भारत में विकलांग बच्चों की शिक्षा को कोविड ने और बदत्तर बनाया
तस्वीर साभारः India CSR Network
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शिक्षा वह माध्यम है जो हर व्यक्ति को सशक्त बनाता है। भारत के संविधान के मुताबिक देश के हर नागरिक को शिक्षा का अधिकार प्राप्त है। देश में विकलांग लोगों की शिक्षा की ओर ध्यान दिया जाए तो उसकी स्थिति बेहद चिंताजनक है। पिछली जनगणना के मुताबिक भारत में करीब ढ़ाई करोड़ से अधिक विकलांग लोग हैं। यह पूरी जनसंख्या का 2.21 प्रतिशत हिस्सा है। विकलांग लोगों के शिक्षा के अधिकार के लिहाज से बात की जाए तो भारत में इस पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। विकलांग छात्रों के लिए विशेष स्कूलों का अभाव है जिस वजह से अधिकांश विकलांग लोग शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। जो स्कूल और संस्थान हैं उन पर बच्चों की संख्या के मुकाबले संसाधन न के बराबर हैं। शिक्षा से वंचित विकलांग वर्ग के अधिकांश लोग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बन पाते हैं। शिक्षा की गैरमौजूदी के कारण वे समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाते हैं। पहले से ही चुनौतीपूर्ण इन हालात से अलग विकलांग बच्चों की स्कूली शिक्षा व्यवस्था पर कोविड-19 महामारी ने बहुत बुरा असर डाला है।

यूनेस्को द्वारा भारत के संदर्भ में प्रकाशित रिपोर्ट ‘2019 स्टेट ऑफ द एजुकेशन रिपोर्ट फॉर इंडियाः चिल्ड्रन्स विद डिसेबिलिटी’ में देश में विकलांग बच्चों के शिक्षा के अधिकार के संबंध में उपलब्धियों और चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया। हर साल यह रिपोर्ट देश में विकलांग शिक्षा की स्थिति और नीति-निर्माताओं के समझ इसके सुधार के लिए प्रस्ताव रखती है। रिपोर्ट में कहा गया कि देश में लगभग 80 लाख विकलांग बच्चों को इनका वाजिब हक मिलना चाहिए।

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रिपोर्ट के अनुसार देश के पांच वर्ष की आयु के विकलांग बच्चों में से तीन-चौथाई और 5 से 19 साल की उम्र के एक-चौथाई बच्चे किसी भी स्कूल में नहीं जाते हैं। विकलांग लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या स्कूल नामाकंन में बेहद कम है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 5 से 19 वर्ष की उम्र के केवल 61 प्रतिशत बच्चें स्कूल जा पाते हैं। लगभग 12 प्रतिशत विकलांग बच्चे अपनी स्कूली शिक्षा बीच में ही छोड़ देते हैं। यही नहीं लगभग 27 प्रतिशत विकलांग बच्चे अपने जीवन में कभी भी किसी शिक्षण संस्थान में नहीं जाते हैं।

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विकलांग बच्चों को समावेशी और उच्च गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए भौतिक बुनियादी ढ़ाचे की व्यवस्था, स्कूल में उनके अनुकूल ढ़ाचा, साहयक तकनीक और उपकरण जैसे संसाधनों की उपलब्धता होना भी बहुत जरूरी है।

शिक्षा की गुणवत्ता का होना बहुत मायने रखता है। रिपोर्ट में शिक्षा के स्तर में सुधार के अनेक प्रस्ताव रखे गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि शिक्षा प्राप्त करने वाले विकलांग बच्चें नियमित रूप से स्कूल नहीं जाते हैं। ये अपनी शिक्षा नेशनल इंस्ट्टीयूट ऑफ ओपन स्कूल से प्राप्त करते हैं। एनआईओएस के 2009 और 2015 में विकलांग वर्ग में हुए पंजीकरण के मुताबिक ज्यादा विकलांग बच्चे यहां पढ़ रहे है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मानसिक बीमारी और बहु-अपंगता वाले बच्चे स्कूल में दाखिला कम लेते हैं। कोविड-19 से पहले जारी हुई इस रिपोर्ट में विकलांग स्कूली बच्चों की शिक्षा की खराब व्यवस्था व कमियों को उजागर किया गया। महामारी के बाद विकलांग स्कूल शिक्षा में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा होगा, इस सवाल का वाजिब जवाब सामने आना बहुत जरूरी है।

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समावेशी सोच की अधिक आवश्यकता

यूनेस्को की रिपोर्ट में इस बात पर बहुत जोर दिया गया कि विकलांग समुदाय के उत्थान के लिए समावेशी सोच की बहुत आवश्यकता है। मुख्यधारा में लाने के लिए समावेशी शिक्षा की मुख्यधारा में विकलांग बच्चों को शामिल करना बेहद ज़रूरी है। इस काम के लिए बच्चों के माता-पिता के अलावा शिक्षकों का रवैया भी बहुत महत्वपूर्ण है। विकलांग बच्चों को समावेशी और उच्च गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए भौतिक बुनियादी ढ़ाचे की व्यवस्था, स्कूल में उनके अनुकूल ढ़ाचा, साहयक तकनीक और उपकरण जैसे संसाधनों की उपलब्धता होना भी बहुत जरूरी है। शिक्षकों के प्रशिक्षण को बेहतर करा जाएं ताकि वह बच्चों को सरलता से ज्ञान दे सकें। विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि के अनुच्छेद 24 के अनुसार राष्ट्रों को यह सुनिश्चित कराने के लिए कहा गया है कि सभी विकलांग व्यक्तियों को बिना किसी भेदभाव के समान तरीके से शिक्षा की सुविधा उपलब्ध करवाई जाए।   

कोविड-19 से प्रभावित विकलांग बच्चों की स्कूली शिक्षा

विकलांग बच्चों की स्कूली शिक्षा की भारत में क्या स्थिति है इसे जानने के लिए ज्यादा पीछे जाने की भी जरूरत नहीं है। इसी वर्ष भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र बनारस के हनुमान पोद्दार अंध विघालय के छात्रों का सड़कों पर प्रदर्शन करना साफ बता सकता है कि भारत की सरकार विकलांग छात्रों की शिक्षा को लेकर कितनी संवेदनशील है। स्कूल के सरकारी ग्रांट न पहुंचने के कारण वहां के बच्चों को कोविड काल में ही सूचित कर दिया गया था कि अपनी शिक्षा व्यवस्था का प्रबंध किसी अन्य जगह देख लीजिए। देश के प्रधानमंत्री के चुनावी क्षेत्र के अंध विघालय के बच्चों को जब यह परेशानी का सामना करना पड़ रहा है तो देश के अन्य विकलांग स्कूलों की क्या स्थिति होगी। कोविड-19 के दौरान देश के करोड़ों बच्चों ने तालाबंदी के बाद ऑनलाइन शिक्षा के लिए बहुत परेशानी का सामना किया। ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच में विकलांग बच्चों की स्कूली शिक्षा को पूरी तरह ही नज़रअंदाज़ किया गया।

विकलांग बच्चों की स्कूली शिक्षा की भारत में क्या स्थिति है इसे जानने के लिए ज्यादा पीछे जाने की भी जरूरत नहीं है। इसी वर्ष भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्वाचन क्षेत्र बनारस के हनुमान पोद्दार अंध विघालय के छात्रों का सड़कों पर प्रदर्शन करना साफ बता सकता है कि भारत की सरकार विकलांग छात्रों की शिक्षा को लेकर कितनी संवेदनशील है।

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा चार राज्यों में किए सर्वेक्षण के अनुसार पर्याप्त शिक्षण सामग्री की अनुपस्थिति, डिजिटल उपकरणों तक पहुंच न होना, काम को समझने की चुनौतियां और ऑनलाइन क्लास में सांकेतिक भाषा का प्रयोग जैसी बहुत सी समस्या विकलांग बच्चों को कोविड-19 के दौरान अपनी शिक्षा को लगातार जारी रखने में आई। इस रिपोर्ट के अनुसार केवल 9 प्रतिशत विकलांग छात्र शिक्षकों द्वारा घर पर जाने के समक्ष थे। विशेष रूप से बौद्धिक विकलांग छात्रों के लिए भौतिक रूप से ही शिक्षा लेना महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर बिजनेस स्टैर्ण्ड में प्रकाशित खबर के अनुसार ऑनलाइन क्लॉस की सुचारू व्यवस्था न होने के कारण 43 प्रतिशत विकलांग बच्चों ने पढ़ाई छोड़ने की बात को स्वीकार किया। इस सर्वे के मुताबित लगभग 77 प्रतिशत बच्चों ने कहा कि उन्हें ऑनलाइन शिक्षा से समझने में बहुत परेशानियों को सामना करना पड़ा। यही नहीं 44 प्रतिशत विकलांग बच्चों ने यह भी कहा कि ऑनलाइन शिक्षा के वेबिनार के दौरान किसी तरह की साइन लैग्वेंज का भी कोई प्रयोग नहीं होता था।

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देश में सब तक ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच बहुत बड़ी समस्या है। सब तक तकनीक के साधनों की सुगम पहुंच न होने के कारण पहले से पिछड़े विकलांग बच्चे मुख्याधारा में और अधिक पिछड़ रहे हैं। लगभग 64 प्रतिशत बच्चों के पास कोई स्मार्टफोन और कम्प्यूटर न होने के कारण वे इस दौरान पूरी तरह से शिक्षा से दूर रहें। भारत में विकलांग बच्चों को बेहतर शैक्षिक सुविधा, सामाजिक व आर्थिक रूप सशक्त करने के लिए तकनीक ज्यादा अवसर प्रदान कर सकती है। उनको मुख्यधारा में लाने और समाज के समावेशी सिद्धांत को पूरा करने के लिए शिक्षा और तकनीक तक उसकी पहुंच बहुत आवश्यक है।

तमाम दावों के बावजूद विकलांग बच्चों की शिक्षा और तकनीक तक की उनकी पहुंच की स्थिति ज़मीनी स्तर पर नहीं है। स्कूल में समावेशी माहौल की कमी, विकलांग विद्यालयों की ग्रांट मे कटौती, ऑनलाइन शिक्षा का विकलांग बच्चों के पहुंच से दूर होना, ऑनलाइन कार्यक्रम विकलांग छात्रों के प्रतिकूल होना यह दर्शाता है कि देश की सरकार इस विषय को लेकर कितनी लाहपरवाह है। वास्तव में ‘दिव्यांग’ कहने के अवाला विकलांग समुदाय के छात्रों को बेहतर शिक्षा और अवसर चाहिए जिससे वे खुद को सशक्त कर सकें। शिक्षा के माध्यम से अपनी पहचान बना सकें, आत्म निर्भर हो सकें।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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