जाने तलाकशुदा पत्नी के भरण-पोषण के कानून के बारे में
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पिछले दिनों छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि एक हिंदू विधवा अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है अगर वह अपने वेतन या अन्य संपत्ति से आर्थिक रूप से खुद का भरण-पोषण नहीं कर सकती है। हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 19 विधवा पुत्रवधू का भरण-पोषण के मुताबिक कोई हिन्दू पत्नी, चाहे वह इस अधिनियम की शुरुआत से पहले या बाद में विवाहित हो, अपने पति की मौत के बाद अपने ससुर से भरण-पोषण प्राप्त करने की हकदार होगी। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत बहू की जिम्मेदारी महिला के पति की मौत के बाद ससुर और ससुरालवालों की होती है। ऐसे में बहू के अलग रहने या उसे घर से निकाल दिए जाने पर वह भरण-पोषण की हकदार होती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि भरण-पोषण क्या है? एक शादीशुदा महिला के भरण-पोषण की जिम्मेदारी किसकी है? भरण-पोषण में क्या-क्या शामिल होता है? इस लेख के ज़रिये हम इन सवालों के जवाब देने की कोशिश करेंगे।

भरण-पोषण या रखरखाव शब्द का मतलब समर्थन या जीविका है। किसी भी धार्मिक समुदाय के विवाह कानूनों में भरण-पोषण शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन इसका दावा करने का अधिकार निश्चित रूप से इस धारणा पर आधारित है कि दावेदार के पास खुद को सहारा देने के लिए या उसके अपने खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं। भरण-पोषण में आम तौर पर एक गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक खर्चों को शामिल किया जाता है। भरण-पोषण का अधिकार इसके दावेदार के केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं है। यह जीवित रहने से बढ़कर है।

रखरखाव की राशि तय करते समय अदालत कुछ कारकों को ध्यान में रखते हुए ही फैसला सुनाती है। अदालत को पति और पत्नी दोनों की संपत्ति, पति की कमाई करने की क्षमता, दोनों पक्षों के आचरण और रखरखाव की राशि तय करने के लिए अन्य परिस्थितियों को देखना होता है। भरण-पोषण की राशि तय करने से पहले, पार्टियों की स्थिति और उनके द्वारा दौरान शादी के दौरान रहे उनके जीवन स्तर को ध्यान में रखा जाता है।

भरण-पोषण या रखरखाव शब्द का मतलब समर्थन या जीविका है। किसी भी धार्मिक समुदाय के विवाह कानूनों में भरण-पोषण शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है। लेकिन इसका दावा करने का अधिकार निश्चित रूप से इस धारणा पर आधारित है कि दावेदार के पास खुद को सहारा देने के लिए या उसके अपने खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं।

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रखरखाव का अर्थ और अवधारणा

रखरखाव उस व्यक्ति द्वारा दिया जाता है जिस पर दूसरा व्यक्ति निर्भर होता है। भरण-पोषण की राशि व्यक्ति की कमाई और उन ज़रूरत पर निर्भर करती है जिनकी अन्य व्यक्ति को ज़रूरत होती है। साथ ही वे ज़रूरतें जो एक तर्कसंगत व्यक्ति को एक सामान्य जीवन जीने के लिए आवश्यक होती हैं। चूंकि भारतीय समाज में महिलाएं उस परिस्थिति में डाल दी जाती हैं कि वे आर्थिक रूप से अधिकतर अपने पतियों पर निर्भर करती हैं। ऐसे में अपवाद मामलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर मामलों में महिलाएं ही भरण-पोषण की हक़दार होती हैं।

भारत में भरण-पोषण से संबंधित बहुत से प्रावधान हैं। इन सभी प्रावधानों का उद्देश्य एक व्यक्ति को अपनी पत्नी, बच्चों और माता-पिता के संबंध में समाज के प्रति अपने नैतिक दायित्वों को निभाने के लिए मजबूर करना है। साथ ही इनका उद्देश्य विधिक प्रावधानों द्वारा एक सरल और त्वरित लेकिन सीमित राहत देना है। ये प्रावधान यह सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि उपेक्षित पत्नी और बच्चों को समाज के सामने बेसहारा सा न छोड़ दिया जाए क्योंकि पत्नी, बच्चे और पिता या माता की खुद को बनाए रखने में असमर्थता सामाजिक समस्याओं को जन्म दे सकती है।

रखरखाव के प्रकार

1- अंतरिम रखरखाव: इस प्रकार के भरण-पोषण का भुगतान याचिका दायर करने की तारीख से वाद खारिज होने की तारीख तक किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य याचिकाकर्ता/दावेदार की तत्काल जरूरतों को पूरा करना है। यह वह राशि है जिसका भुगतान उस व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और जिस पर दूसरा व्यक्ति आर्थिक रूप से निर्भर है। इस राशि में अदालत की कार्यवाही के खर्च के साथ-साथ कार्यवाही के दौरान हुए अन्य खर्चे भी शामिल हैं।

2- स्थायी रखरखाव: यह वह राशि है जो न्यायिक कार्यवाही पूर्ण होने के बाद एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को भुगतान की जाती है। पति और पत्नी के बीच अलग होने या अदालती कार्रवाई के ज़रिये से शादी टूटने के बाद न्यायालय इस प्रकार के भरण-पोषण का आदेश देता है।

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रखरखाव की राशि तय करते समय अदालत कुछ कारकों को ध्यान में रखते हुए ही फैसला सुनाती है। अदालत को पति और पत्नी दोनों की संपत्ति, पति की कमाई करने की क्षमता, दोनों पक्षों के आचरण और रखरखाव की राशि तय करने के लिए अन्य परिस्थितियों को देखना होता है। भरण-पोषण की राशि तय करने से पहले, पार्टियों की स्थिति और उनके द्वारा दौरान शादी के दौरान रहे उनके जीवन स्तर को ध्यान में रखा जाता है।

अलग-अलग कानूनों के तहत महिला का रखरखाव

  • हिंदू कानून के तहत रखरखाव।
  • मुस्लिम कानून के तहत रखरखाव।
  • ईसाई कानून के तहत रखरखाव।
  • पारसी कानून के तहत रखरखाव।
  • दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत भरण-पोषण।
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत भरण-पोषण।
  • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007

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हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत पत्नी का भरण-पोषण

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 रखरखाव के बारे में बात करती है कि पत्नी/पति अंतरिम भरण-पोषण का दावा कैसे कर सकते हैं। इस प्रावधान के तहत पति और पत्नी दोनों में से कोई भी जो कि आर्थिक रूप से कमज़ोर है वह भरण-पोषण का दावा कर सकता है। केवल हिंदू विवाह अधिनियम और पारसी विवाह अधिनियम के तहत पति और पत्नी दोनों अंतरिम भरण-पोषण के लिए दावा कर सकते हैं। अन्य विधियों में, केवल पत्नी ही अंतरिम भरण-पोषण का दावा कर सकती है। हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 स्थायी भरण पोषण की अवधारणा से संबंधित है, जो एक व्यक्ति (पति/पत्नी) को अदालत के आदेश के अनुसार सकल राशि या समय-समय पर या मासिक रूप से रखरखाव के रूप में किसी अन्य व्यक्ति (पति/पत्नी) को भुगतान करना पड़ता है।

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चूंकि भारतीय समाज में महिलाएं उस परिस्थिति में डाल दी जाती हैं कि वे आर्थिक रूप से अधिकतर अपने पतियों पर निर्भर करती हैं। ऐसे में अपवाद मामलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर मामलों में महिलाएं ही भरण-पोषण की हक़दार होती हैं।

हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के तहत पत्नी का भरण-पोषण

हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18(1) के अनुसार पत्नी अपने पति की मृत्यु तक या पत्नी की मृत्यु होने तक भरण-पोषण की राशि प्राप्त करने की हकदार है। हिंदू पत्नी निम्नलिखित आधारों के तहत अपने पति से अलग रहने पर भी भरण-पोषण पाने की हकदार है:

  • जब पति परित्याग के लिए उत्तरदायी हो।
  • जब पति क्रूरता के लिए उत्तरदायी हो।
  • जब पति कुष्ठ रोग से पीड़ित हो।
  • जब पति द्विविवाह के लिए उत्तरदायी है।
  • जब पति पत्नी की सहमति के बिना धर्म परिवर्तन करता है।

इस अधिनियम की धारा 23 भरण-पोषण की राशि के बारे में बात करती है। भरण-पोषण के लिए दी जाने वाली राशि की गणना कैसे की जा जाए और उस मात्रा का निर्धारण कैसे किया जाए, यह धारा उसी को स्पष्ट करती है। भरण-पोषण की राशि तय करते समय निम्न कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है:

  • पार्टियों की स्टेटस और पोजीशन।
  • दावेदार की मूल आवश्यकता।
  • उचित बुनियादी आराम जो एक व्यक्ति को चाहिए।
  • प्रतिवादी की चल और अचल संपत्ति का मूल्य।
  • प्रतिवादी की आय।
  • प्रतिवादी पर आर्थिक रूप से निर्भर सदस्यों की संख्या।
  • दोनों के बीच संबंधों की डिग्री।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अनुसार, केवल एक महिला जो अपने पति से तलाक लेती है या जिसे अपने पति द्वारा तलाक दे दी गई हो और जिसने किसी अन्य पुरुष से दोबारा शादी नहीं की है, वह भरण-पोषण पाने की हकदार है। एक विवाहित महिला जो अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है क्योंकि उसका पति परित्याग के लिए उत्तरदायी है या क्रूरता के लिए उत्तरदायी है या कुष्ठ रोग से पीड़ित है या पत्नी की सहमति के बिना द्विविवाह के लिए उत्तरदायी है या अपने धर्म को परिवर्तित करता है तो पत्नी इस अधिनियम के तहत भी विशेष भत्ते का दावा कर सकती है।

धरा 125 के अंतर्गत पत्नी के आलावा भी कई और लोग जोकि आर्थिक रूप से कमज़ोर हैं भरण-पोषण का दावा कर सकते हैं। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत निम्न व्यक्ति भरण-पोषण के उत्तरदायी हैं :

लिव-इन पार्टनर का भरण-पोषण 

2018 के एक मामले में, पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति यूयू ललित और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की माननीय सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में एक साथी पीडब्ल्यूडीवी अधिनियम के प्रावधानों के तहत रखरखाव की मांग कर सकता है। वहीं दूसरी ओर इंद्र शर्मा बनाम वी.के.वी. के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एक महिला जोकि विवाहित पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में है, उसे भी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत ‘घरेलू संबंध’ के दौरान माना जाएगा। इसलिए उसके रखरखाव को बनाS रखने में पुरुष की विफलता इस अधिनियम के अर्थ के भीतर ‘घरेलू हिंसा’ होगी और वह रखरखाव और मुआवजे जैसी राहत का दावा करने के लिए पात्र होगी।

मुस्लिम विधि में पत्नी का भरण-पोषण

मुस्लिम विधि के अनुसार पत्नी का भरण-पोषण का प्रथम दायित्व उसके पति का है। यह दायित्व उन सभी दायित्वों पर जो बच्चों या माता-पिता या दूसरे नातेदारों से सम्बंधित है उनपर वरीयता रखता है। पत्नी के भरण-पोषण में खाना, कपड़े, पति के साथ रहने की जगह (अपनी शादी से पहले की ही गरिमा के साथ) अर्थात् मकान, स्वास्थ एवं पत्नी के प्रसूति सम्बन्धी खर्चे सम्मिलित हैं। ये एक भ्रम है कि मुस्लिम विधि में पति तलाक़ के बाद अपनी पूर्व पत्नी को भरण-पोषण नहीं देगा। वह केवल इद्दत की अवधि तक पत्नी को भरण-पोषण देने के लिए बाध्य है।सही कानूनी स्थिति यह है कि इस अवधि के दौरान पत्नी द्वारा कानूनी रूप से पुनर्विवाह नहीं किया जा सकता है, इसीलिए पत्नी को इद्दत-अवधि के रख-रखाव को बिना शर्त भुगतान किया जाता है। हालाँकि, यदि पत्नी इद्दत के बाद भी अविवाहित रहती है तो पति को पत्नी का भरण-पोषण करना होगा, जिसमें सम्मिलित हैं :

  • नफ़क़ा ए रज़ात (बच्चे को पालने के दौरान दिया गया भरण-पोषण), और 
  • नफ़क़ा ए विलायत (बच्चे की अभिरक्षा के दौरान) ।

मुस्लिम महिला आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 के तहत और मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत भरण-पोषण प्राप्त कर सकती है।

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