क्यों औरतों के लिए 'बेवजह, बेपरवाह' होकर घूमना मना है?
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“क्यों नहीं चलने देते तुम मुझे? क्यों मुझे रह-रहकर नज़रों से नंगा करते हो? क्यों तुम्हें मैं अकेली चलती नहीं सुहाती? मेरे महान देश के महान नारी-पूजको, जवाब दो, मेरी महान संस्कृति के रखवालों, जवाब दो। मुझे बताओ मेरे कल्चर के ठेकदारों, क्यों इतना मुश्किल है एक लड़की का अकेले घर से निकलकर चल पाना?” ये सवाल अनुराधा बेनीवाल अपनी किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ में पूछती हैं। अकेली दुनिया के अलग-अलग देशों की गलियों को नापनेवाली लेखिका अपने देश के लोगों से जो सवाल करती हैं वे सवाल हम औरतों के दिमाग में हमेशा घूमते रहते हैं।

देश-विदेश घूमना तो बहुत दूर, हमारे घर-परिवार और मोहल्ले में रोज़ शाम किसी के यहां बैठने-मिलने जाने वाली महिलाओं का ऐसा करना बुरा माना जाता है। मेरे छोटे शहर और गांव में अगर कोई महिला गली-मोहल्ले में ज़्यादा इधर-उधर जाती है तो उसकी आवाजाही पर लोग फब्तियां कसनी शुरू कर देते हैं। उसे ‘घुमक्कड़’ कहकर बदनाम किया जाता है। घर-परिवार और आसपास के पुरुष उनको मॉनिटर करने में सबसे आगे होते हैं। महिलाओं का पास-पड़ोस में जाना, घर के कामों से अलग सिर्फ मन बहलाने के लिए इधर-उधर बैठने पर उनकी निगरानी भारतीय पुरुषों का सबसे बड़ा काम है जिसे वे पूरी जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं। 

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हमारे देश में महिलाओं को वो स्पेस नहीं मिलता है जो एक पुरुष को मिलता है। घर हो या बाहर उसके लिए नियम-कानून आदमियों द्वारा बनाए हुए हैं जिसको पालन करना महिलाओं का कर्तव्य बना दिया जाता है। भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के इन्हीं कर्तव्यों में से एक है उसका घर में रहना।

महिलाओं के लिए घर ही उनकी ‘दुनिया’ है

हमारे देश में महिलाओं को वह स्पेस नहीं मिलता है जो एक पुरुष को मिलता है। घर हो या बाहर उसके लिए नियम-कानून मर्दों द्वारा बनाए गए हैं जिसका पालन करना महिलाओं का कर्तव्य बना दिया जाता है। भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के इन्हीं कर्तव्यों में से एक है उसका घर में रहना। संस्कारों, मूल्यों और रीति-रिवाजों के नाम पर उनको नियंत्रण में रखा जाता है। बेवजह कहीं जाना, भटकना तो आम भारतीय महिलाओं के जीवन का या तो एक ख्वाब रहता है या कंडीशनिंग ऐसी होती है कि वे खुद ही इसे फिजू़ल का काम बताती हैं। यही वजह है कि खुद की पसंद से घूमना भारतीय समाज की आम महिलाओं के लिए निषेध है।

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घूमने-फिरने वाली महिलाएं बुरी होती हैं

मेरे बचपन की यादों में से एक किस्सा महिलाओं की गतिशीलता को लेकर आज भी हूबहू ताजा है। कैसे गांव की एक उम्रदराज़ महिला जो रिश्ते में मेरी नानी लगती थीं, उन्हें सब घुमक्कड़ कहकर बुलाते थे। यह शब्द उनके लिए तंज की तरह इस्तेमाल होता था। गांव की सबसे बड़ी-बूढ़ी औरतों में शामिल नानी की इस आदत का पहला विरोध मैंने बचपन में अपने घर के पुरुषों के द्वारा देखा था। उनकी आवाजाही को बेकारी और बिगडै़ल कहा जाता था। पूरे गांव में उनकी इधर-ऊधर बैठने की आदत पर ऐतराज़ सबसे पहले पुरुषों द्वारा किया गया था। लगभग अपनी सभी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर चुकी नानी जब उम्र के आखिरी पायदान पर अपना समय लोगों से मिलजुलकर एक साथ बातें करके गुज़ारने में बिताना पसंद करती थीं तो उनको अपनी उम्र से छोटे पुरुषों द्वारा भी बातें सुनने को मिलीं। 

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मुझे याद है वह कहती थीं कि मैं जब तक शाम में कुछ देर के लिए घर से बाहर न निकलूं, दो-चार लोगों से बातें न कर लूं तो अच्छा महसूस नहीं करती हूं। उनके विचार, आनंद, और पसंद से अलग गांव की बड़ी महिलाओं में शामिल नानी को भला-बुरा सिर्फ इसलिए कहा जाता था क्योंकि वह खाली वक्त में घर में न रहकर इधर-ऊधर घूमती थीं। बचपन की यह याद जीवन के हर स्तर पर अलग-अलग किरदारों में जीवित होती रही है। गांव से आकर एक छोटे शहर में भी यही देखा जो भी महिलाएं अपनी खुशी और पसंद के अनुसार सड़कों पर अपनी उपस्थिति बनाती दिखती है, उसके घूमने पर लोगों की मोरल पुलिसिंग शुरू हो जाती है। 

आवाजाही से गायब महिलाएं

इतिहास, भूगोल और सामाजिक अवस्थाओं में सभी जगह महिलाओं के लिए सीमाएं देखने को मिलती हैं, जो उन्हें रोकने के लिए बनाई गई दिखती है। यही वजह है कि दहलीज़ को लांघने के लिए खुद के कदम रखने के लिए महिलाओं को अदृश्य लड़ाईयां लड़नी पड़ती है। बहुत सी बातें अनसुनी करनी पड़ती हैं। इस पहली बाधा को पार करना सबसे ज्यादा कठिन है। इसे पार करने में सबसे ज्यादा वक्त भी लगता है। मेरी नानी ने उम्र के उस पड़ाव पर आवाजाही करनी चुनी थी जब वह समाज के तय शब्दकोश के मुताबिक अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो चुकी थीं। फिर भी केवल अपने परिवार-गांव में रोज कुछ समय अपनी पसंद से जीने की वजह से उनकी मौत के बाद भी लोग उन्हें नकारात्मक रूप से याद करते हैं।

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ये सारे बातें कहने में साधारण और पुरानी लग सकती है। इनको गलत साबित करने के लिए आज की कुछ महिलाओं के सोलो ट्रैवलिंग के उदाहरण पेश किये जा सकते हैं। लेकिन वह केवल एक विशेषवर्ग की चुनिंदा महिलाओं तक सीमित है।

भारत में महिलाओं की आवाजाही को लेकर मोरल पुलिसिंग बहुत आम है। साधारण आम घरेलू महिलाओं और लड़कियों के लिए खुद की पसंद से बाहर निकलना बहुत कठिन है। सार्वजनिक स्थान में निकलता तो एक जोखिम भरा काम है ही इससे अलग केवल अपने पास-पड़ोस तक बेहद सीमित दायरे तक में रूढ़िवाद के बल पर उसकी गतिशीलता को बाधित किया जाता है। अकेले सफर पर निकलना महिलाओं के लिए नामुकिन बनाया हुआ है।   

सुरक्षा की आड़ में बिठाया हुआ एक डर

हमारी पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था पुरुषों के द्वारा बनाई गई है। इस पूरे स्ट्रक्चर में महिलाएं गायब हैं। आवाजाही उनकी गतिशीलता को ‘मान-मर्यादा’ के बल पर नियंत्रित किया गया है। “अच्छे घर की लड़कियां घरों में रहती हैं, अच्छी लड़कियां सड़कों पर नहीं खेलती हैं और लड़कियां का इधर-उधर घूमना अच्छा नहीं होता है,” जैसी बातें कहकर मुझे खुद बहुत छोटी उम्र में बाहर निकलने से रोकना शुरू कर दिया गया था। डर और सुरक्षा का हवाला देकर दिमाग़ में इस बात को स्थापित कर दिया गया था। यही नहीं लड़कियों से अकेले उसकी छत तक की चहलकदमी को भी छीन लिया जाता है। 

ये सारे बातें कहने में साधारण और पुरानी लग सकती है। इन्हें गलत साबित करने के लिए आज की कुछ महिलाओं के सोलो ट्रैवलिंग के उदाहरण पेश किए जा सकते हैं। लेकिन वह केवल एक विशेषवर्ग की चुनिंदा महिलाओं तक सीमित है। साधारण महिलाएं और लड़कियों के लिए खुद की पसंद के कुछ कदम चलना आज भी एक बहुत बड़ा संघर्ष है।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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