपन में सुनी होगी, जिसमें मम्मी का मतलब रोटी से और पापा का मतलब पैसे से लगाया जाता है। ये वही विचार है जो मानता है कि महिलाओं को घर के काम करने चाहिए और पुरुषों को पैसे कमाने चाहिए। ये कोई नयी सोच नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही समाज की वो सोच है, जिसे देखते हुए हमारे नानी-नाना से लेकर माता-पिता भी पले बढ़े है। इसी पितृसत्तात्मक सोच के चलते हमेशा यह माना जाता है कि लड़की को घर के काम आने चाहिए, पैसे कमाने नहीं और इसी सोच के साथ उसकी कंडिशनिंग भी की जाती है, क्योंकि पितृसत्ता कभी भी महिलाओं के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के पक्ष में नहीं है। इसलिए वह इस सोच को तैयार करती हैं कि लड़की को कमाने या नौकरी करने की ज़रूरत नहीं है। यह बात और विचार इतनी बार हमें बताया जाता है जिससे हम लड़कियां अपने दिमाग में इस बात को बैठा लें कि लड़की का काम घर संभालना है और उसकी आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी पुरुष की होती है।

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सोचने वाली बात है कि अगर महिलाएं अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे कमाती हैं या कई बार वे खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पैसे कमाती हैं तो यह समाज को बुरा क्यों लगता है और फिर वे इसे इज़्जत से जोड़कर क्यों देखने लगते हैं।

औरत के पैसे कमाने से घर की इज़्ज़त चली जाएगी

गांव में जब भी किसी कामकाजी महिला से मुलाक़ात होती है तो अधिकतर परिवारों में महिलाओं के ये अनुभव ही सामने आते हैं, जहां आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवारों में भी महिलाओं के काम और उनकी कमाई को कोई महत्व नहीं दिया जाता है। हमारे भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में बेहतर माना जाता है। इसलिए जब महिलाएं पुरुषों की तरह घर से बाहर निकलकर पैसे कमाती हैं तो ये बात समाज को बुरी लगती है और वह इज़्जत का खेल खेलना शुरू करता है। इसके आधार पर यह कहा जाने लगता है कि अगर घर की औरत काम करने या पैसा कमाने घर से बाहर निकलेगी तो इससे परिवार की इज़्ज़त चली जाएगी। अब यह सोचने वाली बात है कि अगर महिलाएं अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे कमाती हैं या कई बार वे खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पैसे कमाती हैं तो यह समाज को बुरा क्यों लगता है और फिर वे इसे इज़्जत से जोड़कर क्यों देखने लगते हैं।

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औरत के लिए परिवार पहले और नौकरी बाद में होनी चाहिए

समाज लड़की को अच्छी लड़की बनाने के लिए बचपन से ही इसबात पर दबाव देता है कि औरत के लिए पहली प्राथमिकता उसका परिवार होना चाहिए। इस सीख के लिए समाज बक़ायदा बचपन से ही महिलाओं और लड़कियों की कंडिशनिंग करता है। यह सोच एक समय के बाद हम महिलाओं पर इतनी ज़्यादा हावी होने लगती है कि वे पैसे कमाने या नौकरी के साथ-साथ घर के पूरे काम को अपने सिर ले लेती हैं। कई बार समाज और परिवार हम पर इस दोहरी ज़िम्मेदारी के लिए दबाव बनाने लगता है। गहरपुर गाँव की रहनेवाली माला बताती है, “मैं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का काम करती थी। शादी के कुछ महीने बाद मेरे बहुत मनाने पर मुझे ये काम करने का मौक़ा दिया गया, लेकिन घर के काम में कोई सहयोग नहीं मिलता था, इसलिए स्कूल से जाने बाद और स्कूल आने से पहले मुझे घर का सारा काम ख़त्म करके आना पड़ता है। इसके बाद जब मैं प्रेग्नेंट हुई तो कमजोरी काफ़ी ज़्यादा बढ़ने लगी थी इस दोहरे काम की वजह से और फिर मैंने खुद से ही काम छोड़ किया। अब मैं कोई नौकरी नहीं कर रही, बस घर की दहलीज़ तक सिमट गई हूं।”

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माला जैसी कई महिलाएं हम अपने आसपास देख सकते हैं, जिन्हें घर के काम के दबाव के चलते अपना काम छोड़ना पड़ता है और फिर पुरुष बड़े शान से कहते है कि ‘मैंने कभी काम के लिए मना नहीं किया, इन्होंने तो खुद ही काम करना बंद कर दिया। हम कभी भी इस बात तक नहीं पहुंच पाते कि महिलाओं को कितना सहयोग उसके परिवार से मिलता है, क्या सिर्फ़ हामी भरना ही परिवार की तरफ़ से सहयोग है?

ये कुछ ऐसी वजहें है जो अक्सर महिलाओं को रोज़गार से जुड़ने में रुकावट बनती हैं। कभी विवाहित होने तो कभी अविवाहित होने की वजह से महिलाओं को अक्सर अलग-अलग बातों, विचारों और व्यवहार से उन्हें शिक्षा के अवसर तक तो पहुंचाया जाता है, लेकिन रोज़गार और आर्थिक आत्मनिर्भरता की बात आते ही कई पाबंदियां लगाई जाती हैं, जिसे हमें समझने और चुनौती देनी की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार: The Economist

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