महिलाओं की गतिशीलता से समाज इतना डरता क्यों है?
तस्वीर साभार: Indian Express
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अदमा गाँव में रहनेवाली रूबी (बदला हुआ नाम) को उसके घरवालों ने मोबाइल फ़ोन के इस्तेमाल की इजाज़त नहीं दी है। एक गरीब परिवार से ताल्लुक़ रखनेवाली रूबी के घर की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं है, लेकिन इसके बावजूद उसके तीनों भाइयों के पास अपना स्मार्टफ़ोन और दो बाइक है। लेकिन रूबी के लिए साइकिल भी उपलब्ध नहीं है। इस साल रूबी ने दसवीं की परीक्षा दी है, वह आगे पढ़ना चाहती है, लेकिन उसके घरवाले उसे आगे नहीं पढ़ाना चाहते हैं और हमेशा आर्थिक तंगी का हवाला देते हैं। परिवार ने साफ़ कहा कि अगर आगे पढ़ाई करनी है तो उसे अपने खर्चे का इंतज़ाम खुद करना होगा।

जब रूबी ने पार्ट टाइम बच्चों को पढ़ाने की पहल की तो परिवार से कुछ नियम साफ़ उसके सामने रख दिए गए, “अपने गाँव के बाहर कदम नहीं रखना है, उसे तीन-चार घंटे से ज़्यादा घर से बाहर रहने की इजाज़त नहीं है, वह मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं कर सकती है और उसे आने-जाने के लिए कोई साधन नहीं दिया जाएगा।” रूबी को आए दिन अपने भाइयों की हिंसा और गुस्सा का सामना करना पड़ता है, जब भी वह आगे पढ़ने या कुछ नया सीखने की बात करती है। पढ़ाई में अच्छी रूबी अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ना चाहती है और अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती है, लेकिन उम्र के साथ बढ़ती पाबंदियों और हिंसा का सामना वह कब तक कर पाएगी, ये कह पाना मुश्किल है।

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रूबी कहती है, “अभी बहुत लोग मानते हैं कि अब लड़कियों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार अच्छे दिखनेवाले परिवारों में भी वहां की महिलाओं को हिंसा और भेदभाव सिर्फ़ इसलिए झेलना पड़ता है क्योंकि वह ‘महिला’ है। मैं अपने परिवार में अपने साथ ये अनुभव कर रही हूं और अपने रास्ते भी तलाश रही हूं। लेकिन अभी मैं इतनी मज़बूत नहीं हुई हूं कि अपने संघर्ष को अपने असली नाम से छपने की अनुमति दूं, क्योंकि अगर गलती से भी ये मेरे परिवार तक पहुंचता है तो इससे मुझे कई दिक़्क़त का सामना करना पड़ सकता है।”

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पितृसत्ता हमेशा महिला को पुरुष से कम समझती है। सदियों से यह सोच चली भी आ रही है पर अब समय बदल रहा है। महिलाएं आगे बढ़ रही हैं या कई जगह पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं पर इन सबके बावजूद हम लोगों का समाज महिलाओं पर अपनी सत्ता को बनाए रखना चाहता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रूबी जैसी कई लड़कियां और महिलाएं आज भी जेंडर आधारित हिंसा और भेदभाव का सामना करती हैं, जो उनके जन्म के साथ ही शुरू जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ती है इन पाबंदियों का स्तर बढ़ता जाता है और वह अपनी पढ़ाई तक पूरी नहीं कर पाती है। ज्यादातर लड़कियों अपने परिवार में भी इन पाबंदियों का सामना किया है, जिसे दूर करके अपना रास्ता तलाशने में मुझे बहुत संघर्ष भी करना पड़ा। आज जब अलग-अलग गाँव की किशोरियों और महिलाओं के मिलती हूं और उनसे बात करती हूं तो कई रूबी जैसी लड़कियां मिलती हैं। इन अनुभवों के आधार पर जब मैं इन पाबंदियों की वजह को समझने की कोशिश करती हूं तो ये कुछ वजहें सामने आती हैं।

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महिलाओं की गतिशीलता से डर

पितृसत्ता हमेशा महिला को पुरुष से कम समझती है। सदियों से यह सोच चली भी आ रही है पर अब समय बदल रहा है। महिलाएं आगे बढ़ रही हैं या कई जगह पर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं पर इन सबके बावजूद हम लोगों का समाज महिलाओं पर अपनी सत्ता को बनाए रखना चाहता है। जैसा कि हम लोग जानते हैं विकास हमेशा गतिशीलता पर निर्भर करता है, ऐसे में जब महिलाएं कहीं आना-जाना या किसी अन्य लोगों के संपर्क में आना शुरू करती हैं तो वह आगे बढ़ने का सोचना शुरू करती हैं।

पितृसत्ता यह अच्छे से जानती है कि महिलाओं ने एक बार भी बाहर निकलना सीख लिया तो उन पर पाबंदी लगानी मुश्किल होगी, इसलिए वह शुरू से ही महिलाओं की गतिशीलता पर पाबंदी लगाने के लिए इससे जुड़े साधनों पर भी पाबंदी लगाना शुरू कर देती है फिर वह चाहे मोबाइल फ़ोन हो या साइकिल। अगर वह ऐसा नहीं करती है तो महिलाएं अपने साथ होनेवाली हिंसा और भेदभाव को पहचानना शुरू कर देंगी।

पिता अपने बाद अपने बेटों को वर्चस्व में लाने के लिए बचपन से ही तैयारी करने लगता है। इसके लिए वह पहले तो घर की महिलाओं पर अपना दबाव और जेंडर आधारित काम को बनाए रखता है, वहीं बेटों और घर के पुरुषों को सत्ता के साधन जैसे-गतिशीलता के साधन, पैसे और अन्य संसाधन पुरुषों को उपलब्ध करवाने लगता है, जिससे घर के बेटे भी पिता की ही सोच को आगे बढ़ाए और अपने घर की किसी भी महिला को खुद से आगे न बढ़ने दें।

महिलाओं को पुरुष से कमतर बनाए रखने की नीति

जाति, वर्ग या क्षेत्र चाहे जो भी हो, महिलाओं को लेकर समाज की सोच एकदम साफ़ है, जिसके तहत वह हमेशा महिलाओं से कमतर बनाए रखना चाहता है। हर परिवार में पुरुष चाहता है कि उसके घर की महिलाएं उससे कम रहे न कि उसके बराबर आकर काम करें या अपना जीवन अपने हिसाब से जीएं। इसके लिए वह महिलाओं को घर तक समेटने का काम करता है। इस तरह पिता अपने बाद अपने बेटों को वर्चस्व में लाने के लिए बचपन से ही तैयारी करने लगता है। इसके लिए वह पहले तो घर की महिलाओं पर अपना दबाव और जेंडर आधारित काम को बनाए रखता है, वहीं बेटों और घर के पुरुषों को सत्ता के साधन जैसे-गतिशीलता के साधन, पैसे और अन्य संसाधन पुरुषों को उपलब्ध करवाने लगता है, जिससे घर के बेटे भी पिता की ही सोच को आगे बढ़ाए और अपने घर की किसी भी महिला को खुद से आगे न बढ़ने दें।

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जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा को प्रोत्साहित करनेवाली सोच बहुत बारीकी से समाज के हर तबके के घर और जिंदगियों में शामिल है, जो महिलाओं को विकास तो क्या उनके बुनियादी अधिकारों से भी उन्हें दूर करती है। रूबी जैसी लड़कियां इनके ख़िलाफ़ अपने कदम तो बढ़ाती हैं लेकिन हर कदम पर बढ़ती पाबंदियां कई बार उनके हौसलों को पस्त कर देती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लड़कियां अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं। अगर हाईस्कूल या इंटर तक स्कूल जाती भी हैं तो उनके हर कदम पर इतनी पाबंदी होती है कि उनकी पढ़ाई सिर्फ़ काग़ज़ों तक ही सीमित रह जाती है, जिसकी वजह से वे आगे बढ़ने का सोच भी नहीं पाती है।

अपने अनुभव में मैंने यह पाया है कि अगर महिलाओं को गतिशीलता का अवसर दिया जाए तो विकास के अवसरों से खुद को जोड़ सकती हैं और अपनी संभावनाएं तलाश सकती हैं। अगर गतिशीलता के अवसर के बिना महिलाओं को शिक्षित भी किया जाता है तो वह अपने बारे में सोच नहीं पाती क्योंकि उनका व्यवहारिक ज्ञान बहुत सीमित होता है। इसलिए ज़रूरी है कि महिलाओं की गतिशीलता को बढ़ाने की दिशा में हम पहल करें। 

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लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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