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सोशल मीडिया एक्टिविज्म या आम भाषा में ‘इंस्टा एक्टिविज़म’ कई स्तरों पर प्रिविलेज्ड होने के बावजूद एक प्रगतिशील सोच को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है इसमें कोई संदेह भी नहीं है। हालांकि, जो सोशल मीडिया इतने बड़े स्तर पर जब प्रगतिशील विचारधाराओं के प्रचार का सहायक सिद्ध हो रहा है। वही सोशल मीडिया होमोफोबिया और स्त्री द्वेषी मानसिकता को भी पोषित कर रहा है।

हिंसा के मुद्दे पर हम अमूमन शाब्दिक हिंसा को नजरंदाज़ कर जाते हैं। सत्ता अपने से कमज़ोर को उसकी कमज़ोरी का एहसास करवाकर अपने अहम को पोषित करती है। इसी क्रम में जब शोषक शारीरिक हिंसा नहीं कर पाता तब शब्दों द्वारा अपनी सत्ता का प्रयोग करता है। मसलन, चिढ़ाना, ताने मरना, अभद्र या अश्लील टिप्पणी करना, स्त्रीसूचक अपशब्द आम भाषा में मां–बहन की गालियां देना।

यूट्यूब स्ट्रीमर या रोस्टर के नाम पर कई चैनल बने हैं जो ऐसी ही पॉपुलर वीडियो और मीम आदि पर कॉमेंट करने के नाम पर अनर्गल बकवास करते हैं। खासकर क्वीयर समुदाय के लोगों का वीडियो लेकर उन पर उनकी लैंगिकता और जेंडर एक्सप्रेशन को लेकर उनका मज़ाक बनाते हैं। कई बार आम वीडियोज में दूसरे मुद्दों पर भी बोलते हुए वे गालियों का ही नहीं बल्कि जाति सूचक, लैंगिक भेदभाव पूर्ण, स्त्री विरोधी भाषा का भी प्रयोग करते हैं। इस बात पर भारतीय दर्शकों और सोशल मीडिया यूज़र्स का ध्यान तब पड़ा जब क्वीयर और फेमिनिस्ट विचारधारा के लोगों द्वारा कैरी मिनाटी नामक एक यूट्यूबर के एक वीडियो के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई गई।

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चीन के साथ अंतरराष्ट्रीय संबंधों का हवाला देकर टिकटॉक जैसे ऐप को बंद करवाया गया। इस ऐप ने ज़मीनी और गरीब तबके के लोगों के लिए एक दरवाज़े का काम किया था। वे अपनी भावनाएं और टैलेंट को बड़े स्तर पर लोगों के सामने रख रहे थे। हमने कई ऐसे क्वीयर चेहरे देखे जिन्होंने इस ऐप द्वारा काफी लोकप्रियता हासिल की। लेकिन जहां ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमज़ोर क्वीयर और नॉन बाइनरी अपने होने का एहसास करवा रहे थे, वहीं उनके इन वीडियोज़ पर यूट्यूब रोस्टरों ने ‘सो कॉल्ड कूल’ बनने के लिए, इन्हीं को गालियां देकर, चिढ़ाकर, ट्रोल करके प्रसिद्धि हासिल की।

यूट्यूब स्ट्रीमर या रोस्टर के नाम पर कई चैनल बने हैं जो ऐसी ही पॉपुलर वीडियो और मीम आदि पर कॉमेंट करने के नाम पर अनर्गल बकवास करते हैं। खासकर क्वीयर समुदाय के लोगों का वीडियो लेकर उन पर उनकी लैंगिकता और जेंडर एक्सप्रेशन को लेकर उनका मज़ाक बनाते हैं।

यूट्यूब पर ऐसे लोगों की तादाद भी दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही हैं। इसका मुख्य कारण ये है कि इनकी फैन फॉलोइंग भी कम नहीं हैं। लाखों युवा इन्हें सुनते हैं और पसंद करते हैं। जितना अधिक ये ट्रोल करेंगे, जितनी अधिक वाहियात और गंदी भाषा का प्रयोग करेंगे उतना ही अधिक इनका वीडियो देखा जाएगा। ताज्जुब इस बात का भी है कि इनके वीडियोज़ को बड़ी संख्या में रिपोर्ट करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती। हम सोशल मिडिया को एक दम ब्लैक एंड व्हाइट के दो धुर में रखकर उसका विश्लेषण नहीं कर सकते क्योंकि आखिरकार इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत है।

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ऐसे वीडियोज़ क्वीयर आंदोलन पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं

क्वीयर जैसे असंख्य संघर्षरत समुदाय अपनी आवाज़ को बहुत मुश्किल से उठा पाते हैं। समाज में स्वीकृति पाने के लिए इतनी मेहनत के बावजूद हमें लगता है कि अभी भी दशकों का इंतज़ार करना होगा। ऐसे में युवाओं के दिमाग में ऐसे वीडियोज़ आदि के माध्यम से जब होमोफॉबिक कॉन्टेंट को पसंद किया जाता है तो वह हमारी उम्मीदों पर चोट करता है। जहां हम अभी एनसीईआरटी में ट्रांस इंक्लूसिव ट्रेनिंग मॉड्यूल लाने में इतनी कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, वहीं बच्चो और युवाओं तक सोशल मीडिये के ज़रिये ऐसे होमोफोबिक कॉन्टेंट आसानी से पहुंच रहे हैं।

क्वीयर समुदाय के अधिकांश लोग वैसे भी मानसिक स्वास्थ की विभिन्न चुनौतियों से जूझते हैं। समाज, परिवार से दूर सोशल मीडिया एक ज़रिया बनता है मन को हल्का करने के लिए। ऐसे में जब वहां भी इस प्रकार का नकारात्मक कॉन्टेंट मिलता है तो ये उन्हें और विचलित करता है।

रोस्टिंग के ये वीडियो मानसिक स्वास्थ पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं

क्वीयर समुदाय के अधिकांश लोग वैसे भी मानसिक स्वास्थ की विभिन्न चुनौतियों से जूझते हैं। समाज, परिवार से दूर सोशल मीडिया एक ज़रिया बनता है मन को हल्का करने के लिए। ऐसे में जब वहां भी इस प्रकार का नकारात्मक कॉन्टेंट मिलता है तो ये उन्हें और विचलित करता है। हमें सबसे ज़्यादा विचलित करता है कि इतनी बड़ी संख्या में ऐसे वेडियोज़ पर आए हुए लाइक और सपोर्टिंग कमेंट्स। अभी हाल ही में जब मैंने देखा कि मेरा छोटा भाई एक ऐसा ही वीडियो देख रहा है और हंस रहा है तो मुझे बहुत झटका लगा और दुख हुआ, क्योंकि मुझे ऐसा ही लगा जैसे वह मुझ पर ही हंसा रहा हो। क्वीयर लोग कोई अलग दुनिया में नहीं होते, आप के बीच आप के साथ ही होते हैं। इस में जब आप अपने दोस्तों के ग्रुप में ऐसा कॉन्टेंट भेजते हैं तो शायद आपको नहीं पता चलता पर कई क्वीयर लोग जो आप के बीच अभी अपनी पहचान को छिपाए बैठे हैं या एक्सप्लोर कर रहे, उनके ऊपर इन चीज़ों का बेहद गहरा असर पड़ता है।

हम कर क्या सकते हैं

बहुत आउटरेज के बाद कैरी मिनाटी का एक वीडियो यूट्यूब द्वारा हटाया गया जबकि ऐसे हजारों-लाथों वीडियो असंख्य यूट्यूबर्स द्वारा बनाए जा रहे हैं। हमारी सरकार भी फैक्ट और आंकड़े देनेवाले स्वतंत्र मीडिया को तो आसानी से घेर लेती है पर जहां खुद संज्ञान लेकर ऐसे लोगों को रोकने की बात आती है तो कुछ भी नहीं करती। सोशल मीडिया के वैश्विक गाइडलाइंस और उन पर कार्रवाई के मानदंड भी प्रश्न के घेरे में हैं। ऐसी क्या वजह है कि जो रिपोर्ट होने के बावजूद इन वीडियोज़ पर कार्रवाई नहीं की जाती। साथ ही ज़रूरी है कि युवा अपनी ज़िम्मेदारी समझें। हर वर्ग का युवा इन्हें कॉलआउट करे और इनके विडियोज़ को मनोरंजन का ज़रिया ना बनने दे।

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तस्वीर साभार : Tumblr

ऋत्विक दास एक नॉन बाइनरी ट्रांस पर्सन हैं, जो पिछले 5 वर्षों से लखनऊ में ‘अवध प्राईड कमिटी ’ के साथ एलजीबीटी+ मुद्दों पर लोगों को जागरूक कर रहे हैं। साथ ही लखनऊ स्थित हमसफर महिला सहायता केंद्र में कार्यरत हैं।

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