इंटरसेक्शनलजेंडर महिलाओं के ख़िलाफ़ फैलाया गया पितृसत्तात्मक मिथ्यों का जाल

महिलाओं के ख़िलाफ़ फैलाया गया पितृसत्तात्मक मिथ्यों का जाल

अपने पिछले लेख में हमने ऐसे ही कुछ मिथ्यों पर बात की थी, जिन्हें दूर करना एक लैंगिक रूप से समान समाज बनाने के लिए ज़रूरी है। आज अपने इस लेख में हम ऐसे ही कुछ और मिथ्यों की चर्चा करने जा रहे हैं।

अपने समाज में हमेशा से ही महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखा गया है, क्योंकि पितृसत्ता महिलाओं को हमेशा पुरुषों से कम आंकती है। यही पितृसत्ता हमारे समाज में महिला और पुरुष को बनाने का काम करती है। हमारा समाज बचपन से लोगों को पितृसत्ता के बनाए जेंडर के दो ढांचे में बांट देता है। इस समाजीकरण की प्रक्रिया के साथ ही महिलाओं को लेकर ऐसे मिथ्य प्रचलित किए जाते हैं, जिसका परिणाम हमें आंतरिक स्त्रीद्वेष के रूप में देखने को मिलता है।

अपने पिछले लेख में हमने ऐसे ही कुछ मिथ्यों पर बात की थी, जिन्हें दूर करना एक लैंगिक रूप से समान समाज बनाने के लिए ज़रूरी है। आज अपने इस लेख में हम ऐसे ही कुछ और मिथ्यों की चर्चा करने जा रहे हैं।

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मिथ्य: महिलाएं एकजुट नहीं होना चाहती हैं

महिलाएं खुद एकजुट नहीं होना चाहती हैं- सामाजिक रूप से सक्रिय या फिर हमेशा बैठकों में हिस्सा लेनेवाली महिलाएं उन सभी महिलाओं के लिए यह बात कहती दिख जाती हैं जो इन बैठकों में नहीं आ पाती। उनमें एकता का भाव नहीं है। इसलिए वे अपने घर से बाहर नहीं निकलती हैं और न ही किसी बैठक में शामिल होती हैं। ऐसा कहने के दौरान हम यह भूल जाते हैं कि हर महिला पर पितृसत्ता का दबाव अलग-अलग रूप में होता है। उनकी जाति, वर्ग, समाजिक स्थिति, शिक्षा, आर्थिक स्थिति और विकलांगता जैसे पहलू उनके संघर्षों को कई गुना ज़्यादा बढ़ा देते हैं।

इसके साथ ही, हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि अपने परिवार और समाज में महिलाओं को कहीं भी आने-जाने की कितनी आज़ादी होती है। उनकी गतिशीलता का स्तर क्या होता है। उन्हें बाहर निकलने और अपनी मर्ज़ी से आने-जाने की आज़ादी बहुत सीमित होती है।

हर महिला पर पितृसत्ता का दबाव अलग-अलग रूप में होता है। उनकी जाति, वर्ग, समाजिक स्थिति, शिक्षा, आर्थिक स्थिति और विकलांगता जैसे पहलू उनके संघर्षों को कई गुना ज़्यादा बढ़ा देते हैं।

इसलिए महिलाओं के बाहर निकलने पर सवाल और सत्ता का दबाव भी बहुत ज़्यादा होता है। अधिकतर परिवारों में जब महिलाओं को अपनी मर्ज़ी से बाहर निकलने का स्पेस नहीं होता है तो वे हमेशा बाहर निकलने से कतराती हैं। इस कंडीशनिंग के चलते महिलाएं अपने घर से बाहर नहीं निकलना चाहती हैं। इसके बाद जब बात आती है एकजुट होने की तो, हम महिलाएं अपने घर में ही कभी महिलाओं को सामाजिक रूप से सक्रिय होते नहीं देखते। उनका जुटान सिर्फ़ धार्मिक कामों पर ही देखते-सुनते हम बड़े हुए हैं। ऐसे में जब किसी सामाजिक बदलाव या उद्देश्य को लेकर महिलाओं के एकजुट होने की बात आती है तो यह विचार ही कई महिलाओं के नया होता है। इसलिए वे इसे आज़माने की बजाय इससे बचना पसंद करती हैं। लेकिन सिर्फ इस आधार पर यह कहना बिलकुल भी ग़लत होगा कि महिलाएं भेदभाव के ख़िलाफ़ एकजुट नहीं होना चाहती हैं। बल्कि असल बात तो यह है कि पितृसत्ता महिलाओं को एकजुट होने नहीं देना चाहती है।

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मिथ्य : महिला हिंसा के पीछे ज़्यादातर महिला का ही हाथ होता है

दहेज, भ्रूण कन्या हत्या, घरेलू हिंसा जैसे अधिकतर महिला हिंसा से जुड़े मुद्दों पर यह बात सुनने को मिलती है कि महिलाओं के साथ होनेवाली अधिकतर हिंसा में महिलाओं का ही हाथ होता है। यह वास्तव में एक मिथ्य ही है, वह मिथ्य जिसे पितृसत्ता ने लंबे समय से फैलाया है। जेंडर के आधार पर पितृसत्ता ने महिलाओं पर हमेशा एक ‘अच्छी महिला’ बनने का दबाव डाला है। एक अच्छी औरत कौन होती है इसके लिए पितृसत्ता ने कई पैमाने तय किए हैं। उदाहरण के तौर पर एक अच्छी महिला वही होगी जो पुरुषों या यूं कहूं कि पितृसत्ता के मूल्यों को आगे लेकर जाती और मज़बूती से उन्हें अपने जीवन में लागू करती है।

इसके साथ ही, हम यह अच्छी तरह जानते हैं कि अपने परिवार और समाज में महिलाओं को कहीं भी आने-जाने की कितनी आज़ादी होती है। उनकी गतिशीलता का स्तर क्या होता है।

मिथ्य: औरतें खुद आत्मनिर्भर नहीं बनाना चाहती हैं

गांव में अक्सर यह बात मैं उन महिलाओं और उन लड़कियों के परिवार से सुनती हूं, जिन्होंने अपने पढ़ाई बीच में छोड़ दी है। अक्सर उनके परिवारवाले कहते हैं कि यह तो खुद ही पढ़ना नहीं चाहती थी। आत्मनिर्भर नहीं बनना चाहती है। लेकिन जब लड़कियों से बात करो तो पता चलता है कि ‘उनके घर से पढ़ाई ज़ारी रखने का दबाव दिया जाता है पर उससे ज़्यादा दबाव इस बात पर होता है कि पढ़ने जाने से पहले घर पर अपने हिस्से का सारा काम पूरा करके जाओ। खासकर वे परिवार जहां खेती का काम होता है, वहां महिलाओं, लड़कियों पर काम का इतना ज़्यादा बोझ होता है कि वे अपने लिए थोड़ा भी वक्त नहीं निकाल पाती हैं।

काम के साथ-साथ कई लड़कियों के पोषण पर भी ध्यान नहीं दिया जाता है, जिससे वे चाहकर भी पढ़ाई में मन नहीं लगा पाती हैं। ये कुछ पहलू हैं जिस पर कोई बात नहीं होती है। पढ़ाई से इतर घर के कामों का लड़कियों पर दबाव इतना ज़्यादा होता है कि लड़कियां खुद अपने कदम पीछे खींच लेती हैं। यह बात सिर्फ़ शिक्षा ही नहीं नौकरी और महिला के हर रोज़गार पर भी लागू होती है। जब उसके ऊपर घर के काम का दोहरा भार होता है, जिसके वजह से उन्हें कई बार न चाहते हुए भी अपने पैर पीछे करने होते हैं।

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तस्वीर साभार: Wikimedia Commons

About the author(s)

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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