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साल 2018 अब विदा लेने को है| आने वाले नये साल की अग्रिम बधाइयों के साथ हम आपके लिए लाए हैं बीते सालभर में फेमिनिज्म इन इंडिया में प्रकाशित उन हिंदी लेखों की फेहरिस्त, जिन्हें आपने सबसे ज्यादा प्यार दिया| आइये हमलोग साथ मिलकर देखतें हैं इन लेखों की झलकियाँ !

1. महिलाओं का ‘खतना’ एक हिंसात्मक कुप्रथा स्वाती सिंह 

अक्सर यह देखा गया है कि परंपराओं के नामपर महिलाओं का शोषण होता है| खतना भी उसी का हिस्सा है| इसके जरिये ना सिर्फ महिलाओं की सेक्स इच्छा को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है, बल्कि उसे कई तरह की यातना झेलने को भी मजबूर किया जाता है| माहवारी और प्रसव के दौरान उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है|

2. पितृसत्ता को चुनौती देतीं 5 समकालीन हिंदी लेखिकाएं – मानवी वाहन

‘लिखना’ आवाज़ उठाने, विरोध करने और बदलाव लाने के सभी सशक्त तरीकों में से एक है। इस सशक्त तरीके का प्रभाव पितृसत्तात्मक समाज में औरतों के लिखने से देखा जा सकता है, क्योंकि औरतें जब अपनी बात लिखतीं हैं तो ये अपने आप में पितृसत्ता के लिए चुनौती बन जातीं हैं|  इन लेखिकाओं की कलम यह भरोसा दिलाती है कि पितृसत्ता के बने – बनाए ढांचे में जो दरारें पड़ना शुरू हुईं हैं, उसका सिलसिला थमेगा नहीं बल्कि पूरी रफ्तार के साथ लगातार चलता रहेगा और इस ढांचे को चकनाचूर करने में ‘स्त्री – लेखन’ बेशक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

3. पुरुषों के लिए भी खतरनाक है पितृसत्ता – प्रवीण उनियाल

पितृसत्तात्मक विचारधारा मर्द के नामपर उसे जिम्मेदारियों से लबालब कर देती है| उसे बचपन से ही यह सीखा दिया जाता है कि तेरी बहन तेरी जिम्मेदारी है| इसका ध्यान रखना| इसके साथ ही रहना| माँ-बाप तो जैसे मर्द की जन्मसिद्ध जिम्मेदारी मान लिए जाते हैं| बगैर इसकी परवाह किये कि वह खुद इन सबके लिए तैयार है भी या नहीं| कई दफ़ा तो मर्द इन जिम्मेदारियों के बोझ तले खुद को एक मशीन की तरह महसूस करने लगता है जिसका काम सिर्फ़ औरतों की जरूरतें पूरा करना भर है| शादी के बाद परिवार का मुखिया बनकर उसे पारिवारिक-जिम्मेदारियों से भर दिया जाता है| कई दफ़ा इनसब जिम्मेदारियों के बीच वह जीवन के बहुत से अच्छे पल नहीं जी पाता है|

4. पितृसत्ता की मार झेलता भारतीय कानून नीतू रौतेला

साल 2012 में एक दौर आया था और जिस जूनून से आम लोगो ने महिला हिंसा और बलात्कार की संस्कृति के खिलाफ़ कांधे से कांधा मिलाकर गलियों, कुंचो, गेटों को हिला दिया था| ऐसा लगता था कि एक स्वस्थ समाज का निर्माण होने वाला है, जहाँ यौन हिंसा, गैर-बराबरी जैसी बिमारियों का नामो निशान नहीं रहेगा और ऐसा हुआ भी| तुरंत-फुरंत सरकारी मशीनरी हलचल में आयी और जस्टिस वर्मा कमेटी इस दिशा के निर्माणके लिए बना दी गयी औरआया हजारों-लाखो लोगो के सहयोग का नतीजा “नया बलात्कार विरोधी कानून 2013” जिसमें केवल इतिहास और वर्तमान को ही नहीं बल्कि भविष्य में एक न्यायपूर्ण यौन हिंसा रहित समाज हो सके- ये तोहफा भी दिया गया!

5. औरत के ऑर्गेज्म की बात पर हम मुंह क्यों चुराते हैं? – पूजा प्रसाद 

एक स्त्री बिना पुरुष के साथ संबंध बनाए अगर  शारीरीक सुख प्राप्त करने में सक्षम है तो क्यों इसबात को यह पूरा समाज हजम नहीं कर पाता है? मैं यहां सीधेतौर पर मास्टरबेशन (हस्तमैथुन) के ऊपर बात कर रही हूं, जिसके बारे में ज्यादातर लड़के 10 से 12 साल की उम्र में ही जान लेते हैं| पर वहीं लड़कियों में वयस्क होने तक भी उन्हें  इसबात की पूरी जानकारी नहीं होती है और अगर वह बिना किसी पुरुष के साथ संबंध बनाए शारीरिक सुख प्राप्त करती हैतो उसे वह अपने दोस्तों  में  स्वीकार  नहीं कर पाती है। समाज में यह धारणा बना दी गयी है कि एक मास्टरबेट करता पुरुष| यानी जिसे आप सोच सकते हैं| उसे स्वीकार सकते है| पर वही एक मास्टरबेट करती हुई औरत की छवि किसी के दिमाग में नहीं आती है| उन्हें अपने लिए मास्टरबेशन गलत लगता है।

6. अंग्रेजी भाषा में क्यों सिमटी है ‘यौनिकता’?  – शालिनी सिंह 

दुर्भाग्यवश यौनिकता पर ज़्यादातर सामग्री अंग्रेज़ी में ही मिलती है और हमें अपनी भाषा में उसे जानने समझने के लिए अनुवाद पर निर्भर होना पड़ता है। क्या हमने कभी सोचा है कि अंग्रेज़ी को  जब हम हिन्दी में अनुवाद करते हैं तो उसके अर्थ में बदलाव होता है| साथ ही, वो इतनी कठिन महसूस होती है कि जिनका इस्तेमाल सिर्फ किताबी भाषा में किया जाता है, इसके चलते ऐसे शब्द जो अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद होने के बावजूद उतने ही कठिन और अनजाने लगते है क्योंकि उन्हें ना कभी किसी ने आम बोलचाल में सुना और ना कभी बोला है।

7. खास बात : ‘पीढियां बदल जातीं हैं, स्त्री की दशा नहीं बदलती|’ – कंचन सिंह चौहान – मानवी वाहन

अब भी बहुत सारी जगहों पर उसी स्थिति में है जहाँ सालों पहले थी या फिर स्त्री को अभी भी बहुत बदलना है। पीढ़ियाँ बदल जाती हैं स्त्री की दशा नहीं बदलती, जो बात मैंने अपनी कहानी ‘बदजात’ में कहनी चाही है। इसलिए मेरी कहानियों की संख्या का अधिक फीसद स्त्री – कथा है। तो फिलहाल मैं कहानी लिख रही हूँ| कोई वाद नहीं औरआगे भी ऐसा ही करना चाहती हूँ तो कहानी में वैसे तो पहले ही बहुत सारे विषयों पर लिखा जा रहा है, बहुत सारी नई-पुरानी समस्याओं पर मेरे वरिष्ठ और समकालीन कथाकार क़लम चला रहे हैं। फ़िर भी अग़र ऐसा कोई विषय है जिसपर आजतक नहीं लिखा गया, तो इस बात की शिकायत या चर्चा करने के बजाय कि इन विषयों पर कोई नहीं लिख रहा – मैं खुद ऐसे विषयों को एक्सप्लोर करके लिखना चाहूँगी।

8. महिलाओं पर बाज़ार की दोहरी मार – पूनम प्रसाद, सविता, पूनम कुमारी

आज नारियाँ नारीत्व बोध को भुलाकर अपनी स्वतंत्र अस्मिता व पहचान को दांव पर लगा रही है| नारी सौंदर्य आज एक बिकाऊ माल बन चुका है|  मुनाफा कमाने वाली कम्पनियाँ नारी सौंदर्य को बेचने के लिए नए-नए तरीके इजाद -कर रही है| बाजार स्त्री को सुंदर और आकर्षक बनाने की जरुरत समझकर अपने माल को खपाने का रास्ता तलाश रहा है| ब्यूटी मिथ सबसे पहले स्त्री  को एक वस्तु में परिवर्तित कर उसे चेतना शून्य बना रहा है|

9. औरतों की मानसिक स्वतंत्रता से होगा सशक्तिकरण  –प्रवीण उनियाल

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये औद्योगिकीकरण औरतों के लिए फायदेमंद भी है और वे यह भी मानतेहैं कि मौजूदा समाज में औरतों के जो सकारात्मक हालात हैं उसमें इसकी अहम भूमिका है| लेकिन भारतीय संदर्भ में देखा जाए तो मुझे लगता है कि इसी वजह से औरतों के ऊपर पहले से लदी जिम्मेदारियों के अलावा अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी आ गयी हैं|

10. बाल यौन शोषण का शिकार बचपन – सौम्य जैन

समाज में यौन विकृति शुरू से है और जिसका सबसे वीभत्स रूप बाल यौन शोषण हैं| लेकिन अपनी वीभत्सता के बावजूद इसके दर्द की आवाज़ हमेशा ही मौन रही| यही कारण है कि जब महिलाओं के साथ बलात्कार होते हैं तो हम एक लम्बी खामोशी ओढ़ लेते हैं या एक-दूसरे पर दोषारोपण का खेल शुरू कर देते हैं जिसकी समाप्ति पीड़िता के परिधान या उस मनहूस घड़ी या उसके अनुसार जगह के चुनाव पर ठीकरा फोड़ देने से होती है| लेकिन अब समय है इसबात पर गौर करने का कि आखिर हमारे समाज में ऐसे कौन से तत्व हैं जिसके चलते हमारे समाज में यौन शोषण के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं|

11. देवी की माहवारी ‘पवित्र’और हमारी ‘अपवित्र’? – स्वाती सिंह

देवी माँ के नामपर आज भी हमारी भक्ति पहले जैसे (या यों कहें कि देखने में पहले से ज्यादा) और महिला की स्थिति बद से बदतर है| हो सकता आप मेरी इस बात से सहमत न हो| तो आइये अपनी बात को पुख्ता करने के लिए महिला से जुड़े ऐसे मुद्दे पर बात करें जिसका ताल्लुक देवी से भी है| लेकिन देवी की प्रक्रिया को पवित्र औरमहिला की प्रक्रिया को अपवित्र माना जाता है- यानी कि माहवारी/ पीरियड/ मासिकधर्म|

12. पोर्न फ़िल्में : नजारे से पहले हमारे नजरिये की बात हो – नीतू तिवारी

हमारी भारतीय संस्कृति में कौमार्य का पवित्रता से ऐसा नाता जुड़ा है कि अपवित्र हो जाने के डर से विपरीत लिंग के प्रति शिक्षा व जानकारी तक से हमें दूर रखा जाता है| इसलिए कि कहीं कोई नया सवाल न खड़ा हो जाए। आख़िर पवित्रता की अवधारणा भी धर्म से जुड़ी है और धर्म हमारी आस्था का विषय है| 

13. क्या सेनेटरी पैड का टैक्स फ्री होना काफी है? – नीतू रौतेला

भारत जैसे देश में जहाँ एक बड़ा तबका गरीबी और भुखमरी से जूझ रहा है और दूसरी ओर आज भी औरतों को ऐसी परवरिश और उम्मीद से बांधा जाता है, जहाँ वो परिवार में खुद को सबसे पीछे रखें| ऐसे में क्या ये उम्मीद की जा सकती है कि सभी महिलायें हर महीने इस खर्च को वहन कर पाती होंगी? सच्चाई तो ये है कि स्वतंत्र और आधुनिक भारत में आज भी माहवारी पर ना तो बात की जाती है और न उसे बुनियादी जरूरतों में शुमार किया जाता है|

14. अच्छी लड़कियां गलती करके नहीं सीखतीं! – ज्योति राघव

लड़कों के मामले में कहा जाता है कि वे गलतियां करेंगे मगर सीख जाएंगे।आखिर लड़कियां गलतियां क्यों नहीं कर सकती हैं। कुछ लोग उसकी आजादी के लिएभी एक सीमा तय करने में लगे हैं। अगर वह सीमा लांघती है, तो लोगों को लगता है कि सशक्तिकरण की आड़ में लड़कियां बिगड़ रही हैं।

15. पद्मावत फिल्म के विरोधी बलात्कार पर चुप क्यों रहते हैं? –रोकी कुमार

पदमावत फिल्म पर युवा-वर्ग का विरोध और लगातार बढ़ती बलात्कार की घटनाओं पर इनकी चुप्पी इस बात को दिखाती है कि युवा सही मुद्दों से भटकर बेतुकी बातों के लिए हिंसा का रास्ता इख्तियार कर रहे है।  हिंसात्मक अपराध तो जैसे युवाओं के लिए खेल-मजाक की बात हो गई है, लेकिन हमें समझना होगा कि आखिर इस तरह के प्रदर्शन और अपने मुद्दों पर चुप्पी साधकर हम किसका नुक्सान कर रहे हैं? 

16. औरत क्यों न अपनाएँ सहज पहनावा? – कमलेश माथेनी

आज अगर लड़कियां अपने पहनावे में बदलाव लाने की कोशिश करती हैं, तो उस पर संस्कृति का हवाला देकर सवाला खड़े किए जाते हैं। लेकिन, पुरुष उस संस्कृति को तोड़कर अपने लिए सबसे सुविधाजनक विकल्प अपना चुका है, इस पर कोई सवाल नहीं उठता। ऐसे में लड़कियां भी क्यों नहीं अपने लिए सबसे सहज विकल्प चुनें?

17. औरत पर दोहरी मार जैसा है फिजिकल डिसेबिलिटी –मानवी वाहन

समाज में एक डिसेबल्ड लड़की को शिक्षा मिलना तो मुश्किल है ही, उसे एक अच्छा जीवनसाथी मिलना भी लगभग नामुमकिन – सा काम होता है।अगर उसके पास प्रेम या विवाह – प्रस्ताव आते भी हैं तो लोग सोचते हैं कि उसे तुरंत उस प्रस्ताव को मंजूर कर लेना चाहिए। मतलब चाहे लड़का कैसा भी हो, पर समाज एक डिसेबल्ड स्त्री को उस प्रस्ताव को ठुकराने का ऑप्शन नहीं देना चाहता। 

18. औरत ही औरत की दुश्मन नहीं बल्कि सच्ची हमदर्द होती है – स्वाती सिंह

‘औरत ही औरत की दुश्मन है’ जैसे हाथों में थमाए हुए गलत झुनझुने को बजा-बजाकर औरतों को आपस में बांटने की गलती जानबूझकर सदियों से लगातार दोहरायी गई है| इसलिए अब यह जिम्मेदारी हम सभी महिलाओं की है कि हम इस जुमले को अपने शब्दकोश से बाहर निकाल दें, क्योंकि इस बदलाव की शुरुआत हमें खुद से करनी होगी| वरना पितृसत्ता यह कभी नहीं चाहती कि महिलाएं एक-दूसरे को लेकर अपनी उलझनों को दूर कर एकजुट हों|

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