इंटरसेक्शनलग्रामीण भारत लैंगिक भेदभाव की अतल खाई: पितृसत्तात्मक परिवेश में बेटियों को दुलारना, चूमना, गले लगाना आज भी उपेक्षित

लैंगिक भेदभाव की अतल खाई: पितृसत्तात्मक परिवेश में बेटियों को दुलारना, चूमना, गले लगाना आज भी उपेक्षित

यह भी समझना होगा कि इसमें पितृसत्ता की निर्मिति कितनी मज़बूत हुई कि समाज की सारी चेतना उसी सत्ता के अनुरूप ढल गई। पितृसत्ता ऊपर से जितनी मजबूत दिखती है क्या वह आंतरिक रूप से भी उतनी मजबूत है ऐसा होता तो वह स्त्री को लेकर इतना असुरक्षित क्यों रहता। बड़े होते बेटों को दुलारते हुए उसे आनंद आता है तो बड़ी होती बेटी को दुलारते हुए उसे वही आनंद क्यों नहीं आता? क्या उसे खुद पर भरोसा नहीं क्या अपनी कुंठाओं में वह इतना जकड़ा हुआ है कि बड़ी होती बेटी उसे मात्र ‘स्त्री’ दिखती है।

हमारे समाज में बच्चों को प्यार-दुलार देना एक समान अधिकार है लेकिन लैंगिक भेदभाव में ढले पितृसत्तात्मक समाज में जो दुलार-प्यार लड़कों को मिलता है वह लड़कियों को नहीं मिलता है। माता-पिता से लेकर भाई-बहन परिवार के अन्य सदस्य और रिश्तेदार भी ये भेदभाव करते हैं। गाँव में तो यह चलन अब भी बहुत बदला नहीं है। लोग जिस तरह बेटों को दुलारते हैं. चूमते हैं, गोद में उठाकर प्यार करते हैं उस तरह से बेटियों को नहीं दुलारते। अब जो थोड़ा-बहुत बदलाव आया है उसमें भी एक सीमा है, एकदम से समानता वहां भी नहीं है। एक दशक पहले तक गाँव में जन्मदिन सिर्फ बेटों का मनाया जाता था। अब इसमें थोड़ा सा परिवर्तन दिखता है। लोग छोटी बच्चियों के जन्मदिन मनाने लगे हैं लेकिन वही बच्चियां जब थोड़ी सी बड़ी होगी तो उनके साथ लड़कों से अलग बर्ताव किया जाने लगता है।

यह तो बात हो गई गांवों की लेकिन कस्बों और शहरों में भी देखने को मिलता है कि इस तरह की असमानता और भेदभाव के चलन में बहुत कमी नहीं है। इसमें एक बहुत चर्चित घटना याद आती कि समाज में लड़कियों को दुलारना-चूमना ख़ासकर अगर वे बड़ी हो गई हैं तो यह कितना वर्जित और उपेक्षित है। ये अभी-अभी कुछ दिन पहले की बात है कांग्रेस पार्टी के महासचिव राहुल गाँधी किसी सभा में अपनी छोटी बहन प्रियंका गाँधी को दुलार से चूम लेते हैं। इस घटना को सोशल मीडिया से लेकर आम जन-जीवन में खूब विरोध दिखा। लोगों को इस बात से शिकायत हो गई कि राहुल गाँधी ने अपनी बहन को इस तरह सार्वजनिक जगह पर कैसे चूम लिया। लोग संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देने लगे।

इस घटना से यह बात तो एकदम साफ हो गई कि यहां पितृसत्तात्मक और सामंती सोच कोई गाँव-देहात भर की बात नहीं है। अगर प्रियंका गांधी की जगह राहुल गांधी का कोई भाई होता और वह इसी तरह खुश होकर किसी सभा मे उसे चूम लेते तो ये समाज उनको कुछ नहीं कहता। इसके उलट भाई से भाई के प्यार की सराहना करता। लेकिन प्रियंका गांधी का यहां जेंडर से स्त्री होना एक मसला बन गया कि कोई वयस्क भाई वयस्क बहन को दुलार क्यों रहा है, चूम क्यों रहा है जैसे स्त्री होना मनुष्य होना नहीं है।

जिस दिन पितृसत्ता स्त्री को मात्र देह न मानकर मनुष्य मानने लगेगी उसी दिन उसे अपनी इस सहमी कुंठाओं से निजात मिल जाएगी। एक सामंती समाज ने मनुष्य को इस तरह बांट दिया है कि मनुष्य अपने ही बच्चों को एक समान दुलार-प्यार नहीं दे पाता। जो लोग किसी पिता या भाई को अपनी बेटी बहन को दुलारते देख घृणा की दृष्टि से देखते हैं उन्होंने जीवन में कभी दुलार प्यार का स्वस्थ और बराबरी का स्वरूप देखा ही नहीं होता है।

मुझे याद आती है इसी विषय से जुड़ी उसी समय की एक घटना। मैं एक सेमिनार के लिए कलकत्ता जा रही थी। ट्रेन में मध्यवर्गीय परिवार की कुछ स्त्रियां भी सफर कर रही थीं। उनकी बातचीत का विषय राहुल गाँधी का अपनी बहन को चूमना था। वे स्त्रियां राहुल गांधी के इस व्यवहार को बहुत शर्मनाक बता रही थीं। मेरे साथ जो एक और लड़की जा रही थी नेहा, वह इस अनर्गल प्रलाप को सुन नहीं पाई और वह उन स्त्रियों से इस मुद्दे को लेकर बहस करने लगी। मैं चुप होकर उनकी बहस सुनती रही। मैंने बाद में देखा कि जब नेहा जेंडर के इस भेदभाव पर अपनी बात बहुत तार्किकता से रखनी शुरू की तो उन महिलाओं ने नेहा को कंडीशनिंग के तहत समझाना शुरू किया कि कैसे राहुल गाँधी का अपनी बहन को चूमना गलत था।

वे कहने लगीं कि चाहे नेहा लाख आधुनिकता, लैंगिक भेदभाव की बात करे लेकिन एक शादीशुदा बहन को इस तरह चूमना गलत है। मैं हैरान और निराश होकर देखती रही कि इस संकीर्णता कि जड़ कहां है और स्त्रियां कैसे पितृसत्ता की लाठी थामकर खड़ी होती हैं। शादीशुदा बहन को चूमना इसलिए भी अनैतिक मान रही हैं कि वह लड़की किसी की पत्नी हो गई यानी किसी अन्य पुरुष की संपत्ति है। वे महिलाएं कुछ इसी तरह की दलील दे रहीं थी जो एकदम से पितृसत्तात्मक सोच-विचार की उपज थी और उसे अपनी संस्कृति से जोड़कर बता रही थीं।

दरअसल चाहे जो भी तर्क इस विषय पर दिए जाते हैं ध्यान से उन्हें देखा जाए तो सब कुतर्क ही होते हैं। दुलार-प्यार में भेदभाव मानवीय गरिमा के विरुद्ध आचरण है। वे स्त्रियां जो इस तरह की स्त्री-विरोधी दलीलें देती हैं क्या उनको यह दुलार-प्यार मिले तो खुशी नहीं होगी। ज़ाहिर है सबको खुशी होगी क्योंकि हम सब मनुष्य हैं। हम सब को दुलार-प्यार भाता है लेकिन पितृसत्ता की ऐसी कंडीशनिंग की स्वाभाविक क्रियायों को भी कृत्रिम कर दिया गया है। हम अपने आसपास गाँव-घर में, पारिवारिक संबंधों में देखते हैं कि हमारे वही संबंधी पिता, चाचा, भाई, बाबा, आजा, मामा आदि जो भी हमें बचपन में दुलारते थे, चूमते थे, स्नेह से गोद में भर लेते थे थोड़े से हमारे बड़े हो जाने पर सब हमसे उस तरह का बर्ताव नहीं करते। इस तरह हम धीरे-धीरे अकेले होते जाते हैं। वही हमारे ही साथ के लड़कों को वह दुलार-प्यार मिलता रहता है और हम लड़कियां अपने संघर्षों और अभावों को अकेले झेलते हुए बड़ी होती हैं।

यह भी समझना होगा कि इसमें पितृसत्ता की निर्मिति कितनी मज़बूत हुई कि समाज की सारी चेतना उसी सत्ता के अनुरूप ढल गई। पितृसत्ता ऊपर से जितनी मजबूत दिखती है क्या वह आंतरिक रूप से भी उतनी मजबूत है ऐसा होता तो वह स्त्री को लेकर इतना असुरक्षित क्यों रहता। बड़े होते बेटों को दुलारते हुए उसे आनंद आता है तो बड़ी होती बेटी को दुलारते हुए उसे वही आनंद क्यों नहीं आता? क्या उसे खुद पर भरोसा नहीं क्या अपनी कुंठाओं में वह इतना जकड़ा हुआ है कि बड़ी होती बेटी उसे मात्र ‘स्त्री’ दिखती है।

समाज में जो प्रचलित व्यवहार होते हैं वे ज्यादातर सत्ता से प्रभावित होते हैं। इसी क्रम में बच्चों का दुलार-प्यार भी आ जाता है ज्यादातर देखा जाता है कि बच्चों के दुलार प्यार का जो चलन पुरुष व्यवहार में होता है वही स्त्रियां भी अपना लेती हैं। जैसे उन्हें बड़े होने पर जो प्यार-दुलार अपने घर परिवार में नहीं मिला तो अपनी बेटियों को भी नहीं दे पाती हैं। जैसे समाज में ये धारणा जड़ हो गई है कि बेटियां ज़रा बड़ी हो गई तो उनमें गंभीरता आ जानी चाहिए उनको दुलार-प्यार की कोई ज़रूरत नहीं है। गाँव में तो ये खूब चलन देखने को मिलता है कि बड़ी हो गई बेटी को दुलारना अनैतिक कृत्य है। मैं जिस गाँव में रहती हूं वहां भी देखा और अन्य गांवों में भी देखा कि अगर बेटी वयस्क हो गई है और पिता उसे अब दुलार रहा है तो उसे संदिग्ध दृष्टि से देखेगें नहीं तो उस व्यक्ति को कोई गंभीर व्यक्ति नहीं मानेगा। उसके उस व्यवहार को अव्यवहारिक माना जाएगा।

इतने सारे पूर्वाग्रहों और सामाजिक कुंठाओं के बावजूद हम देखते हैं कि गाँव घर और शहरों में भी ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जो अपनी बेटियों को बड़े हो जाने पर दुलार-प्यार देते हैं। हालांकि, उसका स्वरूप थोड़ा सा उन्हें कृत्रिम करना पड़ता है लेकिन वह प्यार-दुलार देना बंद नहीं करते। ये कहना यहां जरूरी है कि ऐसे लोगों की संख्या समाज में बहुत कम है। लैंगिक भेदभाव की ये खाई भारतीय परिवेश में किस तरह से घुली हुई है कि इस तरह की कितनी हिंसा करते हुए हमें बोध ही नहीं रहता है कि हम एक मानसिक हिंसा कर रहे हैं। इस ज़मीन की परतों को समझने के लिए इसे उघाड़कर भेदभाव और अन्याय की जड़ों को खोजना होगा। एक गैरबराबरी के सिद्धांतों के आधार पर बनी हमारी सामाजिक संरचना का निर्माण हुआ है।

हम अपने आसपास गाँव-घर में, पारिवारिक संबंधों में देखते हैं कि हमारे वही संबंधी पिता, चाचा, भाई, बाबा, आजा, मामा आदि जो भी हमें बचपन में दुलारते थे, चूमते थे, स्नेह से गोद में भर लेते थे थोड़े से हमारे बड़े हो जाने पर सब हमसे उस तरह का बर्ताव नहीं करते। इस तरह हम धीरे-धीरे अकेले होते जाते हैं। वही हमारे ही साथ के लड़कों को वह दुलार-प्यार मिलता रहता है और हम लड़कियां अपने संघर्षों और अभावों को अकेले झेलते हुए बड़ी होती हैं।

फिर यह भी समझना होगा कि इसमें पितृसत्ता की निर्मिति कितनी मज़बूत हुई कि समाज की सारी चेतना उसी सत्ता के अनुरूप ढल गई। पितृसत्ता ऊपर से जितनी मजबूत दिखती है क्या वह आंतरिक रूप से भी उतनी मजबूत है ऐसा होता तो वह स्त्री को लेकर इतना असुरक्षित क्यों रहता। बड़े होते बेटों को दुलारते हुए उसे आनंद आता है तो बड़ी होती बेटी को दुलारते हुए उसे वही आनंद क्यों नहीं आता? क्या उसे खुद पर भरोसा नहीं क्या अपनी कुंठाओं में वह इतना जकड़ा हुआ है कि बड़ी होती बेटी उसे मात्र ‘स्त्री’ दिखती है।

जिस दिन पितृसत्ता स्त्री को मात्र देह न मानकर मनुष्य मानने लगेगी उसी दिन उसे अपनी इस सहमी कुंठाओं से निजात मिल जाएगी। एक सामंती समाज ने मनुष्य को इस तरह बांट दिया है कि मनुष्य अपने ही बच्चों को एक समान दुलार-प्यार नहीं दे पाता। जो लोग किसी पिता या भाई को अपनी बेटी बहन को दुलारते देख घृणा की दृष्टि से देखते हैं उन्होंने जीवन में कभी दुलार प्यार का स्वस्थ और बराबरी का स्वरूप देखा ही नहीं होता है। अपनी रोपी गई घृणाओं से निकलकर वे देखगें तो जानेंगे प्यार-दुलार पर सबका समान अधिकार है सबके हिस्से का प्यार सबको मिलना चाहिए।


About the author(s)

रूपम मिश्र

रूपम मिश्र मूल रूप से कवि हैं विभिन्न पत्र , पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हैं । 7 जून1983 को उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले के एक गाँव तिलहरा( सुजानगंज) में जन्म। प्रारंभिक से लेकर स्नातक तक शिक्षा जौनपुर जिले में पूर्वांचल में ही हुई। प्रतापगढ़ जिले में पट्टी तहसील के बिनैका गाँव में रहनवारी हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content