FII is now on Telegram
13 mins read

फेमिनिज़म इन इंडिया : आप अपनी किताब में एक शब्द का इस्तेमाल करती हैं जो है ‘संस्कृटाइज़्ड दलित’, आप यह भी लिखती हैं कि यह लोग ब्राह्मणवादी विचारधारा और दलित-बहुजन चेतना के बीच में कहीं झूलते रहते हैं, अपने आप को संतुलित कर रहे होते हैं। बिना स्पेस अप्रोप्रिएशन किए मैं इस शब्द के बारे में आपसे ही जानना चाहती हूं।

यशिका दत्त : देखिए यह बहुत ही बारीक़ सवाल है और अच्छा है कि आपने मुझसे यह पूछा। ब्राह्मणवादी विचारधारा या ब्राह्मणवादी संवेदनशीलता क्या है? जो हमारे विचार हैं जाति को लेकर, जो हमारे विचार हैं जेंडर को लेकर, आदमी और औरत के बीच में क्या अंतर होगा, उन दोनों के क्या जेंडर रोल्स होने चाहिए, कौन बाहर जाकर काम करेगा, लड़कियां घर से बाहर नहीं जाएंगी, मां-बाप तय करेंगे कि लड़का लड़की की शादी कहां होनी है। ये सब जो भारतीय समाज का हिस्सा है जिसे हम ‘इंडियन कल्चर’ कहते हैं, यही ब्राह्मणवादी विचारधारा है। हजारों साल से जब दलितों को यह बोलकर रखा गया कि आप आउटकास्ट हैं और आप इस विचारधारा का हिस्सा नहीं बन सकते क्योंकि आप की औरतें बाहर जाकर काम कर रही हैं, क्योंकि आपको धर्म की बारीकियां नहीं मालूम, क्योंकि आप घर पर गीता नहीं पढ़ते, क्योंकि आप अपने स्थानीय भगवान को मानते हैं, क्योंकि आप संस्कृत श्लोक नहीं बोल सकते, क्योंकि आपको एक तरह का खाना बनाना नहीं आता, तो इन सारे पहलुओं को लेकर काफी लंबे समय तक दलितों को आउटकास्ट रखा गया।

ठीक है, यह बात आप भी जानते हैं हम भी जानते हैं तो आज़ादी के बाद डॉक्टर आंबेडकर की कोशिशों के कारण जब दलितों को मुख्यधारा समाज में प्रवेश मिला, जब उनको यह पता चला कि वे भी पढ़ सकते हैं, कॉलेज जा सकते हैं, सिविल सर्वेंट्स बन सकते हैं, अपनी जीवनशैली को ऊपर कर सकते हैं, उनके लिए असिमिलेशन एक बहुत जरूरी चीज बन गई। यह असिमिलेशन हमें दुनिया भर में कई वंचित-शोषित समाजों में देखने को मिलता है। जब हम अफ्रीकी-अमेरिकी समाजों को अमेरिका में देखते हैं, उन्होंने भी वही तरीका अपनाना चाहा जो वाइट सोसाइटी ने लंबे समय तक किया था। उसी तरीके से भारत में जब दलितों को पता चला कि जिस मुख्यधारा से उन्हें दूर रखा गया है वह उस में जगह बना सकते हैं, तो उनके लिए यह आसान था कि वह ब्राह्मणवादी विचारधारा को मान लेते और उनका ऐसा चाहना इंसानी प्रतिक्रिया है तब जब बहुत लंबे समय तक उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया हो। कोई भी आउटकास्ट नहीं बनना चाहता। जब आप लंबे समय तक आउटकास्ट की तरह रखे जाते हैं तो आपकी पहली इच्छा उस मुख्य समाज का हिस्सा बनना होता है। इसीलिए जिन दलित परिवारों की एक, दो, पीढ़ियों को पढ़ने का मौका मिला, जैसे मेरी खुद के परिवार में, वहां ब्राह्मणवादी विचारधारा रही है।

मेरी मां सिविल सर्वेंट बनना चाहती थी उन्होंने मास्टर्स की पढ़ाई की पर उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया गया क्योंकि हमारे घर में कहा गया कि औरतें घर के बाहर जाकर काम नहीं करेंगी, ये दलित-बहुजन विचारधारा नहीं है। बल्कि उनकी मम्मी घर के बाहर काम करती थी, वह काम जो कि मैनुअल स्कैवेंजिंग का काम था, जिस काम के साथ काफी शर्म जुड़ा है। लेकिन तब भी वह बहू घर के बाहर काम करती थी क्योंकि यह उनका काम था लेकिन जब असिमिलेशन का टाइम आया तो उन्होंने तुरंत ब्राह्मणवादी विचारधारा को ले लिया। उन्होंने बोला कि हमारे घर की बहू-बेटियां बाहर जाकर काम नहीं करेंगी। इस घटना पर अकादमिक दुनिया में काम है कि कैसे हाशिये पर गए समुदाय मुख्यधारा समुदाय का हिस्सा बनना चाहते हैं। यही दलितों ने भी किया। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। एक समुदाय को इतने सालों तक कहा गया है कि तुम नीचे हो क्योंकि तुम ब्राह्मण नहीं हो तो जब उन्हें मौका मिलेगा तो वह ब्राह्मण बनने की कोशिश क्यों नहीं करेंगे। वे तुरंत से यह नहीं कहेंगे कि हमें ऐसा नहीं करना है,  क्योंकि यह करना बहुत ही रैडिकल एक्ट होगा जो कि कुछ लोग ही कर पाते हैं, एक्टिविस्ट्स कर पाते हैं। लेकिन हर किसी से ऐसी उम्मीद रखना स्मार्ट नहीं है, उम्मीदजनक नहीं है। 

Become an FII Member

ब्राह्मणवादी विचारधारा या ब्राह्मणवादी संवेदनशीलता क्या है? जो हमारे विचार हैं जाति को लेकर, जो हमारे विचार हैं जेंडर को लेकर, आदमी और औरत के बीच में क्या अंतर होगा, उन दोनों के क्या जेंडर रोल्स होने चाहिए, कौन बाहर जाकर काम करेगा, लड़कियां घर से बाहर नहीं जाएंगी, मां-बाप तय करेंगे कि लड़का लड़की की शादी कहां होनी है। ये सब जो भारतीय समाज का हिस्सा है जिसे हम ‘इंडियन कल्चर’ कहते हैं, यही ब्राह्मणवादी विचारधारा है।

और पढ़ें : यशिका दत्त से फेमिनिज़म इन इंडिया की ख़ास बातचीत का पहला भाग यहां पढ़ें

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपने अभी दिए गए अपने जवाब में अपनी मां का जिक्र किया है आपने अपनी किताब में भी अपनी मां का जिक्र किया है कि वह आगे पढ़ाई करना चाहती थी लेकिन नहीं कर पाई जिनके अपने कारण थे। अब क्योंकि पितृसत्ता फ्लूइड है और अलग-अलग समुदाय में अलग-अलग तरीकों में उसका अस्तित्व है। तो मेरा सवाल यह है कि अगर हम सिस्टरहूड की बात करें तो अलग-अलग समुदायों की महिलाएं कैसे एक दूसरे को सिस्टरहुड के दायरे में ले सकती हैं? इसका क्या तरीका हो सकता है औरतों की तरफ से?

यशिका दत्त : देखिए सिस्टरहूड एक बहुत ही सुंदर संकल्पना है लेकिन इसमें जाति को मिटाया नहीं जा सकता। इसमें बहुत सारी बातें हैं लेकिन मैं उदाहरण देती हूं। जैसे यहां अमेरिका में साल 2016 में यह कहा जा रहा था कि आप हिलेरी क्लिंटन को सिर्फ इसलिए वोट करिए क्योंकि वह पहली महिला राष्ट्रपति हो सकती हैं लेकिन उनकी नीतियां कामकाजी वर्ग के लिए और ब्लैक नागरिकों के लिए उतनी प्रगतिशील नहीं थी, ग्लोरिया स्टैनम जैसी नारीवादी ने हिलेरी का साथ देने को कहा था कि आप सॉलिडेरिटी के लिए उनका समर्थन करिए, क्योंकि महिलाओं की मौजूदगी के लिए यह जरूरी है। मेरा ऐसा नज़रिया बिल्कुल नहीं है। हालांकि इस देश में मेरा वोट नहीं है। सिर्फ इसलिए क्योंकि मेरा और उनका जेंडर एक है इसका मतलब यह नहीं होता है कि मेरे और उनके इंटरेस्ट भी एक हैं।

इसे अगर भारत के संदर्भ में देखते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उच्च जाति और दलित महिलाओं का जेंडर एक है इसका मतलब यह नहीं होता है कि उनकी परिस्थितियां भी समान हैं। लेकिन जो अंतर है जाति का है, कई बार वर्ग का है, जगह का है। ये बताता है कि किस तरह से हम पितृसत्ता को नेविगेट कर सकते हैं कि किसके पास कितनी आज़ादी है पितृसत्ता को नेविगेट करने की। जैसे कोई अगर काम करने के लिए बाहर जाती है तो किसके साथ हिंसा होने की ज्यादा संभावनाएं हैं। ये भिन्नताएं आती हैं, इसीलिए यह जो शब्द है सिस्टरहूड का मेरे हिसाब से आज के संदर्भ में बहुत उपयोगी नहीं है। मेरे हिसाब से हम अक्रॉस लाइन कास्ट सॉलिडेरिटी दें वह ज्यादा जरूरी है। हम अक्रॉस कास्ट लाइन जाति व्यवस्था के खिलाफ़ समझ को बढ़ावा दें वह जरूरी है। हमने कई उदाहरणों में देखा है कि औरतें ही वह होती हैं जो जातिगत हिंसा को बढ़ावा देती हैं या शुरुआत करती हैं। पानी को लेकर दलित और उच्च जातियों के बीच तनाव रहता है। कई बार यहां जो हिंसा होती है वह उच्च जातियों की औरतों द्वारा ही शुरू की जाती है। वे कहती हैं कि तुम हमारे नल के पास मत आओ क्योंकि हमारा पानी पीने का नल गंदा हो जाएगा। वे औरतें होती हैं जो अगर कोई दलित उनके घर आ रहा है तो उससे अलग प्लेट में खाना देती हैं।

वे महिलाएं होती हैं जो घर में बाथरूम साफ करने वालों को घर में आने नहीं देती हैं। सिस्टरहूड भारत के संदर्भ में मेरे हिसाब से बहुत ज्यादा कारगर नहीं है क्योंकि पहली बात हमें यह मानना होगा कि जाति व्यवस्था हमारे समाज में मौजूद है और दूसरी बात हमें यह समझना होगा कि वह किस तरह से काम करती है। मैं इस बात को यहां फिर से शुरू करना चाहती हूं क्योंकि अमेरिका में थिओरी बहुत अच्छे से डेवलप की गई हैं। यहां वाइट वीमेन सबसे ज्यादा पुलिस केस करती हैं ब्लैक पुरुषों और ब्लैक महिलाओं के खिलाफ। इस जगह भी सिस्टरहूड नाम का ब्लैंकेट टर्म काम काम नहीं कर सकता है। यहां पर उसको नाम दिया गया है वाइट फेमिनिज़म क्योंकि वे वाइट महिलाओं के हितों के बारे में ही सिर्फ काम करता है। इसीलिए जब तक सच में सॉलिडेरिटी नहीं आती है बहुत जरूरी है कि हम अंतर को रेखांकित करके यह बताएं कि दलित नारीवादियों और उच्च जाति की नारीवादियों के हित अलग-अलग हैं।

और पढ़ें : सोजॉर्नर ट्रुथ : श्वेत लोगों के ख़िलाफ़ केस जीतने वाली पहली ब्लैक नारीवादी मानवाधिकार कार्यकर्ता

मैं अमेरिका इसलिए नहीं आई थी कि मैं फिर से मिनी इंडिया में जाकर रहने लग जाऊं। पहली बात तो मैं यहां शिक्षा के लिए आई थी क्योंकि उस वक्त में कोलंबिया में थी, दूसरी बात मैं जाति और जेंडर और नेशनलिटी के वजह से अपने आप को सीमित नहीं रखना चाहती थी, ऐसा हो सकता है या नहीं वह एक अलग सवाल है। मैं भारत में जिन बेड़ियों के साथ थी दोबारा उनसे नहीं बंधना चाहती थी।

फेमिनिज़म इन इंडिया : एक इंटरव्यू में आप कहती हैं कि भारत के बाहर गयई तब जाकर आप अपनी दलित पहचान को क्लेम कर पाई। वहां भारतीय जाति व्यवस्था उस तरीके से नहीं थी तो आप वहां पर केवल एक ब्राउन महिला थी, लेकिन मैंने कहीं पढ़ा है कि भारत से बाहर भी उच्च जाति लोगों का अपना एक ग्रुप होता है जहां वे आपस में मिलते हैं और केवल अपने जाति के लोगों के साथ मिलते-जुलते हैं। आगे चलकर यह एंडोगमी के रूप में बदल जाता है जब वे आपस में शादी कर लेते हैं। इस बारे में आपके क्या अनुभव हैं?

यशिका दत्त : देखिए ये दोनों बातें जो आपने बोलीं वह दोनों सही हैं। जब मैं अमेरिका आई तब मेरी पहचान सिर्फ एक ब्राउन इंसान की थी। मुझे एक ब्राउन बॉडी की तरह देखा गया। मैंने इसके बारे में लिखा है, आपने सुना होगा सिस्को केस के बारे में। यह केस यहां के कोर्ट में चल रहा है जिसमें एक दलित इंजीनियर ने अपने 2 कर्मचारियों पर जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए। यहां होने वाली जातिगत भेदभाव पर पहले बात नहीं होती थी लेकिन 2020 के बाद काफी जागरूकता आ चुकी है और मैंने खुद इस बारे में काफी लेख लिखे हैं। लेकिन जब मैं अमेरिका आई थी तब मैं एक ब्राउन इंसान थी यह बात भी सही है क्योंकि यहां आने के बाद मैं यहां के भारतीय का हिस्सा नहीं बनी। मैं अपनी दलित पहचान को कुबूल कर पाई। हमारी पहचान के साथ जो शर्म जोड़ा गया है, हमें बचपन से वही सिखाया गया है, हमारे अंदर कूट-कूट कर वही भरा गया है, आप भंगी हैं तो आपको इस बात के लिए शर्मिंदा होना ही चाहिए, अपने आपको मैं इस एहसास से अलग कर पाई। ऐसा हुआ मैंने यह निर्णय लिया था कि मुझे यहां पर भारतीय समुदाय का हिस्सा बनना ही नहीं है। मैं नहीं चाहती थी कि मैं यहां भी फिर से अपनी जाति छुपाती रहूं या फिर जो ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की जो बात है वह फिर से मेरे ऊपर थोप दी जाए।

मैं अमेरिका इसलिए नहीं आई थी कि मैं फिर से मिनी इंडिया में जाकर रहने लग जाऊं। पहली बात तो मैं यहां शिक्षा के लिए आई थी क्योंकि उस वक्त में कोलंबिया में थी, दूसरी बात मैं जाति और जेंडर और नेशनलिटी के वजह से अपने आप को सीमित नहीं रखना चाहती थी, ऐसा हो सकता है या नहीं वह एक अलग सवाल है। मैं भारत में जिन बेड़ियों के साथ थी दोबारा उनसे नहीं बंधना चाहती थी। मैं कॉलेज में भी किसी समूह में शामिल नहीं हुई, ना ही मैं साउथ एशियन नेबरहुड में रहती हूं, ना ही मैं किसी मंदिर नेटवर्क का हिस्सा हूं। खैर मंदिर तो मेरे लिए भूल ही जाइए वैसे भी मैं किसी भी धर्म को नहीं मानती हूं। ये अलग बात है लेकिन मैंने दक्षिण एशियाई समूह से दूर रहना चुना। अगर मैं उनके साथ होती तो मेरा भी वही हाल होता जो काफी दलित लोगों के साथ होता है जिनके पास ये मौका नहीं है कि वह साउथ एशियन ग्रुप का हिस्सा ना बने क्योंकि अगर वह तकनीकी विभाग में काम करते हैं तो वहां पर कई सारे दक्षिण एशियाई हैं, कई सारे भारतीय हैं, वहां जातिवाद की दिक्कत तो झेलनी पड़ती है। लेकिन मैं पत्रकारिता करती हूं। मैं उस इलाके में रहती हूं जो ज्यादा कॉस्मापॉलिटन है, जहां कई अलग-अलग देशों के लोग रहते हैं क्योंकि मैं सक्रिय तरीके से यहां के इंडियन डायसफोरा का हिस्सा नहीं बनी इसीलिए मैं इन सब से बच पाई।

और पढ़ें : आईआईटी खड़गपुर की प्रोफेसर सीमा सिंह के बहाने बात अकादमिक दुनिया में मौजूद जातिवाद पर

फेमिनिज़म इन इंडिया : यह सवाल आपके दिए जवाब का एक्सटेंशन ही है। हम कई बार देखते हैं कि विदेशों में भारतीय संस्कृति को केवल सवर्ण एस्थेटिक के रूप में दिखाया जाता है। भारतीय सेलिब्रिटी जिस तरीके से विदेशों में भारतीय त्योहारों को दिखाते हैं वह पूरी तरह से सवर्ण दृष्टिकोण और एसथेटिक से निकल कर आया है। आप अपने अनुभव से हमें यह बताइए कि भारत की वैश्विक तश्वीर पर यह सवर्ण एस्थेटिक कितना हावी है?

यशिका दत्त : पूरी तरह हावी है। यह बढ़िया सवाल है। सवर्ण एस्थेटिक सिर्फ भारत के बाहर नहीं बल्कि भारत के अंदर भी भारत पर हावी है। हमारा जो पॉप कल्चर है, जो फिल्म कल्चर है, वह उठाकर देखिए वह भी पूरी तरीके से सवर्ण है। हमारे जो हीरो के नाम होते हैं उत्तर भारत में या हिंदी फिल्मों में वे होते हैं मल्होत्रा, सिंघानिया, ओबेरॉय, यह सारे जो अमीर नाम हैं ये उच्च जाति के ही नाम हैं। हमारे हीरो और हीरोइन की चमड़ी का रंग गोरा होना और रंगभेद की जो पूरी दिक्कत है सवर्ण एस्थेटिक को ही दिखाता है। वेस्ट में भारत की क्या छवि है बनाम भारत में भारत की क्या छवि है इन दोनों में ज्यादा अंतर नहीं है। भारत में भी दिवाली काफी महत्वपूर्ण त्योहार उसी तरीके से अमेरिका में भी भारतीयों के बीच दिवाली वैसा ही पर्व है। यूके में स्थिति अलग है क्योंकि वहां पर दक्षिण एशियाई के अंदर सिर्फ ज्यादातर भारतीय नहीं है बल्कि काफी बांग्लादेशी लोग भी हैं, काफी पाकिस्तानी लोग भी हैं। अमेरिका में नंबर के आधार पर भारतीय समुदाय बहुत मज़बूत है और राजनितिक रूप से भी बहुत सक्रिय और विजिबल ग्रुप है। अमेरिका में आकर बसना ही अपने आप में इतना बड़ा प्रिविलेज्ड स्टेप है, जो इस ख़र्चे को उठा सकता है वही अमेरिका आ सकता है। जो लोग यहां पर आकर काफी पहले से रहे हैं वो किसी न किसी मायने में प्रिविलेज्ड रहे हैं। भले ही उनके पास पैसे ना हों लेकिन उनके पास जाति का प्रिविलेज रहा है। 90% लोग यहां पर ऐसे सवर्ण लोग ही हैं। यहां पर ‘दिवाली इन टाइम स्क्वायर’ नाम का बहुत बड़ा उत्सव होता है। टाइमस स्क्वायर जो कि न्यूयॉर्क में है वह काफी विजिबल जगह है। टूरिस्ट्स आते हैं। वहां पर हिंदू ग्रुप एक बहुत बड़ा उत्सव मनाता है, ‘दिवाली इन टाइमस स्क्वायर’। यह पिछले दस साल से तो चल ही रहा है, दस साल होगा, आप एक बार फैक्ट चेक कर सकते हैं। तो इंडियन कल्चर की जो विजिबिलिटी आती है यहां वह दिवाली के जरिए आती है या फिर इंडिया डे परेड जो है वो भी काफी हद तक हिंदू संस्कृति को मनाता करता है, अपर कास्ट कल्चर। इसलिए अमेरिका में भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि उच्च जाति है क्योंकि यहां पर अधिकतर भारतीय उसी जाति से हैं। मुख्यधारा अमरीकी संस्कृति में यही पूरे भारत की तस्वीर है, दुर्भाग्य्वश।

आपके जो पाठक, जो नौजवान लोग हैं, जो दलित हैं, मैं उनसे यह कहना चाहूंगी कि यह आपकी जिम्मेदारी नहीं है कि आप सब को बताएं कि आप दलित हैं क्योंकि अभी भी आपको अपनी जातीय पहचान बताने पर बहुत दिक्क़तें होती हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपने एक जवाब में कहा था कि कैसे मीडिया लोगों का नजरिया बदलता है या बनाता है। पारंपरिक मीडिया ने कभी दलित-बहुजन पक्ष जनता के सामने नहीं रखा, लेकिन पिछले कुछ सालों में भारत में वैकल्पिक मीडिया उभर कर आया है जो ख़ुद को अलग स्थापित करता है। हालांकि यह वैकल्पिक मीडिया भी एक तरीके से सवर्ण की संख्या वाला स्पेस ही है। वैकल्पिक मीडिया को पारंपरिक मीडिया की तुलना में किस तरीके से आप बदलाव लाते हुए देखती हैं?

यशिका दत्त : बदलाव तो आया ही है। यह टर्निंग प्वाइंट रोहित वेमुला के मर्डर के बाद आया। उनके अंदर यह चेतना तब जागी जब रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या हुई। वैकल्पिक मीडिया बहुत अच्छा काम कर रहा है। आप कैरावन मैगजीन को देखिए जो कि एक प्रिंट मीडिया है, वायर है, स्क्रोल को ले लें। इनका कैच-ऑल टर्म यही था कि हम एक न्यू मीडिया स्पेस हैं, हम एक प्रगतिशील स्पेस हैं, तो बिना जाति के ऊपर बात किए वो अपने स्पेस को जस्टिफाई कर ही नहीं सकते। इसलिए कई न्यू मीडिया संस्थान जाति को लेकर जागरूक हैं कम से कम अगर पूरी तरीके से एंटी-कास्ट स्पेस ना बन पाएं हों। अगर वे ऐसे नहीं करेंगे वह कॉल आउट कर दिए जाएंगे। कई सारे दलित बहुजन लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, ट्विटर पर एक्टिव हैं, वे उन्हें कॉल आउट कर देंगे और उनके प्रगतिशील होने को कॉल आउट कर देंगे। पारंपरिक मीडिया ने अपने आप को कभी प्रोग्रेसिव कहा ही नहीं, वह उच्च जातीय संस्कृति का सिर्फ एक माउथपीस है। सवर्ण लोगों ने ही यह मीडिया संस्थान बनाए थे और वे उनके लिए ही बात करते थे। लेकिन ये न्यू मीडिया आउटलेट के पास जाति को ना का विकल्प नहीं था। हालांकि यहां भी बहुत सारा काम होना बाकी है, जैसे दलित पत्रकारों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है, कई नॉन-दलित दलित-बहुजन मुद्दों पर वैचारिकी लिखते हैं और उनसे राय तक नहीं लेते। लेकिन हमें इस बात को एकनॉलेज करना चाहिए कि वे कोशिश कर रहे हैं। 

और पढ़ें : विशाखा गाइडलाइंस के बहाने, कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा की वे बातें जो मुख्यधारा से छूट गईं

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपने अपने जवाब में रोहित वेमुला का जिक्र किया, आप अपने अधिकतर इंटरव्यू में उनका जिक्र करती हैं। आपने अपनी किताब में भी उनका जिक्र किया है। जो शोषित समुदाय के विद्यार्थी आज के समय में अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं और अपनी जातिगत पहचान को खुलेआम स्वीकार करते हैं, वे कमिंग आउट का अपना समय पार कर चुके हैं, वे कई तरह की दिक्कतें उठा रहे हैं। उनमें से कई अपने परिवारों में से ऐसे विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली पहली पीढ़ी हैं, उनके पास जानकारी के स्तर पर पर कमी है, अकादमिक स्तर पर उनका एक्सक्लूजन है, उन्हें कई बार अकादमिक दौड़ में पीछे छूटा हुआ महसूस होता है। ऐसे विद्यार्थियों के लिए आपका क्या संदेश होगा?

यशिका दत्त : जब मैंने अपनी दलित पहचान को कुबूल किया मैंने हमेशा यह बात बोली थी कि यह कोई आसान फैसला नहीं होता है किसी भी दलित इंसान के लिए और क्योंकि मेरे पास मौका था कि मैं अपने जातीय पहचान के बारे में, अपने ‘दलितनेस’ के बारे में बात कर सकूं जरूरी नहीं हर किसी के पास वह मौका हो। आपके जो पाठक, जो नौजवान लोग हैं, जो दलित हैं, मैं उनसे यह कहना चाहूंगी कि यह आपकी जिम्मेदारी नहीं है कि आप सब को बताएं कि आप दलित हैं क्योंकि अभी भी आपको अपनी जातीय पहचान बताने पर बहुत दिक्क़तें होती हैं। you don’t owe anything to anybody। दूसरी बात अगर आप अपनी जातिगत पहचान को कुबूल कर पा रहे हैं तो यह अपने आप में बहुत बड़ा हासिल है। एक नैरेटिव जो बहुत चालाकी से बनाया गया है आप उसको तोड़ रहे हैं जब आप अपनी जाति पर बात कर रहे हैं। यह ख़ुद में एक क्रांति है।

आप अपनी जाति के बारे में बात करके सिर्फ अपने बारे में बात नहीं कर रहे हैं बल्कि जाति के ऊपर होने वाले संवाद को एक नया मोड़ दे रहे हैं। इस बात की महत्तता को कभी भी छोटा मत समझिए। ये बहुत बड़ी बात है। इसकी वजह से जो आपके साथ संस्थागत भेदभाव हो रहा है, जो अकादमिक भेदभाव हो रहा है वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। काश मेरे पास कोई तरीका होता कि मैं बता सकती थी आप प्रैक्टिकल स्थिति में क्या करें पर क्योंकि मैं उस स्थिति में नहीं हूं मेरे पास इस पर बात करने की आज़ादी नहीं है। अगर आप महसूस कर रहे हैं कि आप के साथ भेदभाव हो रहा है तो आप सॉलिडेरिटी जरूर ढूंढिए। ऑनलाइन भी कई सारे दलित बहुजन स्पेस हैं जो हमको वह जगह देते हैं कि हम सॉलिडेरिटी क्रिएट कर सकें। कई बार जब हमारे साथ भेदभाव होता है तो हमें लगता है कि सिर्फ हम ही हैं दुनिया में जिनके साथ ऐसा हो रहा है। उसकी वजह से हमें बहुत अकेला महसूस होता है। लेकिन जब हमें पता चलता है कि बाकी लोग भी है जो यह दिक्कत झेल कर रहे हैं हम इस बात को समझते हैं कि हम लोग मिलकर इस समस्या से लड़ सकते हैं। स्ट्रेटेजी बना सकते हैं। आप किसी को जानते हैं जो आपका सीनियर हो और जो दलित बहुजन हैं, या फिर कोई ऐसे जो अभी हाल में ग्रेजुएट हुए हैं, आप उनसे संपर्क कीजिए। आप उनसे पूछिए कि आप क्या प्रैक्टिकल कदम उठा सकते हैं अपने आप को सेफ़ गार्ड करने के लिए। कॉलेज में कोई दलित बहुजन स्पेस है तो उससे जुड़िए। अगर ऐसा कोई स्पेस नहीं है और आप यह करना चाहते हैं तो एक सॉलिडेरिटी स्पेस बनाइए। आरक्षण क्यों है जैसे बेवकूफ़ाना नैरेटिव से आगे बढ़कर हमें एक ऐसे स्पेस को बनाने की जरूरत है जहां दलित बहुजन विद्यार्थी एक दूसरे की मदद कर सकें। कई सारे रास्ते हो सकते हैं लेकिन मेरा सबसे पहला सुझाव यही रहेगा कि सॉलिडेरिटी की जब भी जहां भी जरूरत हो सॉलिडेरिटी मांगिए, ढूंढिए|

और पढ़ें : सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर कल्चर के बहाने बात वर्ग और जाति की


तस्वीर साभार : The Guardian

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

Leave a Reply