संस्कृतिसिनेमा सेक्स एजुकेशन : क्यों सबको देखनी चाहिए ज़रूरी बातें सिखाती यह सीरीज़

सेक्स एजुकेशन : क्यों सबको देखनी चाहिए ज़रूरी बातें सिखाती यह सीरीज़

नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुआ 'सेक्स एजुकेशन' सिरीज़ का तीसरा सीज़न बड़ी चर्चा में रहा। सेक्स और सेक्सुअलिटी से जुड़े मुद्दों को बड़ी सहजता के साथ प्रकाश में लाया गया है।

हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुआ कॉमेडी-ड्रामा ‘सेक्स एजुकेशन’ का तीसरा सीज़न बड़ी चर्चा में रहा और होना भी चाहिए। इस सीरीज़ में सेक्स और सेक्सुअलिटी से जुड़े मुद्दों को बड़ी सहजता और बिना किसी पूर्वाग्रह के खुलकर दिखाया गया है। ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर बात करने से हम या तो झेप जाते हैं या पूरी तरह से नज़रअंदाज़ ही कर देते हैं। सेक्स और सेक्सुअलिटी के साथ-साथ इस सीरीज़ में दोस्ती, पारिवारिक संबंध, विकलांगता, मानसिक स्वास्थ्य और स्कूली जीवन से जुड़े कई मामलों पर भी बेहद ज़रूरी चर्चा की गई हैं। सबसे ख़ास बात इस शो की यह है कि इसमें ये सब बातें बिना किसी मोरल-पोलिसिंग और पूर्वाग्रह के बेहद आसान और सहज रूप से दिखाई गई हैं।

शो के मुख्य पात्र ‘मूरडेल सेकेंडरी स्कूल’ के 16-17 साल के विद्यार्थी हैं जो कि अपनी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी यौनिकता, यौन ज़रूरतों को भी एक्स्प्लोर कर रहे हैं। पहले दो सीज़न में जहां ये विद्यार्थी मुख्य रूप से अपनी सेक्सुअलिटी को समझने की कोशिश करते हैं। वहीं, तीसरे सीजन में वे अपने हक़ के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करने की पशोपेश में नज़र आते हैं। तीसरे सीज़न में उनका मुख्य संघर्ष उनके स्कूल की नई प्रिंसिपल होप हेडन के खिलाफ है जो कि विद्यार्थियों को अपनी पहचान और विचार ज़ाहिर नहीं करने देती। वह स्कूल पर यूनिफॉर्म सहित नए-नए नियम लागू करती है जिससे यहां के विद्यार्थियों को उनका स्कूल जेल की तरह लगने लगता है। आइए नज़र डालते हैं इस सीरीज़ के कुछ ज़रूरी पहलुओं पर जो इसे ख़ास बनाती है।

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1- नॉन-बाइनरी, एलजीबीटी+ किरदारों का प्रतिनिधित्व

शो के कुछ प्रमुख क्वीयर/नॉन-बाइनरी किरदार

शो में अलग-अलग सेक्सुअल ओरिएंटेशन वाले एलजीबीटी+ किरदारों को जगह दी गई है। यूं तो गे, लेस्बियन, पैनसेक्सयूअल, एसेक्सुअल किरदारों की चर्चा पिछले सीज़न में हो चुकी थी, इस सीजन में एक नॉन-बाइनरी किरदार का भी चित्रण किया गया है। खास बात यह है कि इस किरदार को निभाने वाले कलाकार अपने असल जीवन में भी उसी पहचान से ताल्लुक रखते हैं। दुआ सालेह ‘कैल’ नामक किरदार निभाते हैं जिनको स्कूल की यूनिफार्म से दिक्कत है। वह ढीले-ढाले शर्ट,पैंट और ब्लेज़र पहनना चाहते हैं जो कि उनकी प्रिंसिपल को बिल्कुल ही नागवार है। प्रिंसिपल हेडन पहले उन्हें लड़कियों की यूनिफॉर्म पहनने की हिदायत देती है। सीरीज़ के आख़िर तक कैल अपनी पहचान से कोई समझौता नहीं करते हैं और अपनी मर्ज़ी के हिसाब से कपड़े पहनते हैं। वहीं, अन्य कई शो में अक्सर गे किरदारों का हास्यास्पद चित्रण होता है। इस शो में एरिक ओटिस का दोस्त जो गे है, उसे स्वतंत्र रूप से अपनी पहचान व्यक्त करते दिखाया गया है। यह ब्लैक क्वीयर प्रतिनिधित्व के लिए बेहद ज़रूरी चित्रण है। वहीं, इस शो के बाकी क्वीयर किरदार भी काफी सशक्त नज़र आते हैं। सेक्सुअलिटी को चंद शब्दों में नहीं समेटा जा सकता और इसके कई आयाम होते हैं। हर किसी को अपने आप को व्यक्त करने की आज़ादी होनी चाहिए।

2- विकलांगता के ज़रूरी पहलू

शो का किरदार आइसैक , तस्वीर साभार: BBC

अक्सर किसी विकलांग व्यक्ति को देखने पर हम उसका सारा वजूद, उसकी भावनाएं, उसकी पहचान उसकी विकलांगता से ही जोड़ देते हैं। उसके परे हम उस शख़्स को देखते ही नहीं है। शो में आइज़ैक के शरीर के निचला हिस्सा लकवाग्रस्त है। वह व्हील चेयर पर हैं। शो में मेव के साथ उनके कुछ सेक्सुअल सीन दिखाए गए हैं जिनकी बहुत तारीफ की गई है। यह चर्चित मीडिया में विकलांगता के पहलुओं को दिखाने का एक नया आयाम है। इन पेचीदा सीन को बड़ी ही सहजता के साथ दर्शाया गया है। शो में आइज़ैक की विकलांगता पर नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व और उनकी भावनाओं पर फोकस रखा गया है।

3- थेरेपी लेने में कैसी शर्म?

शो में डॉ. ज़ीन का किरदार, तस्वीर साभार: Twitter

शो में एक और चीज़ जिसे सामन्य दिखाया गया है और वह है थेरेपी लेना। अकसर हम मानसिक पीड़ा से गुजरने पर भी किसी विशेषज्ञ की मदद लेने से कतराते हैं। हम डरते हैं कि दुनिया हमें कहीं कमज़ोर न समझे। शो में इसी रूढ़िवादी मानसिकता को तोड़ने की कोशिश की गई है। शो की किरदार एमी के साथ बस में यौन हिंसा होती है। इसके बाद वह किसी भी काम में मन नहीं लगा पाती। अपने बॉयफ्रेंड से दूर भागती है, किसी के भी स्पर्श से असहज महसूस करती है। आखिर में थेरेपी लेने से ही वह सारी घटना को एक दूसरी नज़र से देख और समझ पाती है और बेहतर महसूस करती है। शो में ही कई अन्य लोगों को भी थेरेपी लेते देखा जा सकता है। रिश्ते में आए उतार-चढ़ाव को एक मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट/प्रोफेशनल की नज़र से देखने में खुद का नज़रिया भी विकसित होता है। शो के ज़रिये थेरेपी से जुड़े मिथक को दूर करने की कोशिश की गई है।

4- ‘मर्दानगी’ को नई मिली परिभाषा

शो के किरदार एरिक और ओटिस, तस्वीर साभार: Digital Spy

ओटिस, कहानी का मुख्य पात्र होने के साथ-साथ, एक बहुत ही संवेदनशील किरदार है। उसे स्कूल का ‘सेक्सपर्ट’ कहा जाता है। ध्यान से सुनने और सुझाव देने की ऐसी क्षमता के कारण ओटिस ‘टॉक्सिक मैस्क्यूलिनिटी’ को चुनौती देने में अहम भूमिका निभाता है। शायद ‘मर्दानगी’ की नई परिभाषा यह है कि इसकी कोई परिभाषा ही नहीं है।

5- हर शरीर सुंदर होता है

शो की किरदार एमी, तस्वीर साभार: Hello Magazine

अक्सर हम समाज के बनाए हुए सीमित सांचे में ढलना चाहते हैं। एक ही कद-काठी का शरीर हो, एक खास आकर्षक चेहरा हो, यहां तक कि पेनिस और वल्वा (योनि) के रूप का भी एक आदर्श स्थापित किया गया है। सेक्स एजुकेशन इसी झूठे आदर्श को तोड़ने का बेहतरीन प्रयास करता है। शो से हमें ‘बॉडी पाज़िटिविटी’ को बेहतर समझने का मौका मिलता है। शो में एमी को पता चलता है कि वल्वा कई प्रकार के होते हैं। वह फिर इस पर ‘ऑल वल्वाज़ आर ब्यूटीफुल’ वेबसाइट से जानकारी इकट्ठा करती है और इस विषय पर अपनी समझ बेहतर करती है। स्कूल में भी जागरूकता फैलाने के लिए वह तरह-तरह के रंग और आकर के वल्वा के रूप में कप केक्स बनाती है और अपने दोस्तों को बांटती है।

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यह शो हमें वह ज़रूरी शिक्षा देता है जो हमें हमारे स्कूली जीवन में नहीं मिली। हम सभी के स्कूलों में ऐसी घटनाएं हुई होंगी जिससे हमें बेवजह ही शर्मिंदा महसूस कराया जाता था। जैसे स्कर्ट की सही लंबाई होनी चाहिए, लड़कियां पोनी नहीं बना सकतीं, लड़का-लड़की साथ नहीं बैठ सकते, पीरियड पर वर्कशॉप सिर्फ लड़कियों के लिए होगी आदि। आज हमें यह घटनाएं मज़ाकिया भी लग सकती हैं पर कहीं न कहीं वह स्टिग्मा आज तक बना हुआ है।

लॉरी नुन, सेक्स एजुकेशन की डायरेक्टर मानती हैं, “कई लोगों को स्कूल में ऐसे अनुभव झेलने पड़े हैं जिससे कि उन्हें अपनी सेक्सुअलिटी या खुद को व्यक्त करने के तरीके को लेकर शर्म महसूस हुई हो। यह दुखद है कि साल 2021 में भी ऐसा हो रहा है। मुझे इन्हीं मसलों की तह तक जाकर एक्स्प्लोर करना था।” इस शो से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। अगर हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शो के किरदारों की तरह साफ शब्दों में बातें करें, जहां संकोच हो वहां सवाल करें, किसी को जज न करें तो बेशक हम पाएंगे कि हमारी कई समस्याओं का हल मिल गया है।

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तस्वीर साभार : Netflix

About the author(s)

सुचेता चौरसिया टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (TISS) मुंम्बई में मीडिया एंड कल्चरल स्टडीज़ की छात्रा हैं। अपने लेखन के ज़रिए वह समाज के हर भाग के लोगों में समरसता का भाव लाना चाहती हैं। वह पर्यावरण, लैंगिक समानता, फ़िल्म व साहित्य से जुड़े मुद्दों में रुचि रखती हैं। किताबें पढ़ना, बैडमिंटन खेलना, फोटोज़ खींचना उनके अन्य शौक हैं।

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